Saturday, October 01, 2016

ECONOMIC EXPLOITATION

आर्थिक शोषण और शोषक नीतियों पर एक नजर 
लोगों की जिंदगी की दशा और दिशा तय करना अब आसान हो गया है. नीति निर्माता वो व्यक्ति हैं जो देशों और सभ्यताओं को एक नयी दिशा दे सकते हैं. ये वो लोग हैं जो अपनी नीतियों से लोगों की जिंदगी को बदल सकते हैं. अगर ये लोग देश की आर्थिक नीतियों को एक नयी दिशा देते हैं तो उससे लोगों को एक नई सोच और नयी रौशनी मिल सकती है. कई गरीब देशों की आर्थिक नीतियों के कारण वहां के लोगों को आज एक नई सुबह मिल रही है. जैसे उरुग्वे में आर्गेनिक कृषि को बढ़ चढ़ कर अपनाया गया है. प्रश्न है की देश के नीति निर्माताओं की प्राथमिकता क्या है? 


आज पूरी दुनिया कुछ लोगों के इशारों पर चल रही है. जैसी नीतियां नीति निर्माता तय करते हैं वैसे ही लोगों की जिंदगी बदल जाती है. प्रश्न है की क्या वो नीति निर्माता जानते हैं की वो लोगों की जिंदगी को किस तरफ धकेल रहे हैं? एक उदहारण देता हूँ. हमारे देश की नीति आयोग के एक बहुत उच्च अधिकारी ने कहा की आने वाले समय में कृषि में ज्यादा सम्भावना नहीं है अतः लोगों को शहरों की तरफ स्थानांतरित कर उनको बेहतर जीवन देने के लिए योजना बनायीं जानी चाहिए. मैं यहाँ पर दो प्रश्न आपको मंथन हेतु प्रस्तुत करूँगा. पहला - किस आधार पर ये मान जाए की आने वाले समय में कृषि में ज्यादा सम्भावना नहीं है? कम से कम मैं तो ये बात मानने के लिए तैयार नहीं हूँ - और मेरी जैसी सोच रखने वाले वो लोग जो जीडीपी को ज्यादा महत्ता नहीं देते बल्कि जीवन के आनंद और उल्लास को ज्यादा महत्त्व देता हैं - वो भी इस बात से सहमत होंगे. प्रश्न है की कृषि को ज्यादा सम्बल और मजबूती देने की जगह पर लोगों को गावों से शहरों में स्थानांतरित करने में जो लोगों को कस्ट होगा और जो यंत्रणाएँ झेलनी पड़ेगी - उसका क्या? क्या आर्थिक नीतियां बनाने वाले इन बातों को सोच रहे हैं? सरकारी नीतियों के कारण जंगल वीरान हो रहे हैं, पेड़ तोड़े जा रहे हैं, गाव उजड़ रहे हैं, घर वीरान हो रहे हैं, प्रतिभा का पलायन हो रहा है पर शायद आप नहीं मानेंगे क्योंकि आप तो ये ही सोच रहे हैं की देश के नीति निर्माता तो बहुत ही सोच समझ कर नीतियां बनते हैं और हम को उनको मान कर देश की चिंता उन पर छोड़ देनी चाहिए 

पूरी दुनिया में आज इस बात पर बल दिया जा रहा है की इंसान को अधिक से अधिक मशीनी रूप में पेश किया जाए. इंसान को एक कोमोडिटी मान लिया गया है. इंसान को एक कोमोडिटी मानते हुए ही सारी योजनाएं बनायीं जाती है. इंसान को जब चाहे स्थानांतरित किया जा सकता है, जब चाहे नयी तकनीक सिखाई जा सकती है और जब चाहे उसको नए रोजगार और नए काम में डाला जा सकता है. क्या ये मान्यताएं उचित हैं? प्रश्न है की आम इंसान को प्रभावित करने वाले निर्णय बहुत सोच विचार कर लिए जाते हैं तो फिर उनमे बार बार बदलाव क्यों? क्यों सत्ता बदलने पर वो निर्णय बदल दिए जाते हैं? क्यों विपक्ष के लोग सत्ता में आते ही उन निर्णयों को लेते हैं जिनके वो स्वयं विरोधी रहे हैं? 

जापान में १८६८ से १९१२ के दौर को मैजी शासन के दौर से गुजरना पड़ा. इस दौर में मेइजी सरकार ने आम लोगों की भलाई के लिए एक नीति के तहत व्यवस्थागत बदलाव किये और पुरे देश का कायाकल्प कर दिया. उनकी एक नीति थी, एक आदर्श था और एक योजना थी. उनकी सफलता के पीछे कई कारण थे - जैसे - एक शाशन, एक नीति, अनुशाशन और जन कल्याण की भावना. ये वो बाते हैं जो किसी भी नीति निर्माता को देश का कल्याणकारी बन सकती है. 

आज भारत के विकास पर दृस्टि डालें तो हम निम्न बातों पर गौर कर सकते हैं: - 

एक नीति के तहत ६० के दशक से फर्टिलिजर व् अन्य केमिकल को कृषि के क्षेत्र में प्रोत्साहित किया गया और उसके लिए सरकार को भारी मात्र में सब्सिडी भी देनी पड़ी. सरकार की इस नीति के परिणाम स्वरुप पुरे देश में कृषकों ने वर्षों की परम्परागत कृषि को त्याग दिया और और केमिकल खेती को अपनालय. जहाँ पर पहले किसान गोबर और अन्य आर्गेनिक कृषि को अपनाते थे - वहां पर अब केमिकल कृषि अपनाने लगे. आज हम सब जानते हैं की भारत की परम्परागत कृषि ही दुनिया की सर्वश्रेष्ठ कृषि है और पूरी दुनिया में उसको आर्गेनिक कृषि के रूप में अपनाया जा रहा है और अब भारत सरकार भी उसको लागू करने के लिए योजना बना रही है. प्रश्न है की उस नीति के कारण हमें नुक्सान हुआ उसका कौन जिम्मेदार है? प्रश्न है की अब हम वापिस परम्परागत कृषि को अपनाने के लिए क्या करें? अगर सरकार उस समय केमिकल की जगह पर गोबर और गाय पालन पर सब्सिडी दे देती तो आज कितना सुनहरा दिन होता और शायद हम पूरी दुनिया में आर्गेनिक कृषि के लिए जाने जाते. पर ऐसा नहीं हुआ और आज सिर्फ पछतावा और दिक्क्तें हैं 

हर सरकार इसी तरह के निर्णय लेती है जो सिर्फ ५ साल को ध्यान में रख के लिए जाते हैं  - क्यों नहीं हम कुछ ऐसा प्रयास करें की नीति निर्माता एक आइडियोलॉजी के तहत कार्य करें और देश को एक नयी दिशा देने के लिए कृतसंकल्प हों 

AN APPEAL TO THE GOVERNMENT

मेरी सरकार से छोटी सी आशा 

हम सब सुनते आये हैं की अच्छे दिन आएंगे - और हम सब चाहते हैं की अच्छे दिन आएं. इसी लिए हम सब को मिल कर प्रयास करने की जरूरत भी है. सरकार  कोई  जादूगर  नहीं  है अतः इससे बहुत ज्यादा उम्मीद करना गलत है. सरकार के पास समस्याओं का पुलिंदा ले जाने से भी कुछ नहीं होने वाला - क्योंकि सरकार की अपनी प्राथमिकताएँ हैं. आप सरकार को पत्र लिखेंगे - शायद जवाब भी नहीं मिले. सत्तर और अस्सी के दशक में मैंने मेरे पिताजी को सरकार को पत्र लिखते हुए देखा है और उन सभी पत्रों का जवाब भी आता था. उस समय तकनीक सीमित होने के बावजूद भी सरकार लोगों को जवाब देना अपना फर्ज मानती थी. उस समय सरकार के पास न आज जैसे तकनीक थी न आज जितने अधिकारी और कर्मचारी थे लेकिन आम लोगों की मदद करने और आम लोगों को जवाब देने का जज्बा था. आज स्थिति बदल गई है. अत्याधुनिक तकनीक है, अनेक अधिकारी हैं  - पर वो नहीं है जो आप चाहते हैं. सरकारी महकमों में काम करने का तरीका बद से बदतर हो रहा है. अगर सरकारें चाहें तो इ-गवर्नेंस को लागू कर के आम आदमी की दिक्क्तें कम कर सकती हैं. चाह हो तो राह भी निकल आती है. 

सरकार की कार्यप्रणाली में बदलाव ऐसे ही नहीं आ सकता - बुराई तो अपने आप आ जाती है - अच्छाई लाने के लिए प्रयास करने पड़ते हैं. सरकारी कार्यप्रणाली से आज हम सब लोग कुछ सीमा तक दुखी हैं - लेकिन उसमे बदलाव के लिए क्या उपाय हो? प्रयास तो हम सब को करने ही पड़ेंगे - हम सबके प्रयासों से सुधार होगा. 
इ-गवर्नेंस   की जरुरत 
हाल ही मैं मुझे गिरदावरी और जमाबंदी बनवाने के लिए पटवारी से संपर्क करने की जरुरत पड़ गयी. सरकार ने तो अपनी तरफ से पूरी व्यवस्था कर रखी है (सरकार चाहे तो इस प्रकार के काम को इ-गवर्नेंस के द्वारा इतना सुगम बन सकती है की आम आदमी को पटवारी के पास जाने की जरुरत ही न पड़े - पर पता नहीं सरकार ऐसा क्यों नहीं करती) . पटवारी के फोन नंबर सरकारी दफ्तर में टंगे हुए हैं. पर क्या पटवारी मिलता है - फोन पर संपर्क करने पर बहुत ही रुख जवाब मिलता है. पटवारी से मिलने के लिए चक्कर लगाओ तो लगाते ही रह जावोगे - इसी दौरान मैंने देखा की छोटे छोटे कामों के लिए कितने किसान पटवारी के आगे पीछे चक्कर लगा रहे हैं और पटवारी है जैसे ईद का चाँद. काफी चक्कर लगाने के बाद भी मेरा काम नहीं हुआ  - लेकिन मैं ये देख के ज्यादा दुःखी था की वो किसान जो दूर दराज के गावों से भीषण गर्मी में छोटे छोटे काम के लिए आते हैं और उनका काम फिर भी नहीं होता. उनको देख के मेरे काम न होने का अफ़सोस गायब हो गया. अगर इ-गवर्नेंस पूरी तरह से लागू हो जाता तो इन किसानों को पटवारी के चक्कर लगाने की जरुरत ही नहीं पड़ती - इ-मित्र केंद्र से ही उनके सारे काम हो जाते. लेकिन इस के लिए हम सब को आवाज उठानी पड़ेगी. कुछ सरकारी अधिकारी इ-गवर्नेंस को लागू नहीं होने देना चाहते - आप समझ सकते हैं - ऐसा वो क्यों कर रहे हैं.  
विगत कुछ समय में एक परिवर्तन तो आ रहा है की उच्च अधिकारीयों को विनम्रता से पेश आने की ट्रेनिंग दी जा रही है इस कारण उनके व्यवहार और आचरण में परिवर्तन आ रहा है. लेकिन इस परिवर्तन का प्रभाव नीचे के स्तर पर नजर नहीं आ रहा है. जैसे ही कोई सरकारी विभाग में नियुक्ति पाता उसका नजरिया ही बदल जाता है. आम लोगों के प्रति संवेदन हीन  होना एक प्रकार की सरकारी कार्यप्रणाली का भाग बन गया है. 
जहाँ जहाँ पर इ-गवर्नेंस लागू हो रहा है वहां वहां पर परिवर्तन आ रहा है और लोगों को अपना काम सुगमता से करने का मौका मिल रहा है. ऐसे भी कई अपवाद मिल जाते हैं जहाँ पर बड़े ही विनम्र और मददगार लोग होते हैं जो आम आदमी की भलाई खुल कर करते हैं. 
पब्लिक रॉकिंग की जरुरत 
निजी क्षेत्र की कम्पनियों के लिए क्रेडिट रेटिंग करवाना अनिवार्य है. जब भी वो ऋणपत्र जारी करती हैं तो उनको अपनी क्रेडिट रेटिंग दिखानी पड़ती है. काफी समय से इस बात पर चर्चा चल रही है की सरकारी विभागों की भी कार्यप्रणाली का सर्वे होना चाहिए और उनकी भी पब्लिक /  कस्टमर रेटिंग जारी होनी चाहिए. जो विभाग आम जनता (पब्लिक) के साथ अच्छे से पेश नहीं आ रहे उनकी रैंकिंग ख़राब आ जायेगी. और तब उन विभागों को बंद कर के नए सिरे से विभाग बनने चाहिए या निजी क्षेत्र को काम सौंप देना चाहिए. पब्लिक रेटिंग जारी होने से ही सरकारी महकमों की कार्यप्रणाली में बदलाव आना शुरू होगा. इस के लिए हम सब नागरिकों को मांग करनी पड़ेगी. 
गारंटी ऑफ़ सर्विस
काफी समय से बात चल रही है की सरकारी सेवाओं में गारंटी शामिल होगी और नियत समय में काम पूरा होगा. लेकिन ये गारंटी जब तक पूरी तरह से लागू नहीं होगी तब तक सुधार नहीं होगा. इस गारंटी के लिए भी हम सब को आवाज उठानी पड़ेगी. 
जरुरी सेवाओं की तरफ हो ध्यान 
सरकारों पर एक दबाव होना चाहिए की जरूरी सरकारी सेवाओं पर वो पूरा ध्यान देवे. नित नए विभाग बनाये जा रहे और और नए लोगों को नियुक्त किया जा रहा है लेकिन जरुरी सेवाओं का अता - पता ही नहीं है. आप किसी भी जरुरी सेवा को देख लेवे - सब जगह ये ही हाल है. कानून, आंतरिक सुरक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा, बदमाशों को पकड़ने का काम, आदि - ये जो सरकारी काम हैं - जो की जरुरी काम है - उनके लिए सरकार के पास कर्मचारी नहीं है. गैर जरुरी कामों के लिए सरकार दुनिया भर की नियुक्तियां कर रही है. कोई भी व्यक्ति ये कह सकता है की प्राथमिकता क्या है. उन प्राथमिकताओं के लिए सरकार क्या कर रही है. विगत मुख्य न्यायाधीश ने तो यहाँ तक कह दिया था की निजी क्षेत्र की तरह कोर्ट भी २४ घंटे और साल भर खुले रहे ताकि लोगों को न्याय मिल सके - लेकिन क्या हुआ? आज भी हालत वो के वो हैं. क्या सरकारों ने इन समस्याओं के समाधान के लिए नियुक्तियां की? नहीं - नियुक्तियां उन क्षेत्रों में हो रही है जो गैर जरुरी क्षेत्र हैं - जिन क्षेत्रों में निजी क्षेत्र भी काम कर सकता है. गैर जरुरी क्षेत्रों में (जिनमे निजी क्षेत्र भी बहुत अच्छा काम कर रहा है ) निजीकरण किया जा सकता है लेकिन इन प्राथमिकता के क्षेत्रों (जैसे कानून, आंतरिक सुरक्षा आदि )के लिए तो सरकारों को अपनी प्राथमिकता देनी ही पड़ेगी. 

तकनीक का हो इस्तेमाल 
आज भी बहुत बुरा लगता है जब मैं सरकारी महकमों को पुराने ज़माने की तकनीक को ढोता हुआ देखता हूँ. पुरानी तकनीक के कारण सरकारी विभाग बहुत ही बेहाल नजर आते हैं. पता नहीं क्यों सरकारी अधिकारी नयी तकनीक को लागू करना ही नहीं चाहते. कई विभागों में तो कम्प्यूटर डब्बों में बंद पड़े रहते हैं - वर्सो तक. एक व्यक्ति मुझ से बोल : - "आज भी मैं जब आंबेडकर सर्किल के पास से गुजरता हूँ - तो ये देख के बहुत बुरा लगता है की ५-७ यातायात पुलिस कर्मी एक मोटरसाइकिल सवार के पीछे भागते हैं -क्यों क्योंकि हेलमेट नहीं है - आज के तकनीक के जमाने में क्या जरुरत है ५-७ पुलिस अधिकारियों को आम आदमी के पीछे इस तरह भगाने का? कैमरे से विडिओ रिकॉर्ड कर के मोटरसाइकल सवार के घर पर पेनल्टी का बिल भेज जा सकता है. इन ५-७ अधिकारियों को कानून व्यवस्था सुधारने और गुंडे बदमाशों को पकड़ने के काम लगाया जाए तो देश का ज्यादा कल्याण होगा. " वो व्यक्ति ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं है लेकिन उसको भी इतनी समझ है - पता नहीं कब हमारी सरकार इन छोटे छोटे बदलाव के द्वारा देश की आम जनता के कल्याण के लिए कदम उठाना शुरू करेगी? 

RICH INDIA POOR INDIA

विश्व मंच पर समृद्ध संस्कृति का  पिछड़ा हुआ देश 

विश्व एक समुदाय है और इस समुदाय में नेतृत्व तय करता है की आप की आवाज का क्या वजूद है. आज पूरी दुनिया में हर क्षेत्र में अमेरिका का नेतृत्व नजर आ रहा है. जब की हर दृस्टि से और हर क्षेत्र में भारत नेतृव प्रदान कर सकता है और उसे इस करना भी चाहिए. लेकिन ऐसा नहीं है. आज भारत की जो स्थिति है उससे कहीं ज्यादा बेहतर स्थिति होनी चाहिए. भारत सही मायने में एक शांतिप्रिय, लोकतांत्रिक, मूल्यों पर आधारित राज्य है जहाँ पर लोग अमन, तरक्की, और आपसी भाई-चारे के साथ रहते हैं लेकिन आज पूरी दुनिया को नेतृत्व देने में हम पीछे हैं. 

पूरी दुनिया में वो ही देश नेतृत्व के क्षेत्र में आते हैं जहाँ पर श्रेष्ठतम विचार, श्रेष्ठतम व्यवस्थाएं और श्रेष्ठतम जीवन मूल्य होते हैं. आज हर दृस्टि से भारत नेतृत्व के क्षेत्र में आगे होना चाहिए   - पर इस नहीं है. इसके क्या कारण है? आईये इन कारणों पर गौर करें. 

श्रेष्ठता को प्रचारित करने की जरुरत
भारत की जो खूबियां हैं उनको सही तरह से अंतरास्ट्रीय विश्व के सामने हम पेश नहीं कर पाए हैं. इस कारण हमारे देश की अच्छाइयां दबी रह गयी हैं. हमारे देश की ही कुछ अलगाववादी ताकतें देश की निंदा कर के देश की छवि ख़राब कर रही है. ये हकीकत है की इस देश में जितनी आजादी लोगों को मिल रही है उतनी शायद ही किसी अन्य देश में मिले - लेकिन उस आजादी का दुरूपयोग करते हुए कई लोग इस देश की ख़राब छवि पूरी दुनिया के सामने प्रस्तुत करने के प्रयास में लीन हैं. नतीजा आपके सामने हैं. अंतरास्ट्रीय स्तर पर सर्वेक्षण कर के इंडेक्स बनाने वाले संगठनों के द्वारा दिए गए परिणामों में हमारा देश बहुत पीछे नजर आता है (जो की हकीकत नहीं है). जैसे  -२०१६ के प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में हमारे देश को मुश्किल स्थिति में बताया गया है जबकि बहुत ही ख़राब हालात वाले देशों को हमारे से बेहतर बताया गया है  (क्योंकि उन देशों से कोई नकारात्मक समाचार नहीं आते हैं जबकि हमारे देश से हमारे ही भाई लोग नकारात्मक समाचार फैला रहे हैं - जो सही नहीं है). यही हाल २०१६ के इंडेक्स ऑफ़ इकनोमिक फ्रीडम में हमारी रैंकिंग का है. 

अगर हम ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स की तरफ देखते हैं तो उस इंडेक्स में भारत का १३०वा स्थान है - जबकि की कई पिछड़े हुए देश हमारे से आगे दिखाए गए हैं. मैं नहीं कहता की हम नम्बर एक स्थान पर आने वाले देश नॉर्वे से आगे हैं लेकिन मैं ये भी मानने के लिए तैयार नहीं हु की हमारे देश की स्थिति इतनी खराब है की इसका स्थान १३० हो. लगभग यही हाल हमारे देश का अधिकाँश विकास सर्वेक्षणों में दृष्टिगत होता है. 
क्या कारण है हमारे इस पिछड़े पन का? 
हम पिछड़े नहीं होते हुए भी पूरी दुनिया की नजर में पिछड़े हैं. हम गंवार नहीं होते हुए भी पूरी दुनिया की नजर में गंवार हैं. इसके क्या कारण है?  आप स्वयं इस बात को देख सकते हैं की हमारे देश के कई लोग हमारे देश की गलत तस्वीर पूरी दुनिया के सामने पेश करते हैं. कई स्वयं सेवी संगठन विदेशों से दान बटोरने के लिए देश की गरीबी की वीभत्स तस्वीर पूरी दुनिया के सामने चित्रित करते हैं और हर साल दान बटोरते रहते हैं. इसी प्रकार कई संगठन देश की खस्ता हालात का रोना रो रो कर पूरी दुनिया के सामने हमारे बारे में गलत चित्रण करते रहते हैं. आज आम विदेशी व्यक्ति के मन में भारत के गावों की बड़ी ही डरावनी और वीभत्स (बहुत ही गरीब और फटेहाल लोग) तस्वीर प्रस्तुत की जा रही है और कई विदेशी तो भारत की गरीबी और भुखमरी देखने के लिए ही यहाँ चले आते हैं. वे गरीबी का चित्रण कर के अपनी दाल-रोटी सेकते हैं. इस तरह से तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर पेश करने से क्या फायदा? शायद कुछ स्वयं सेवी संस्थाओं को दान मिल जाता है - पर पुरे देश को इससे कितना नुक्सान हो रहा है - आज कोई भी विदेशी भारत की अद्भुत समृद्ध परम्पराओं, अमन और चैन और भाईचारे की जीवनशैली  और अद्भुत जीवन मूल्यों को जान ही नहीं सकता है. बिना भारत को जाने पूरी दुनिया इसे एक गरीब और पिछड़ा हुआ देश मान रही है. जबकि हमारे देश की समृद्ध परम्पराओं और जीवन शैली के आगे पश्चिम के तथाकथित विकसित देश कुछ भी नहीं हैं. 

क्या हम जानते हैं इस गरीबी की मार्केटिंग के दुष्परिणाम? 
दुनिया में हर चीज की मार्केटिंग होती है और भारत के लोग गरीबी की मार्केटिंग में जुटे हैं. इस गरीबी की मार्केटिंग से उनके निहित स्वार्थ पुरे होते हैं लेकिन दुष्परिणामों के बारे में समझना जरुरी है. १९६० के दशक से हम हमारे देशवासियों को रटाते आ रहे हैं की भारत एक पिछड़ा हुआ देश है (जो की गलत हैं) और आम भारतीय अनपढ़, जाहिल और गवांर है (जो की सरासर गलत है). इस गलत शिक्षा और इस गलत मार्केटिंग का दुष्परिणाम ये हो रहा है की हमारे देश से प्रतिभा का पलायन हो रहा है - हर विद्यार्थी पढ़ लिख कर इस देश को छोड़ना चाह रहा है और देश की अद्भुत जीवन मूल्यों को ठुकराता जा रहा है. भारत के गाव गाव और शहर शहर में रची बसी अद्भुत जीवन शैली में दरारें आने लगी है. आपसी भाईचारे और आपसी विस्वास की अद्भुत संस्कृति के इस देश को ग्रहण लगाने वाले हम ही हैं कोई विदेशी नहीं है. आज हमारी परम्पराओं और हमारी संस्कृति को पिछड़ों की संस्कृति के रूप में विदेश में प्रस्तुत किया जा रहा है. समय रहते हम नहीं चेते तो हमारे अगली पीढ़ी को हम हमारी अद्भुत संस्कृति नहीं सौंप पाएंगे. 
क्या हमें पता है हमारा क्या नुक्सान हो रहा है? 
सिर्र्फ इस लिए क्योंकि हमने अपनी छवि गरीब और पिछड़े हुए देश की बनायी है इसी कारण आज हमारा स्थान किसी भी अंतरास्ट्रीय संगठन (जैसे संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन, इंटरकांटिनेंटल पैनल आन  क्लाइमेट चेंज आदि) में वर्चस्व नहीं है. सिर्फ इसी कारण किसी भी भारतीय विस्वविद्यालय का स्थान शीर्ष १०० विष्वविद्यालयों में नहीं है. सिर्फ इसी कारण हिंदी में लिखे हुए लेख शोध पत्र के रूप में अपनी पहचान नहीं बना पाते हैं. सिर्फ इसी कारण भारतीय लेखकों की हिंदी में लिखी हुई पुस्तकों की विदेशों में कोई मांग नहीं है न ही हिंदी भाषा को वो सम्मान मिल पा रहा है जो की मिलना चाहिए. सिर्फ इसी कारण आम भारतीय हीन भावना से ग्रसित होता जा रहा है. आज जिन जिन शहरों में विदेशी ज्ञान के प्रसार से तथाकथित विकास हुआ है वहां वहां पर हिंसा, और आपसी भाईचारा काम ही हुआ है और हकीकत में हर तरफ असभ्यता ही नजर आती है. लेकिन जिन राज्यों, शहरों और गावों  को पिछड़ा और पुराना माना जा रहा है  (जैसे राजस्थान) - थोड़ी बहुत सभ्यता के अवशेष भी वहीँ पर नजर आते हैं. वैचारिक स्तर पर देखें तो आज अंतरास्ट्रीय स्तर पर जितनी भी चर्चा होती है - उसके लिए तथाकथित पिछड़े हुए भारत को जो ज्ञान और समझ है वैसी समझ किसी भी तथाकथित विकसित प्रान्तों में नहीं मिलती है. फिर  भी आज हम ललाट पर लिख कर घूम रहे हैं की हम पिछड़े हैं. 

आज फिर से विश्व स्तर पर नेतृत्व की चाह जगानी पड़ेगी और फिर से हमारे अंदर सोये हुए विवेकानंद, महावीर, बौद्ध, और पतंजलि को जगाना पड़ेगा. आज फिर से हमें अपनी छवि को बदलना होगा और पिछड्रे नहीं अगड़े बनना पड़ेगा. सोच बदलो - पूरी दुनिया का नजरिया बदल जाएगा. 

SALUTING ARTISTS AND CRAFTSMEN

सलाम कारीगरों - सलाम परंपरा के रखवालों

नेशनल हैंडलूम डे स्पेशल


एक दिन भारत की अद्भुत विरासत के नाम. एक दिन भारत की लुप्त होती कला के
नाम. एक दिन भारत के उन अद्भुत कलाकारों के नाम जिन्होंने हजारों वर्षों
से भारत को पूरी दुनिया का सिरमौर बनाये रखा - लेकिन आज हम ने उनको भुला
दिया. एक दिन उन कलाकारों के नाम जिन की कला से परेशान हो कर विदेशी
आक्रांताओं ने उनके हाथ कटवा दिए - लेकिन उनका हुनर नहीं चुरा सके. एक
दिन उन अद्भुत कला-साधकों के नाम जिन्होंने ऐसी ऐसी तकनीक ईजाद की -
जिसकी आज भी पूरी दुनिया दीवानी है.एक दिन उन तकनीकी वैज्ञानिकों के नाम
जिनको को सरकार तो वैज्ञानिक नहीं मानती परन्तु उनकी बनायीं हुई तकनीक को
आज भी पूरी दुनिया सलाम करती है. दिनांक ७ अगस्त को २०१५ से भारत में
नेशनल हैंडलूम डे मनाया जा रहा है. इस दिन हम सब को भारत की विश्व में एक
नयी पहचान बनाने के लिए चिंतन करना पड़ेगा. नेशनल हैंडलूम डे के द्वारा हम
सब देशवासी एक विचार करने के लिए मजबूर हुए हैं. हजारों वर्षों से ले कर
के आजादी तक हम पूरी दुनिया के वस्त्र उद्योग के बादशाह रहे हैं. इतिहास
गवाह  है की पूरी दुनिया में हमारे देश में बने कपडे ही सबसे ज्यादा बिके
हैं. शोधकर्ता ओमप्रकाश बताते हैं की वर्ष १६३० में भारत से पर्सिया को
सालाना १.५ लाख पौंड के कपडे निर्यात किये जाते थे. लगभग यही हाल हर
प्रमुख देश के साथ व्यापार में था. कलकत्ता से उस समय जो कपड़ा जापान को
निर्यात होता था उस पर उस समय १५०% से २००% का मार्जिन होता था (यानी
लागत का दुगुना मुनाफा).  भारत का पूरी दुनिया में एक वर्चस्व था.
पश्चिमी लेखकों ने भी भारत के वस्त्र उद्योग की तारीफ़ लिखी है. जे पी
वाइल्ड ने इतिहास की अपनी पुस्तकों में तीसरी से छठी शताब्दी में भारत के
प्रमुख व्यापार केंद्रों का जिक्र किया है और भारत के वस्त्र व्यापार
केंद्रों का वर्णन किया है. उससे पहले भी इतिहास में भारत के वस्त्र
व्यापार का वर्णन मिलता है. खैर एक बात निश्चित है की वस्त्र व्यापार के
क्षेत्र में भारत हमेशा सिरमौर रहा.

पूरी दुनिया अर्थ के चारों तरफ घूमती है. साड़ी विदेश नीतियां अर्थ के आस
पास ही है. आज अपने राजनीतिक वर्चस्व के कारण अमेरिका पूरी दुनिया में
आर्थिक वर्चस्व बनाने में सफल है. अमेरिका पूरी दुनिया को हथियार, तकनीक,
सॉफ्टवेर, किताबें, और आधुनिक उत्पाद बेचता है और इससे उसकी अर्थव्यवस्था
चलती है. चीन के आने के बाद आज हर चीज में चीन उत्पादन में आगे हैं लेकिन
आज भी अमेरिका अपना व्यापारिक वर्चस्व बनाये हुए है. इसी कारण वो पूरी
दुनिया पर दादागिरी कर रहा है. भारत को भी अपनी विदेशी व्यापार नीति पर
नजर डालनी पड़ेगी और अपने उद्योग-धन्दों को फिर से एक नया मुकाम दिलाना
पड़ेगा. वर्चस्व की इस लड़ाई को सरकार अनदेखा नहीं कर सकती है. प्राचीन
भारत के राजाओं ने अपने समय में भारत के उद्योग धंधों को बहुत मदद की और
इसी कारण व्यापर के क्षेत्र में भारत का वर्चस्व हुआ. पूरी दुनिया में
हजारों वर्षों तक वस्त्र व्यापार में वर्चस्व ऐसे तो बन नहीं सकता.
गुजरात के सौदागिरी वस्त्र व्यापारियों, उड़ीसा के इकट के कारीगरों और
मैसूर के सिल्क के कारीगरों को उनके राजाओं और तालुकेदारों का समर्थन
मिला और इसी कारण उन्होंने पूरी दुनिया में अपनी पहचान बनायी.

कलात्मक वस्त्र के क्षेत्र में भारत आज भी पूरी दुनिया में अपना वर्चस्व
बनाने का वजूद रखता है. आज भी कश्मीर के कशीदे, भदोही के गलीचे और
सांगानेर - बगरू के डिज़ाइनर सूट पूरी दुनिया में भारत को बेताज बादशाह
बना सकते हैं.

व्यापार को बढ़ने के लिए क्या चाहिए?  श्रेष्ठतम तकनीक, कुशल कारीगर,
अंतरास्ट्रीय सम्बन्ध, कम से कम सरकारी हस्तक्षेप, व्यापार का माहौल,
कर्मचारियों के लिए सुविधाएं, स्वास्थ्य, आवास और अन्य सुविधाएं और सुगम
  पूंजी . क्या सरकार इन क्षेत्रों में कुछ कर पायेगी? सॉफ्टवेर को बढ़ावा
देने के लिए तो सॉफ्टवेर पार्क खोले जा रहे हैं लेकिन वर्षों की अद्भुत
सम्पदा - टेक्सटाइल डिजाईन प्रिंट की कला को बढ़ावा देने के लिए क्या
टेक्सटाइल पार्क खोलने की सरकार ने कभी नहीं  सोची? अद्भुत भारतीय परंपरा
ऐसी तकनीक पर आधारित थी जो पर्यावरण के अनुकूल थी - ऐसे रंग काम में लिए
जाते थे तो शरीर को नुक्सान नहीं पहुंचाते थे - ऐसी तकनीक काम में लायी
जाती थी जिसका इतने साल बाद भी विदेशी लोग तोड़ नहीं निकाल सके थे. वर्षों
से भारत के अद्भुत कर्मचारी बहुत ही कम पगार और बहुत ही मुश्किल
परिस्थितियों में काम करते आये हैं. अहमदाबाद में सेवा और आवाज जैसी कई
संस्थाएं हैं जो इनकी मदद करने के लिए आगे आयी है.  इनको मदद क्या चाहिए
- सस्ता और सुगम आवास, सुविधाजनक सम्बंध, इनके बच्चों को पढ़ाई, सामजिक
सुरक्षा, विपत्ति में सुरक्षा आदि. इन बुनियादी सुविधाओं के लिए ये आज भी
तरस रहे हैं. चीन, मेक्सिको, बांग्लादेश, थाईलैंड आदि देशों के बढ़ते
वर्चस्व के बीच भारत के वस्त्र व्यापार को ग्रहण लग रहा है. आज भी इस
उद्योग में बड़ी संख्या में लोग रोजगार में हैं. आज भी इस उद्योग को एक
सहारे की जरुरत है.

आज भारत सरकार को फिर से भारत की मौलिक और अद्भुत तकनीक पर शोध करने के
लिए अनुरोध करने का समय आ गया है. आज फिर से भारत सरकार को गुजारिश करने
की जरुरत है की हमारी लुप्त हो रही परम्परागत तकनीक को बचाने के लिए शोध
शुरू करे और उस तकनीक को आगे बढ़ाने और उसमे परिमार्जन करने के लिए
परम्परागत तकनीक और हुनर वाले लोगों के मार्गदर्शन में नई तकनीक विकसित
की जाए जो भारत को फिर से विश्व मंच पर स्थापित कर सके. अमेरिकन तकनीक की
नक़ल  करने और उसको  बढ़ावा देने वाली  संस्थाएं  तो बहुत स्थापित  कर ली
आज भारत से भारत की स्वयं  की अद्भुत तकनीक को बचाने और फैलाने  वाली
संस्थाएं  स्थापित करने के लिए अनुरोध कर के देखते  हैं.

शायद आप इस बात से सहमत न हों - तो मेरे इस संस्मरण को जरूर पढ़े :
सांगानेर की एक वस्त्र कंपनी में मैं गया था. वहां पर भारतीय तकनीक से एक
स्कार्फ बनाया जा रहा था. मैंने   उस स्कार्फ  की कीमत  पूछी  - कीमत
थी - 10000 पौंड. वो व्यापारी एक विदेशी कंपनी के लिए कॉन्ट्रेक्ट पर काम
कर रहे हैं. कपडा भी विदेशी कंपनी भेजती है, डिजाईन भी विदेशी कंपनी
भेजती है लेकिन प्रिंट भारतीय कलाकार करते हैं - क्योंकि ये पर्यावरण
अनुकूल प्रिंट होता है जो की पूरी दुनिया में सिर्फ भारतीय कलाकार ही
सबसे अच्छा कर सकते हैं.   मैंने उससे पूछा की आपको  क्या मार्जिन मिलता
है - वो व्यापारी  बोला  - कॉन्ट्रेक्ट के तहत एक स्कार्फ पर पांच सौ से
लेकर एक हजार रूपये तक . मैंने  पूछा  क्या समस्या  है - उसने  कहा  इस
लुप्त होती  कला के न तो कोई  कारीगर हैं न ही तकनीकी  उपकरण  (जैसे
ब्लॉक ) . उसने  मुझे  लकड़ी  के ब्लॉक  दिख्याई जो २०० साल पुराने थे.

HOW TO ATTAIN TRUE INDEPENDENCE

कैसे लाएं असली आजादी? 

वर्षों पहले एक बर्बर विदेशी भारत पर आक्रमण करने आया क्योंकि उसको पता था भारत में अद्भुत विद्वान लोग रहते हैं, अद्भुत प्रतिभा है, अपार संपत्ति है और अद्भुत चेतना है. उसने भारत पर आक्रमण से पहले एक संत को अपने देश बुलवाया. दंदामिस नामक उस संत ने उस तथाकथित सम्राट को फटकार लगा के भगा दिया. जमाना बदल गया. आज हर भारतीय को विदेश में धन संपत्ति, प्रतिभा और सुख दिखाई देता है और वो लालायित रहता है विदेश जाने के लिए. विदेशी भाषा और संस्कृति को सीखना अच्छी बात है लेकिन अपनी भाषा और संस्कृति को रोंदना कहाँ तक उचित?  

देश गुलाम क्यों होते हैं? देश आजाद क्यों होते हैं? देशों को तबाह करने वाले क्या कारण है? देशों को आबाद करने वाले क्या कारण है? वो क्या हैं जो देश को स्वर्ग में बदल देते हैं? वो क्या कारण हैं जिनके कारण देश टूट जाते हैं?  आइये थोड़ी चर्चा करें इस स्वत्रन्त्र दिवस की पूर्व संध्या पर. 
इतिहास में जब जब शिक्षा का फैलाव हुआ है तब तब देशों ने तरक्की की है. जब हमारे देश में विश्वविद्यालय पूरी दुनिया में जाने जाते थे - तब हम भी पूरी दुनिया में सिरमौर थे. आज  जमाना हार्वर्ड और अन्य अमेरिकी विस्वविद्यालओं का आ गया है तो हमें भी तैयार होना पड़ेगा. शिक्षा के फैलाव से बौद्धिक चेतना फैलती है जिससे लोगों में तरक्की होती है. 

गुलामी का आधार हमारी अपनी मानसिक कमजोरी होता है. कोई भी देश तभी गुलाम बन सकता है जब उसके अपने लोग मानसिक रूप से गिरे हुए हों. हमारा पतन बाद में आया, पहले हमने अपनी बौद्धिक दक्षता की नींव को ख़तम कर दिया. जिस क्षण हमने अपनी शिक्षण संस्थाओं को समाप्त कर दिया था उसी दिन से हमारी गुलामी शुरू हो गयी थी जो अभी भी जारी है. जी हाँ अभी जो आजादी है ये तो उधार की आजादी है - असली आजादी तो तब आएगी जब हम अपनी शिक्षण संस्थाओं को तैयार करेंगे तो इस देश में बौद्धिक चेतना फैला सके और लोगों को सोचने और समझने की दक्षता प्रदान कर सके. 

कभी उन देशों को देखिये जहाँ पर तबाही हो रही है - तो तुलना कीजिये उन देशों के साथ जहाँ पर आज तरक्की अपने चरम पर है. क्या फर्क है? वही इंसान है हर जगह पर - वो ही हाड - मांस, वो ही जिजीविषा, ..फिर फर्क क्या है? फर्क तो सिर्फ शिक्षा, संस्कृति, समझ और सांस्कृतिक चेतना बोध का है. ये ही फर्क हमें हर समाज के उत्थान  ओर पतन में नजर आएगा. ये बहुत बारीक सा फर्क है. जो समाज अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा और संस्कार  देता है वो समाज तरक्की करता है और जो समाज अपने बच्चों को नशा, जुआ, ऐशो-आराम, और ऐयाशी देता है वो समाज बर्बाद हो जाता है. 

देश और राष्ट्र पूरी तरह से बौद्धिक कल्पनाएं हैं और उनको साकार करने के लिए बौद्धिक मंच चाहिए. देश और राष्ट्र पूरी तरह से हमारे संकल्प और विश्वास के पल्लवित स्वरुप है और विश्वास ही नहीं हो तो कहाँ का देश और कहाँ का राष्ट्र. देश और राष्ट्र का निर्माण करना है तो शिक्षण संस्थाओं को उस देश और राष्ट्र का निर्माता बनाइये. विद्यार्थी बीज हैं तो शिक्षण संस्थाओं को उनको वटवृक्ष बनाने के लिए तैयार कीजिये. राष्ट्र का विचार जन मानस के मस्तिष्क में स्थापित करने के लिए एक आधार चाहिए - एक भाषा, एक संस्कृति, एक उद्देश्य, साथ में आगे बढ़ने और सफल होने की अनुभूति, एक दूसरे को सम्मान और समझने  की क्षमता. एक भाषा की बात करते हैः. आजादी के समय ये कहा जा रहा था की धोड़े समय में सभी क्षेत्रों में हिंदी भाषा उपलब्ध हो जायेगी. आज हालात ये है की अधिकाँश क्षेत्रों में हिंदी भाषा में पढ़े विद्यार्थियों को सरकार और निजी क्षेत्र दोनों अंग्रेजी भाषा में प्रशिक्षित लोगों की तुलना में निचले दर्जे पर रखती है. सरकार तो हद करती है. एक तरफ कहती है की हिंदी राष्ट्र भाषा है इसे अपनाईये - पर क्यों? क्या परिणाम निकलता है? एक उदाहरण देता हूँ. भारत की शिक्षा के क्षेत्र में शीर्ष संस्था यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन विज्ञानं के व्याख्याताओं को शोध के लिए अनुदान देती है - जिसकी शर्त है की उस व्यक्ति के लेख स्कोपस  जैसी कुछ विदेशी इंडेक्स एजेंसीज द्वारा सूचीबद्ध हो. स्कोपस हिंदी भाषा में लिखे लेख तो कभी सूचीबद्ध करेगा नहीं. यानी यो व्यक्ति हिंदी भाषा में अपने लेख लिखता है उसको तो ये अनुदान कभी मिलेगा नहीं. और किसी व्याख्याता को हिंदी भाषा में लेख लिखने के लिए कोई प्रेरणा नहीं है क्योंकि सरकार के द्वारा सूचीबद्ध इंडेक्स विदेशी हैं जो सिर्फ अंग्रेजी साहित्य ही सूचीबद्ध करेंगे. जिन लोगों ने अनुदान लिया है उनके नाम वेबसाइट पर हैं. उनके प्रकाशित लेख पढ़ लीजिये  - आप भी पाएंगे उन्होंने भारत के आम जन मानस के लिए उसकी भाषा में कुछ नहीं लिखा - और जिन्होंने लिखा - उनके लिए तो सरकार के दरवाजे ही बंद हैं (जरा सोचिये आजादी के इतने साल बाद भी आज भी हमारी गुलामी की मानसिकता इस कदर हम को डस रही है की अपनी ही संस्कृति को तबाह करने वाले नियम हम खुद बना रहे हैं - आजादी के इतने साल बाद आज भी हम ये नहीं समझ पाए हैं की अपने देश को तैयार करने वाले वैज्ञानिक चाहिए हमें न की विदेशों को तकनीक निर्यात करने वाले). ये सिर्फ एक उदाहरण मात्र है - लगभग ये ही हाल सभी सांस्कृतिक पक्षों के बारे में नजर आता है. ये ही योजनाए जारी रही तो एक दिन आएगा जब देश में दो तबके होंगे - एक अंग्रेजी बोलने वाले - यानी कुलीन, और एक निम्न वर्ग - जो हिंदी और क्षेत्रीय भाषा से काम चलाएंगे. 

आज जिन देशों में ताबाही नजर आती है वहां पर बौद्धिक चेतना का अभाव है. आज जहाँ पर देश के लिए लोग कुछ भी कर सकते हैं वहां की शिक्षण संसथान वाकई शानदार हैं - वहां से सीख लेने की जरुरत है. व्यक्ति में देश प्रेम की भावना का बीजारोपण शिक्षण संस्थाओं से ही होता है और यहीं से उसे अपने देश की संस्कृति और सभ्यता का प्रशिक्षण मिलता है. 

आज अगर हम एक राष्ट्र के रूप में अपना वजूद रखते हैं तो ये सिर्फ इस लिए है की हमारे राष्ट्र को आजाद करवाने के लिए अनेकों लोगों ने अपना सबकुछ कुर्बान कर दिया था. आज हम उनको याद कर के उनके एक सपने को पूरा कर सकें तो ये हमारा कर्तव्य होगा. उनका वो एक सपना था भारत का निर्माण. पूर्व से पश्चिम तक, उत्तर से दक्षिण तक पुरे भारत में  एक अद्भुत सभ्यता और सांस्कृतिक एकता है लेकिन इस सभ्यता और संस्कृति को अगली पीढ़ी को सौंपने का काम तो शिक्षण संस्थाओं का है. 

आज कल शिक्षण संस्थान भी कोचिंग सेंटर की तरह हो गए हैं - येनकेन मेट्रिक करवा देंगे - ये ग्रेजुएशन करवा देंगे - बस ये ही है उनका उद्देश्य - फिर कैसे होगा देश का निर्माण? आज अगर एक राज्य के लोग दूसरे राज्य के लोगों को पराया मान रहे हैं, एक राज्य के लोग दूसरे राज्य के लोगों से सम्बन्ध नहीं रखना चाहते तो इसकी जिम्मेदार हमारी शिक्षण संस्थाए हैं - जो उनको वो संस्कृति और जीवन मूल्य नहीं दे पायी है जिसको हम भारत माता कहते हैं. 

स्कूलों में पढ़ाने के लिए बीएड डिग्री होना जरूरी है तो कॉलेजों में पढ़ाने के लिए नेट होना जरुरी है - लेकिन जो सबसे ज्यादा जरुरी है उसका क्या? सबसे ज्यादा जरुरी है शिक्षक को भारतीय सभ्यता और संस्कृति की समझ हो तथा वो शिक्षक विद्यार्थियों को भारतीय संस्कृति की शिक्षा दे पाए ताकि  उनको एक सुसंस्कृत देश का नागरिक होने का गर्व हो - ये  कौन देखता है? कुछ तथाकथित टॉप इंस्टिट्यूट में तो शिक्षक के रूप में उसे ही नियुक्त किया जाता है जिसने विदेश से अपनी पीएचडी की पढ़ाई की हो (और फिर वो विदेशी शिक्षा के गुणगान करता है - भले ही अपने स्वर्णिम २० साल भारत में बिताये हों)  - फिर नतीजा भी वो ही निकलता है - सारे विद्यार्थी विदेश जाते हैं और बहुराष्ट्रीय कंपनियों में सेवा करते हैं - फिर प्रश्न है कौन बनाएगा इस देश को? अंतरास्ट्रीय व्यवस्था हमारे राष्ट्र को क्षति पहुंचाए ये उचित नहीं. हम वैश्वीकरण के पक्षधर हैं लेकिन अपने अस्तित्व को मिटाने के लिए भी हम तैयार नहीं. 

VOICE FOR TRADITIONAL KNOWLEDGE SYSTEMS

क्यों     लाचार  हैं  आप  ?

पूरी दुनिया आज लाचार महसूस कर रही है क्योंकि विकास ये रास्ते विनाश की
तरफ ले जा रहे हैं = लेकिन इस समय में आप को लाचार महसूस करने की जरुरत
नहीं है क्योंकि आप के पास वो अद्भुत धरोहर है जिसकी मदद से पूरी दुनिया
की मदद की जा सकती है. यूनाइटेड नेशन्स वर्ष २०१०-२०२० के दशक को जैव
विविधता का दशक के रूप में मनाएगा. प्रश्न है जैव विविधता को कैसे बचाएं?
जैव विविधता और वर्तमान विकास प्रणाली का आपस में छतीस का आंकड़ा है -
यानी जहाँ जहाँ विकास, वहां वहां जैव विविधता का विनाश. जैव विविधता को
बढ़ावा देना है तो परम्परागत ज्ञान को बचाना पड़ेगा. जिस क्षेत्र में भी आप
देखेंगे  - आप पाएंगे की हमारी तकनीक विकास के उस दौर से गुजर रही है
जिसमे आर्थिक विकास  के लिए किसी भी संसाधन को इस्तेमाल किया जा सकता है
और किसी भी स्तर पर विनाश किया जा सकता है.

विकास बनाम विनाश: विकास की आज जो दिशा हम अपना रहे हैं उसमे हिंसा और
असहिष्णुता, प्रतिस्पर्धा और येन केन प्रकारेण अर्थोपार्जन ही हमारे जीवन
का मकसद रह गया है और इस आंधी में ऊपर से नीचे तक कोई भी अपवाद नहीं है.
हर तरफ हम अपने उद्देश्यों को पाने के लिए लाचार दिखाई देते हैं जैसे
जीवन का मकसद ही प्रतिस्पर्धा है. इस प्रतिस्पर्धात्मक जीवनशैली के कारण
विकास नहीं बल्कि विनाश के द्वार पर आ गए हैं हम. कृषि में हमने कीटनाशक
व् केमिकल खेती के द्वारा अपने स्वयं के लिए खतरे तैयार कर लिए हैं. ये
ही हाल हर क्षेत्र में हैं - तो फिर क्यों नहीं हम अपनी परम्पराओं को
संभालना और सहेजना शुरू करें  और उनको फिर से विकसित करने का प्रयास
करते?


परम्परागत चिकित्सा

जब हम विकास के आखिरी दौर पर आ कर हे महसूस कर रहे हैं की हम विकास नहीं
बल्कि विनाश के द्वार पर आ गए हैं तो हमारी नजर भारत की परंपरागत
चिकित्सा पद्धतियों पर पड़ती हैं और हम पाते हैं की उनका कोई भी मुकाबला
नहीं है - उन पद्धतियों को नजरअंदाज कर के हमने बहुत बड़ी गलती की है. आज
उन अद्भुत व्यवस्थाओं के बचे खुचे ज्ञान शाश्त्र को संभालने और संवारने
की जरुरत है.

परम्परागत विज्ञान
विज्ञान की आज नहीं वर्षों पुरानी हमारी धरोहर को फिर से खोजने की जरुरत
है और हमें पूरी दुनिया के लिए अद्भुत रहस्य मिल जाएंगे. आज फिर से हमें
विज्ञान की वो परिभाषा चाहिए जो मानव और यहाँ तक की प्राणी मात्र के हित
को ही अपना मकसद मानती है.

परम्परागत तकनीक
तकनीक की वो दिशा चाहिए जो प्राणी मात्र के कल्याण के लिए हैं न की विनाश के लिए.

परम्परागत कृषि
ओर्गानिक कृषि और कुछ नहीं परंपरागत कृषि का ही दूसरा नाम हैं आज इसी की
बोलबाला है और हमें अपनी परंपरागत कृषि को फिर से अपनाना है.

अद्भुत स्वयं सेवी लोग
भारत में लोग स्वयं सेवी है और समाज को अर्पण करना अपना मकसद मानते हैं.
एक ऐसी संस्कृति जिसमे विश्व कल्याण ही सर्वोपरि है - उसे बचाना है और
बालकों में जन कल्याण की भावना को पल्लवित करना है. करुणा इंटरनेशनल जैसी
संस्थाओं के साथ मिल कर हर बालक में प्रेम और करुणा के संस्कार फैलाने
हैं.

PARADOX OF INDIAN DEMOCRACY

सरकारी नीतियों का दोगलापन और भारतीय सांस्कृतिक विरासत 


किसी भी सरकार की नीतियों का उद्देश्य उस देश के नागरिकों की अधिकतम भलाई और उस देश के सांस्कृतिक और आर्थिक विकास को संबल प्रदान करना होता है. सरकारी नीतियों को इस तरह बनाया जाना चाहिए ताकि वो उस देश की आम जनता की विचारधारा और सोच को सही रूप में व्यक्त कर सके. सही मायने में लोकतंत्र तो वही होता है जहाँ पर सरकार आम जनता के लिए है न की हमारे देश की तरह जहाँ पर जनता सरकारी रहम के टुकड़ों की मोहताज बन गयी है. दुआ करिये की हर देश की जनता इतनी सक्षम बन सके की उसकी आवाज को सरकार सुने और उसके भले के लिए नीति - निर्माण करे. 
भारतीय संस्कृति कुछ आधारभूत मूल्यों पर टिकी हुई है. उन आधारभूत मूल्यों को समझने और अपनाने करने का उत्तरदायित्व सरकार का है. लेकिन इस नहीं हो रहा है. संस्कृतियां अपनी मजबूत आधारशिला और विरासत के कारण सरकारी अनदेखे के बावजूद वर्षों तक सलामत रह सकती है और कई बार तो सरकारी विरोध को भी झेल सकती है. सौभाग्य से भारतीय संस्कृति हजारो वर्षों की अतुल्य विरासत और जन जन में बसी अद्भुत चेतना की नींव पर खड़ी है जो इस छद्म लोकतांत्रिक सरकार और दोगने प्रशाशनिक ढाँचे की सभी कुरीतियों के बावजूद आज भी अपने को बचाये हुए है. भारतीय चिंतन और सोच हमेशा से जीवन को दो पक्षों से देखता आया है - आध्यात्मिक और भौतिक. आध्यात्मिकता को हमेशा ही सर्वोच्च स्थान मिला है. शिक्षा का उद्देश्य ही यहाँ - सा  विद्या  या  विमुक्तये है - लेकिन सरकारी नीतियों ने हमेशा इस अद्भुत विरासत को दरकिनार करने का प्रयास किया है. वर्तमान माहौल में  विद्यालयों और महाविद्यालयों में आध्यात्मिकता पल्लवित करने के कोई प्रयास नहीं हो सकते हैं. जो आध्यात्मिकता आप देख रहे हैं वो सिर्फ उन संतों के कारण है जो हर शहर, हर गाव में आज भी अपनी फक्कड़ता के साथ आत्मिक आनंद में जी रहे हैं. मेरे शहर बीकानेर में स्वामी रामसुखदास जी व् संवित सोमगिरि जी  के द्वारा जो आध्यात्मिकता की रौशनी फैलाई गयी वो ही मेरे शहर को उसकी सांस्कृतिक विरासत  दे रही है.  कुछ विष्वविद्यालयों में मैंने इस हेतु सिलेबस में परिवर्तन भी किये - परंतु जल्द ही वो परिवर्तन खारिज कर दिए गए - मेरे बाद जैसे ही नयी बोर्ड ऑफ़ स्टडीज आयी - उसने उन परिवर्तनों पर अपनी केंची चला दी. प्रश्न है की कब हम अपनी भारतीयता को जी पाएंगे. 

 आज नहीं वर्षों से लोग चाह मांग कर रहे हैं की सरकारी टैक्स के लिए एकल खिड़की योजना होनी चाहिए - जिसमे सभी सरकारी टैक्स और अन्य प्रकार के कर एक साथ निपटाए जाएँ ताकि आम व्यक्ति चैन से अपने व्यापार और उद्योग को अंजाम दे सके और देश में उद्यमिता के लिए प्रोत्साहन हो. आज इतने वर्षों के बाद गुड्स एंड सर्विस टैक्स नामक टैक्स लाया जा रहा है - लेकिन उसमे प्रस्तावित १८% की दर तो आम व्यक्ति पर महगाई का जबरदस्त बोझ दाल देगी. बहुत ज्यादा परिश्रम करने वाले व्यापारी भी अपना मार्जिन ५ से १० प्रतिशत ही रख पाते हैं. फिर सरकार के १८% मार्जिन का क्या तर्क? आखिर सरकार ऐसी क्या सेवाएं दे रही है जो सरकार के १८% टैक्स को उचित ठहराए. ध्यान रहे सरकार लगभग ३०% इनकम टैक्स, इससे भी ज्यादा दर की इम्पोर्ट ड्यूटी व् अन्य टैक्सेज तो लेती ही रहेगी. हर मकसद के लिए अलग सरकारी टैक्स तो जारी रहेंगे - जैसे पर्यावरण के लिए सरकार ४०० रूपये प्रति टन टैक्स, शिक्षा के लिए एजुकेशन सेस, आदि लेती रहती है.  जब सरकार आम व्यक्ति से सब्सिडी छोड़ने के लिए कह रही है तो वो स्वयं अपने खर्चों में कटौती करने और टैक्स रेट में कमी करने के लिए क्यों नहीं सोचती? दुबई जैसे मुल्कों से प्रेरणा ले कर उसको भी भारत को टैक्स हेवन बनाने केलिए सोचना चाहिए - ताकि यहाँ भी लोगों में व्यापार और उद्योग स्थापित करने के लिए प्रेरणा जगे न की सरकारी सिस्टम का एक  हिस्सा बनाने की मज़बूरी. 

भारतीय उप महाद्वीप के लोगों में आपसी तालमेल और वैचारिक चिंतन के बढ़ने से इस पुरे प्रदेश में फैली सांस्कृतिक विरासत अपने स्वाभाविक स्वरुप में पल्लवित हो सकेगी. इस हेतु सरकारी सहयोग और प्रोत्साहन की आवश्यकता है. लेकिन ये सरकारें भी अजीब हैं. ये वोट बैंक के लिए तो विदेशी लोगों को आने देंगी लेकिन सांस्कृतिक विमर्श और शिक्षा - विकास के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाएगी. आज हमारी सरकारों की नीतियों के कारण हथियार निर्माता देश और  असामिजक तत्व ही रोटी सेक रहे हैं. ध्यान रहे हमारे पडोसी मुल्कों के आम व्यक्ति भी हमारी तरह ही अमन पसंद हैं लेकिन सिर्फ सरकारी बहकावे में आकर वो हमारे खिलाफ हैं और हम उनके खिलाफ. कुछ हथियार निर्माता देश ये ही चाहते हैं की भारतीय उपमहाद्वीप के देश हमेशा लड़ते रहे और वो अपने हथियार बेचते रहें. अगर इस क्षेत्र के देश एकमत हो कर हथियार नहीं खरीदने, परमाणु हथियार नहीं बनाने, और एनपीटी पर हस्ताक्षर करने के फैसले ले लेते हैं तो इस पुरे क्षेत्र में इतना अमन और विकास फ़ैल सकता हैं की सारे विकसित देश हमसे जलन करने लग जाएंगे. 

सरकारी खर्च पर विज्ञापन व् प्रचार प्रसार  करने के लिए सरकारें नित नयी नीतियां प्रस्तावित करती हैं जो पहली नजर में  वाकई बहुत ही लोक-लुभावनी लगती है लेकिन असल विकास के लिए असल में लोकतंत्र लाना पड़ेगा. आज भी हम दोगले मानदंडों के बीच जी रहे हैं. एक तरफ समानता की बात होती है लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और होती है. आम व्यक्ति को आज भी छोटे से काम के लिए सरकारी महकमों में दर दर भटकना पड़ता है और बड़ों के लिए सिंगल विंडो स्कीम होती है. मेगा प्रोजेक्ट्स के लिए सरकारें खूब पैसा लगा सकती है लेकिन लघु परियाजनाओं के लिए पैसे नहीं होते हैं (जबकि हमारी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के लिहाज से लघु परियोजनाएं हमारे लिए ज्यादा उपयोगी हैं). हम सबकी इच्छा के बावजूद कानून का शासन नहीं बल्कि व्यक्तिगत जानपहचान और व्यक्तिगत प्रभाव की ही इस देश में असली सत्ता है.  

दुआ में बड़ी ताकत है और हम सब मिल कर दुआ करेंगे तो जरूर असर होगा. आईये ये दुआ करें की इस देश की अद्भुत सांस्कृतिक विरासत को बचने के लिए इस पुरे उप-महाद्वीप के लोग फिर से वैचारिक और आध्यात्मिक उत्कर्ष के लिए प्रयास करें और आपसी मेल-जोल, शिक्षा और चेतना को बढ़ाने के लिए आवाज उठायें. आज इस पुरे प्रदेश से हर वर्ष हजारों प्रतिभाओं का पश्चिम में पलायन हो रहा है लेकिन जिस दिन इस प्रदेश की सांस्कृतिक चेतना उन्मुक्त हो जायेगी उस दिन इस पुरे प्रदेश की प्रतिभा को आकाश मिल जाएगा. पकिस्तान और श्रीलंका के प्रतिभावान विद्यार्थी जब भारतीय प्रतिभा के साथ अध्ययन करेंगे तो उनको अद्भुत अपना-पन मिलेगा और जो विष फैलाया जा रहा है उसका असर खत्म हो जाएगा. मुट्ठी भर आतंकवादियों के डर से हम हमारे देश को भय, आतंक और विनाश की चेतावनी देवें और अपना पूरा पैसा हथियारों में झोंक देवे ये तो उचित नहीं हैं. जितना प्रचार आतंकी लोगों की विचारधारा का किया जा रहा है उतना अगर हमारी अद्भुत आध्यात्मिकता का किया जाए तो फिर से पूरी दुनिया भारतीय दर्शन की दीवानी हो जायेगी. आज भी गावों और छोटे छोटे कस्बों में यहाँ पर कबीर और रहीम के दोहे लोगों में आध्यात्मिकता को बचाये हुए हैं. आज भी गोपाल सिंह जैसे उत्साही युवा कबीर यात्रा आयोजित करते हैं और लोगों का मेला बड़े उत्साह से उसमे भाग लेता है. ये भारत है क्योंकि इतने सरकारी प्रचार प्रसार और विज्ञापनों के बावजूद भी आज भी किसी भी सरकारी नेता से कबीर  और कबीर जैसे फक्कड़ संत ज्यादा लोकप्रिय हैं. 

WAIT FOR TRULY INDIAN EDUCATION

इन्तजार भारतीय शिक्षा व्यवस्था का

आज जिसको देखो वो नयी पीढ़ी को संस्कार विहीन बता रहा हैऐसा क्यों हो रहा है.  इसके कारण और तह में जाने की जरुरत हैयुवा वर्ग को तैयार करने वाले शिक्षणसंस्थान और शिक्षक भी आज परेशान दिखाई दे रहे हैंछात्र राजनीति का उद्देश्य छात्रों में नेतृत्व और जिम्मेदारी का बोध पैदा करना है लेकिन ज्यादातर कॉलेजों में छात्रराजनीति के दुष्परिणाम ही दिख रहे हैं (लेकिन कई जगह पर इसकी अच्छाईया भी दिख रही है - जैसे कनोडिया कॉलेज में अद्भुत अनुशाशन और जिम्मेदारी बोध सेचुनाव होते हैं - वहां पर आपको कोई भी प्रिंटेड विज्ञापन या चुनाव के नाम पर पैसे की बर्बादी नहीं दिखाई देगी - ऐसे कई अपवाद हैं जो ये भी साबित करते हैं की जहाँविद्यार्थी ठान लेते हैं वहां पर वो बेहतरीन व्यवस्था  स्थापित कर  के रहते हैं चाहे इसके लिए उनको तूफानों से लड़ना पड़े). आम तौर पर आधुनिक शिक्षा व्यवस्था हीविद्यार्थियों को तैयार करने के लिए जिम्मेदार हैआम तौर पर शिक्षा व्यवस्था की दिशा और दशा तय करने वाली सरकार ही है
भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री लालबहादुर शास्त्री जी ने अपनी डिग्रीयां जला  दी और और पूरी तरह से भारतीय शिक्षा संस्थान काशी विद्यापीठ से पढ़ाई की और उसकी डिग्रीशास्त्री को अपने नाम के साथ लगायाये इस लिए किया क्योंकि उस समय के नेताओं ने लोगों से भारतीय शिक्षा व्यवस्था पर आधारित शिक्षा हासिल करने काआह्वान किया थाशास्त्री जी जैसे हजारों लोगों ने अपनी डिग्रियों की होली लगायीउम्मीद रही होगी की आजादी के बाद पूरी तरह से भारतीय शिक्षा व्यवस्था कीशुरुआत होगीउस समय अनेक उद्योगपति आगे आये और इस हेतु प्रयास शुरू किये - परन्तु आजादी के बाद वो सारे प्रयास रुक से गए.
आप को पता होगा की उनीस वी  शताब्दी के शुरू में अंग्रेजों ने  लाख रूपये की राशि का बजट इसी हेतु रखा की भारतियों को अंग्रेजी पढ़ाएंगे और अंग्रेजी संस्कृतिसिखाएंगे - उनको आज  शायद कुछ ख़ुशी तो कुछ अफ़सोस होगा की भारतियों को अपने हाल पर छोड़ देने के बाद तो बिना रूपये के ही भारतीय लोग अंग्रेजी शिक्षा कोफैला रहे हैं और अंग्रेजी संस्कृति को फैला रहे हैं.
आजादी के बाद उसी शिक्षा व्यवस्था को सरकार ने भरपूर आर्थिक सहायता दी जिसका विरोध आजादी से पहले हम करते आये हैंकुछ पश्चिमी देशों के पाठ्यक्रमों कीनक़ल कर और उनकी पुस्तकों   की नक़ल कर हम अपनी नई पीढ़ी को तैयार करने के सपने देख रहे हैंहमारे देश की जरुरत के अनुसार मौलिक शिक्षा देने के अभिनवप्रयास आजादी के बाद रुक से गए और आज तो शिक्षण संस्थाओं की बागडोर नोकरशाही के हाथ  गयी हैशिक्षा व्यवस्था कैसी हो और क्या पढ़ाया जाए - ये तय करनेका अधिकार शिक्षकों के हाथ में होना चाहिए - और स्थानीय जरूरतों के आधार पर शिक्षकों को अपनी शिक्षण संस्थाओं को तैयार करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए.शिक्षण संस्थाओं में 'पुस्तक रटाओअभियान की जगह पर चर्चासंयुक्त प्रयास और बहस का माहौल होना चाहिए ताकि विद्यार्थियों की चेतना का विकास हो सके.गाँधी जी ने इन्ही प्रयासों के साथ कई शिक्षण संस्थाओं की स्थापना करवाई जो आज भी बेहतरीन प्रयास कर रही हैं - लेकिन सरकारी नीतियों के चलते आज हम ऐसीशिक्षा व्यवस्था के गुलाम बन गए हैं जिसके कारण हम स्वयं अपना वजूद भूल रहे हैंये सही है की बहुराष्ट्रीय कंपनियों और विदेशी संस्थाओं के लिए कर्मचारी तैयारकरने के लिए हमारी शिक्षण व्यवस्था श्रेष्ठ है.

हर देश में अनेक क्षेत्रीय भाषाएँ होती हैं लेकिन क्या किसी देश में ऐसा हो सकता है की वहां की राष्ट्रीय भाषा जाने बिना व्यक्ति शीर्ष पदों पर पहुँच जाएभारत में हिंदीजाने बिना कोई भी व्यक्ति आई  ऐस (IAS)  जैसी सबसे महत्वपूर्ण प्रतिस्पर्धा में अव्वल  सकता है - लेकिन हिंदी भाषा में दक्ष पर अंग्रेजी  जानने वाला  तोइंतिहान में असफल हो जाएगाये ही हाल राजनीति के मंच पर हैहिंदी जाने बिना ही व्यक्ति देश के सर्वोच्च पदों पर आसीन हो सकते हैंहिंदी को बढ़ाने और देश कीसांस्कृतिक चेतना को फैलाने के लिए समुचित   प्रयास नहीं हो रहे हैंहिंदी सिनेमा का धन्यवाद जो उसके कारण आज लोग हिंदी सीख जाते हैं.  आज तक हम अपनेनोनिहालों को अपनी जरुरत के अनुसार कौशल आधारित शिक्षा व्यवस्था नहीं तय कर पाए हैं.
उत्तरपूर्वी और जम्मू कश्मीर के विद्यार्थियों को पुरे भारत में तकनीकी शिक्षा हासिल करने के लिए स्कॉलरशिप मिलती है लेकिन तकनीकी शिक्षा अंग्रेजी में मिलती है -अतः वो विद्यार्थी भी हिंदी सीखने के लिए प्रेरित नहीं होते हैंअब तो हिंदी भाषी क्षेत्रों के लोग भी अपने बच्चों को अंग्रेजी भाषी बनाना चाहते हैं - भाषा तो सिर्फ एकमाध्यम होता है - संस्कृति की गहराई तक जाना भाषा के माध्यम से आसान हो जाता हैशीघ्र ही हिंदी माध्यम पर आधारित शिक्षण संस्थाओं का अस्तित्व ही खतरे में जाएगायहीं से फिर प्रतिभा पलायन शुरू हो जाता हैएक अच्छी  बात ये है की आज भारत में विदेश में प्रवासी नागरिकों के द्वारा दुनिया में सबसे ज्यादा विदेशीमुद्रा आती हैकई विदेशी कंपनियों में तो लगभग आधे कर्मचारी भारतीय हैंअब तो भारतीय लोग उच्च पदों पर भी पहुँचने लगे हैं जैसे गूगल माइक्रौसौफ़्ट जैसीकंपनियों के सर्वोच्च अधिकारी भारतीय ही हैंपरिवर्तन की इस आंधी में भारतीय शिक्षण संस्थाएं उजड़ गयी लेकिन भारतीय प्रतिभा आज भी अपना लोहा मानव रही है.भारतीय शिक्षा व्यवस्था पश्चिमी शिक्षा व्यवस्था से कई मामलों में बिलकुल अगल थीइसमें हर विषय को अध्यात्म की गहराई से जोड़ा जाता है - यानी किसी भी विषयका विद्यार्थी उस विषय को इतने गहराई में अध्ययन करता है की उस विषय को दिव्य परालौकिक सत्ता से जोड़ पाता हैसंगीत का विद्यार्थी संगीत की पराकाष्ठा मेंअहम ब्रम्हास्मि तक पहुँच जाता है तो ये ही हाल चित्रकला के विद्यार्थी का होता हैइस अद्भुत शिक्षण व्यवस्था का लॉप होना पूरी दुनिया के लिए क्षति होगापश्चिमीशिक्षा व्यवथा इस अद्भुत भारतीय शिक्षा व्यस्था का विकल्प कभी नहीं बन पायेगीइतिहास में जो भूलें हमने कर दी वो तो अमिट बनगयी - पर जो अभी भी हमारे हाथमें हैं  उसको बचाएं कैसे?किससे  उम्मीद करें की वो भारतीय शिक्षा व्यस्था के लिए संजीवनी लाएगा?