Sunday, March 05, 2017

क्या करें ? जब अन्याय ही अन्याय हो !!!!


न्याय और अन्याय हमेशा ही दुनिया के सामने उलझने कड़ी करते रहते हैं. एक का फायदा तो दूसरे का नुक्सान. एक के साथ न्याय तो दूसरे के साथ अन्याय. एक के मन में ख़ुशी तो दूसरे के मन में घोर हताशा. आज हर दूसरे व्यक्ति के पास असंतोष और हताश के खजाने हैं. लोग नहीं जानते की क्या करें? जिसे देखो वो विद्रोह की बात कर रहा है. लेकिन क्या विद्रोह करने से समाधान निकलेगा? कोई हड़ताल कर रहा है, कोई धरना लगा रहा है तो कोई आंदोलन कर रहा है. अन्याय जारी है, लोगों का गुस्सा भी जायज है, लेकिन नुक्सान हम सब का हो रहा है. 

हम सब अपने चारों तरफ इंसानियत के चीथड़े बिखरते देख रहे हैं. कोई शक्ति का प्रदर्शन कर रहा है तो कोई धन -दौलत के बल पर अपनी बात मनवा रहा है. बेबस और बेसहारा क्या करें? कोई रास्ता नहीं नजर आ रहा है. मौन भी इंसान का इंतिहां ले रहा है. जो चुप हैं उनका सब्र खत्म हो रहा है. शान्तिपूर्ण तरीकों से लोगों को अपनी बात रखना नहीं आता है. आज लोगों को अपनी समस्यों को प्रस्तुत करने का तरीका नहीं आता है. हताश और निराश से उबरने का तरीका नहीं आता है. नेताओं में अब वो बात नहीं की आम आदमी अपनी बात पहुंचाने के लिए उनकी तरफ आस से देख सके. सत्ता और सम्पाती के लालचियों के इस दौर में इंसानियत क्या करे? आम व्यक्ति किस के पास जाए? 

जयपुर में कुछ परिश्रमी लोगों ने इ-रिक्शा शुरू किया. एक नया कदम था, नयी शुरुआत थी. लेकिन सीधे साधे सरल इन्सानों के सौ दुश्मन. कभी कोई तो कभी कोई परेशान करने लगा.गरीब, कमजोर रिक्शा-चालाक को ये नहीं समझ आ रहा था की क्या करे? क्या वो हल्ला मचाये या लड़ाई करे या फिर दर कर भाग जाए? हताश और निराश के इस क्षण में सही दिशा मिलना बहुत मुश्किल होता है. ऐसे क्षणों में कई लोग तो जान बुझ कर उकसा देते हैं और हिंसा के बीज दाल देते हैं. लेकिन उन श्रमिकों को उस समय  डॉ. सुधांशु ने  संगठन बनाने के लिए प्रेरित किया. डॉ. सुधांशु ने उनको शान्ति पूर्ण तरीके से अपने कार्य के बारे में लोगों को बताने का प्रशिक्षण दिया.  पीपल्स  ग्रीन असंगठित श्रमिक  संगठन उभर के आया. संगठन कोई भी प्रदर्शन या आंदोलन नहीं करता बल्कि परिश्रम करता है और शांति से अपनी बात समझाता है.  आज उनको कोई पुलिस वाला तंग करता है तो वे पर्यावरण को फायदा पहुंचाने के लिए अपने प्रयासों का जिक्र करते हैं और उससे अपने देश और अपने पर्यावरण के लिए काम करने का आह्वान करते हैं. आखिर पुलिस वाला भी इंसान होता है और देशभक्ति की लहार किसी को भी प्रेरित कर सकती है. जो उनको रोकने आता है वो ही उनके साथ हो जाता है. कोई उनको रोकता है तो उनके प्रयासों को नमन किये बिना नहीं रह पाता है. हताशा, निराश और कुंठा की जगह लोगों का संगठित शान्ति-पूर्ण वार्तालाप हर समस्या का समाधान कर देता है. जयपुर में आज इ-रिक्शा लोकप्रिय होता जा रहा है. इससे प्रदुषण भी काम हो रहा है, लोगों को भी सुविधा मिल रही है और बेरोजगारों को आत्मविश्वास भरा नेक काम मिल रहा है.  

आज भी अहिंसक तरीकों में जो ताकत है वो किसी और तरीके में नहीं है. आज भी एक कमजोर आदमी अपने परिश्रम, सच्चाई, नेक इरादे और संगठन की शक्ति से किसी भी ताकत से झूझ सकता है. आज भी मुस्कुराके किसी भी दमन - कारी को रोका जा सकता है. जीवन का नाम ही चुनॉती है तो इंसानियत के सामने तो चुनोतियों  का झांझावात हमेशा ही रहेगा. सरकार कब कब आएगी. हम को ही पहल कर के संगठित हो प्रेम, आपसी संवाद और मधुरता के साथ अद्भुत आयाम स्थापित करने होंगे. जो दमन को सह रहे हैं - उनको न तो हताश होना है, न निराश होना है न ही दमन को सहन है. अपनी बात को रखने का तरीका बदलना है और अहिंसा में अपना विश्वास बढ़ाना है. न्याय और इंसानियत को कुछ समय के लिए दबाया जा सकता है लेकिन मिटाया नहीं जा सकता - और अंत में जीत तो इसी की होगी. जो सुकून इंसानियत को पुनःस्थापित करने में मिलेगा वो कहीं और नहीं मिल सकता. . 

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