Sunday, January 29, 2017

POVERTY AND HUNGER

भुखमरी : सबसे  बड़ी मानवकृत त्रासदी

(१६ अक्टूबर को वर्ल्ड फ़ूड डे पर विशेष)



दुनिया की सबसे भीषण त्रासदी है भुखमरी. इसके जिम्मेदार हमलोग हैं  -
हमारे नीति निर्माता हैं, हमारी व्यवस्थाएं हैं - और इसके परिणाम भयावह
व्  अकल्पनीय हैं. हर वर्ष ३१ लाख बच्चे भुखमरी और कुपोषण से दुनिया से
असमय विदा हो जाते हैं. पूरी दुनिया में ८० करोड़ लोग भुखमरी के शिकार
हैं. हर नो में से एक व्यक्ति भुखमरी का शिकार है. अफ्रीका और एशिया
महाद्वीप भुखमरी और कुपोषण से सबसे ज्यादा  प्रभावित हैं.

पांच साल से छोटे बच्चों में कुपोषण के मामलों में अफ़ग़ानिस्तान, भारत,
पाकिस्तान, घाना, इथियोपिया, यमन, सोमालिया, नाइजर, कांगो आदि देश सबसे
ज्यादा प्रभावित हैं. हर दस सेकण्ड में कहीं न कहीं कोई न कोई बालक
कुपोषण के कारण काल के ग्रास में समा रहा है. इन मौतों के पीछे जिम्मेदार
हैं हमारी नीतियां जो लोगों को भुखमरी के लिए मजबूर कर रही है. गरीब लोग
अपने आप नहीं हुए हैं. ये वो लोग हैं जो हमारे नीतिगत निर्णयों के कारण
गरीब हुए हैं. विकासशील देशों में सरकारें बहुत ज्यादा महंगाई की नीति से
चलती हैं  - क्योंकि महंगाई की नीति ही बहुराष्ट्रीय कंपनियों और बड़े
उप्तादकों को लाभदायक होती है. सरकार अपने कर्मचारियों को महगाई भत्ता दे
कर चुप कर देती है.लेकिन अधिकाँश जनसख्या इस नीति से बुरी तरह पिस जाता
है. उसका कुटीर उद्योग तो चौपट हो जाता है. तीन चौथाई गरीब लोग परंपरागत
कृषि और कुटीर उद्योगों में जुड़े हुए हैं - जो बढ़ती महगाई के कारण अपना
घर नहीं चला पाते हैं और शहरों की तरफ पलायन के लिए मजबूर हो जाते हैं.
बड़ी कम्पनियाँ और उपक्रम  लुभावने पैकेज दे कर लोगों को अपने यहाँ पर
नोकरी रख लेते हैं लेकिन ये बात कोई नहीं जानता की इन कंपनियों की कमाई
से कभी बरकत नहीं होती है और उनके गावों का सुखी जीवन उनसे हमेशा के लिए
छूट जाता है. शहरी व्यवस्थाएं पूरी तरह से चरमरा चुकी हैं

भारत में दुनिया के सबसे ज्यादा लोग भूखे सोते हैं - रोज २० करोड़ लोग. एक
तिहाई बच्चे और आधी महिलायें कुपोषण और अनीमिया से प्रभावित हैं. हर दिन
३००० बच्चे भुखमरी के कारण काल के क्रूर ग्रास में समां जाते हैं. इन
सबका एक बड़ा कारण है जनसँख्या समस्या. कोई सरकार जनसँख्या नियंत्रण की
नीति को कठोरता से लागू नहीं करना चाहती - और इसी कारण हर साल भारत में
ऑस्ट्रेलिया से भी ज्यादा की जनसख्या पैदा हो जाती है. हम कृषि में ऐसी
तकनीक आयत कर रहे हैं जो बड़े खेतों के लिए उचित है - लेकिन जनसख्या
विस्फोट के कारण हर दिन खेतों का आकार छोटा हो रहा है.

आज हम सबको मिल कर सरकारों पर दबाव डालना पड़ेगा तभी निम्न नीतिगत काम हो
पाएंगे - (ये तो सिर्फ  कुछ उदहारण है - सरकारी नीतियों के कारण ही हमारी
आधी आबादी गरीबी के गर्त में फिसल रही है)

·         नदियों का पानी पुरे देश की अमानत है और इसलिए उनको एक दूसरे
से जोड़ा जाए और उनके पानी की राजनीति को बंद किया जाए

·         हर शहर के केंद्रीय स्थान पर परंपरागत उद्योगों, कुटीर
उद्योगों और असंगठित क्षेत्र के व्यापारियों के लिए व्यावसायिक भवन होना
चाहिए

·         हर सरकारी नीति का गरीब से गरीब लोगो पर क्या प्रभाव पड़ रहा है
उसका अध्ययन  हो

·         सूक्ष्म तकनीक के विकास पर बल हो न की मेगा - टेक्नॉलॉजि के विकास पर



छोटे किसान, छोटे उद्यमी और छोटे व्यापारी हर विकासशील देश का आधार हैं
और ये ही आज सबसे ज्यादा पिस रहे हैं. इनको कम ब्याज पर ऋण चाहिए लेकिन
सरकारें विदेशी पूंजी आकर्षित करने के लिए जान बुझ कर ब्याजदर ज्यादा
रखती हैं. इनको आसान ऋण चाहिए लेकिन बैंकिंग व्यवस्थाएं संगठित क्षेत्र
के पक्ष में हैं और ये उन व्यवस्थाओं में फिट नहीं हो पाते हैं. विक्सित
देशों में ब्याज दरें विकासशील देशों की तुलना में एक चौथाई से भी काम है
और इसी कारण वहां पर व्यापार और उद्यम फायदे मंद होता है. जबकि विकासशील
देश जान बुझ कर असंगठित क्षेत्र का गाला घोंट रहे हैं और अपने यहाँ पर
अपनी नीतियों से  गरीबी की खेती कर रहे हैं.


आज की सरकारी नीतियां बड़े उद्योगों और संगठित क्षेत्रे के लाभ के लिए हैं
और सरकार असंगठित क्षेत्र को हतोत्साहित कर रही है. आम जनता छोटे और
कुटीर उद्योग चलती है जिनका सम्बन्ध आस पास के रहने वाले लोगों तक होता
है. ये उद्योग कुशलता, सूक्ष्म तकनीक, स्वनिर्भरता के आदर्श उदाहरण होते
हैं. लेकिन इन से ये उम्मीद करना की ये टैक्स का हिसाब रखेंगे, रोज का
विवरण सरकार को जमा करवाएंगे और सरकारी महकमों में लाइन लगा कर खड़े होने
- कुछ उचित नहीं है. टैक्स के बढ़ते झमेलों और बढ़ती सरकारी लगामों के बीच
छोटा उद्यमी तो कुछ कर ही  नहीं पायेगा. अगर सरकार वाकई विकास चाहती है
तो उसको भारत को टैक्स फ्री देश बनाने के लिए सोचना चाहिए - जिससे हर
व्यक्ति लघु -उद्यमी बनने की सोचे न की टैक्स सलाहकार बनने की (आज की
स्थिति तो ये ही है की उद्यमी बनने से बेहतर है टैक्स सलाहकार बनना).
हमारे देखते ही देखते लाखों कुटीर उद्योग तबाह हो गए हैं और बचे- खुचे भी
हो जाएंगे - नतीजा होगा भयंकर गरीबी, भुखमरी और त्रासदी. बड़ी कंपनियां ,
बड़े उपक्रम और बड़ी तकनीकें (जिसको सरकार का वरदहस्त प्राप्त है) कभी भी न
तो बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन कर पाएंगे न लोगों को खुशहाली दे पाएंगे.
अगर सरकारी समर्थन न मिले तो ये बड़े उद्योग सूक्ष्म उद्योगों के आगे टिक
ही नहीं सकते हैं. लेकिन सरकार और पूरा का पूरा तंत्र आज संगठित क्षेत्र
के पक्ष में है.



दुनिया में हर व्यक्ति के लिए पर्याप्त भोजन है लेकिन जीवनशैली की शिक्षा
न होने के कारण ९० करोड़ लोगों का भोजन रोजाना झूठा डाल दिया जाता है.
अकुशल व्यवस्था के कारण काफी अनाज बेकार हो  जाता है - सड़ जाता है या
उसको फेंकना पड़ जाता है. अधिक आमदानी की चाह में किसान वाणिज्यिक फसलें
उगाने लगा है और बाजरी, ज्वार, और अन्य देशी धान की खेती काम होने लगी है
- जिससे कुपोषण फैलना स्वाभाविक है. किसी भी इंसान के लिए श्रेष्ठ भोजन
उसी क्षेत्र में पाया जाना वाला देशी अनाज या धान होता है और ताज़ी देशी
वनस्पतियां  होती  है  - जिसकी खेती को अब हतोस्ताहित किया जा रहा है.
पहले गरीब से गरीब घर में भी गाय या बकरी होती थी जिससे वो पोष्टिक भोजन
प्राप्त कर सकता था - अब तो सब शहरों में कटोरा लिए खड़े हैं. रेगिस्तान
के लोगों के लिए असली फल तो काचर, टींडसी, केर, काकड़िया - मतीरा, और सबसे
पौष्टिक धान तो ज्वार - बाजरी होते हैं  - लेकिन अब वो लोग भी दूर दराज
के प्रांतों के फल (जैसे सेव आदि) के पीछे पड़े हैं ( हमारी शिक्षा
व्यवस्था में यही   समझाया जाता है)  - नतीजा है भारत में सर्वव्याप्त
कुपोषण.

EDUCATION REFORM

शिक्षा सुधार से पहले क्या हो?

शिक्षा वो होती है जो हमारे जीवन में प्रकाश ले कर आये. शिक्षा वो होती
है जो हमको बेहतर नागिरक बनाये, शिक्षा वो होती है जो हमको जीवन जीने का
तरिका सिखाये, शिक्षा हमें अपने जीवन को एक बेहतरीन लक्ष्य देती हैं. आज
हमारे देश में युवाओं में जो निराश, हताशा, बेरोजगारी और अनुशाषणहीनता
नजर आती है वो सब शिक्षा व्यवस्था के कारण है.
भारत सरकार शिक्षा के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर सुधार लाने के लिए
इच्छुक है और यही समय है की हम सब शिक्षा व्यवस्था पर मंथन करें और सरकार
से शिक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार लाने के लिए आग्रह करें. सरकार ने
अपनी वेबसाइट पर शिक्षा नीति से सम्बंधित सुझाव अलग अलग भाषाओं में
प्रकाशित किये हैं. शिक्षा नीति से जुड़े हुए सरकारी अधिकारी अभी लगातार
शास्त्री भवन दिल्ली में कार्यशालाएं कर रहे हैं. लेकिन असल शिक्षा के
लिए भारत के नीति-निर्माताओं को भारत के गावों को समझना पड़ेगा. जब
महात्मा गाँधी अफ्रीका से भारत आये तब उनको उनके राजनीतिक गुरु गोपाल
कृष्ण गोखले ने भारत भ्रमण का सुझाव दिया था. काश ऐसा ही कोई सुझाव भारत
के नीतिनिर्माताओं को देवे जो भारत को समझ कर शिक्षा नीति बनाये न की
विदेश के देखा देखि.
भारत में वर्षों से बच्चों को गृह कार्य में शामिल करने की स्वस्थ परंपरा
रही है. जिसके परिणामस्वरूप बच्चों का पारिवारिक जुड़ाव भी होता है और
उसका परिपक्व विकास भी होता है. भारत की संयुक्त परिवार व्यवस्था के साथ
इस परंपरा का बड़ा अच्छा तादात्म्य रहा है लेकिन भारत के नीतिनिर्माताओं
को ये बात कोन समझाये. भारत में हर समाज के लोग अपने बच्चों को अपनी
परंपरागत कौशल को परिवार में ही सिखाते आये हैं जो की अद्भुत व्यवस्था
रही है - जिसको मान्यता और सरकारी सम्बल देने की आवश्यकता है - शायद उसी
व्यवस्था के कारण आज भी भारत के गावों और छोटे शहरों में अद्भुत
शिल्पकार, कलाकार, दक्ष लोगों की पीढ़ी तैयार हो रही है - लेकिन आगे
सरकारी बढ़ावा मिले तभी ये परंपरा बच पायेगी.
आधुनिकता हमारे सर पर बोल रही है और आज इस आधुनिकता की अंधी दौड़ में चलने
से कही बेहतर है पूरी दुनिया को आधुनिकता की एक नई दिशा दिखाई जाए  - जो
भारत- वर्ष आसानी से कर सकता है. इस दौर में सुधार की जबरदस्त गुंजाइश
है. आधुनिकता के इस दौर में व्यक्तिगत हितो को प्राथमिकता, भौतिकता को
तबज्जो और अध्यात्म की जगह पर विज्ञानं को  प्राथमिकता दी जा रही है. यह
एक अच्छी बात है की वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा दिया जाना चाहिए लेकिन उसके
लिए शिक्षा व्यवस्था में प्रयोग पर बल दिया जाना चाहिए. इस हेतु शिक्षा
में व्यापक सुधार चाहिए. विद्यार्थियों को अपने आस पास के माहौल में
वैज्ञानिकता को देखने के लिए प्रेरित करने की जरुरत है न की सिर्फ विदेशी
वैज्ञानिकों और आविष्कारकों के नाम रटाने की आज की व्यवस्था की.
सबसे पहले तो प्रतियोगी परीक्षा प्रणाली को संचालित करने वाली अलग अलग
संस्थाओं को बदलने की जरुरत है. ये सभी संस्थाएं हमारे देश के युवाओं का
भविष्य बना भी सकती हैं तो बिगाड़ भी सकती हैं. ये संस्थाएं आज किस प्रकार
के प्रश्न पूछती है - जरा गौर करिये :  १  विज्ञान - जिसमे ख़ास कर
आविष्कार, आविष्कारक, विदेशी ज्ञान पर आधारित वैज्ञानिक जानकारियां व्
वैज्ञानिक नाम. २. इतिहास - ख़ास कर युद्ध, ३. सरकारी नीतियां  व् कानून
४. अंतरास्ट्रीय खेल-कूद और प्रतिस्पर्धाएं और इनाम ५. प्रमुख
अंतरास्ट्रीय संगठन और उनके कार्य. आप किसी भी सामान्य समझ वाले व्यक्ति
से पूछिये - एक बैंक प्रबंधक या रेलवे अधिकारी /  क्लर्क बनने के लिए इन
प्रश्नों  का क्या तुक? जो प्रश्न पूछे जाने चाहिए वो निम्न होने चाहिए :
- १. मानवीय व्यवहार कौशल, व्यवहार में विनम्रता, मृदुता और
व्यवहारकुशलता कैसे आये २. मानवीय सम्बन्ध कौशल ३. भाषा कौशल - ख़ास तौर
पर स्थानीय भाषा कौशल - ४. सृजनशीलता और नवाचार करने की क्षमता  ५. भारत
की सांस्कृतिक विरासत और समरसता. ६. गणितीय दक्षता  (जोड़ बाकी गुना भाग
आदि जो उसके काम आये ).  जब तक हम इस प्रकार के परिवर्तन नहीं करेंगे -
तब तक बड़े सुधार संभव नहीं है. हर शिक्षण संस्था बच्चों को वही पढ़ाई
कराना चाहेगी जिससे बाचे प्रेतयोगी परीक्षाओं में अव्वल हो - और
प्रतियोगी परीक्षाओं में आमूल परिवर्तन सरकार को ही करना पड़ेगा. सरकार
सिर्फ शिक्षा व्यस्था में सुधार करना चाहती है लेकिन ये सुधार किसी काम
नहीं आएंगे जब तक प्रतियोगी परीक्षा प्रणाली को नहीं बदला जाता.
शिक्षा व्यवस्था में सुधार करने के नाम पर नए नए कानून आ जाते हैं. कहने
को निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन दिया जाएगा - लेकिन हर जगह पर निजी
क्षेत्र को सरकारी क्षेत्र के लोग इंस्पेक्टर के रूप में निरिक्षण करते
हैं - जो की इंस्पेक्सटर राज को बढ़ावा देता है - और उसके दुष्परिणाम आप
सब जानते हैं. शिक्षा के क्षेत्र में सेल्फ-रेगुलेटरी बॉडी की स्थापना
होनी चाहिए जिसमे निजी क्षेत्र के प्रतिनिधि और और ये एक स्वयं सेवी
संस्था हो न की सरकारी संस्था. सरकार को बड़े काम करने हैं न की एक एक
शिक्षण संस्था को चेक कर के उसको परेशान करने के काम. इंस्पेक्टर राज के
दुष्परिणाम से बचाने के लिए सरकार को इन सब कामों से अपने आप को दूर करना
ही पड़ेगा. जब निजी क्षेत्र में क्रिसिल जैसी बेहतरीन संस्थाएं रेटिंग का
काम कर सकती हैं तो निजी क्षेत्र में शिक्षण संस्थाओं की रेटिंग करने
वाली रेटिंग एजेंसीज भी बन सकती हैं.

मेरी इस चर्चा का मकसद एक वैचारिक चिंतन शुरू करना है - शिक्षा व्यवस्था
में सुधार से पहले प्रतियोगी परीक्षा प्रणाली (सभी परीक्षाओं) को बदलने
की जरुरत है. भारतीय अद्भुत ज्ञान व्यवस्था को मान्यता देने की जरुरत है,
भारतीय पारिवारिक ज्ञान को मान्यता देने की जरुरत है. शिक्षा व्यवस्था
में वो ही ज्ञान बांटा जाए जो विद्यार्थियों के काम आये या जो उनको जीवन
को बेहतर जीने में मदद करे - सिर्फ विदेशी ज्ञान को रटाने का मकसद नहीं
होना चाहिए. हमारा उद्देश्य विदेशी शिक्षण संस्थाओं को बढ़ावा देना नहीं
बल्कि हर नागरिक को सक्षम, कुशल, विवेकवान, व्यवहार कुशल और देशप्रेमी
बनाना होना चाहिए. अगर हम शिक्षा व्यवस्था में बदलाव कर पाए तो देश को एक
नयी दिशा दे पाएंगे.

CHILD EDUCATION IS CHILD RIGHT

कैलाश जी के साथ कुछ तो कीजिये: बच्चों के लिए 

(विश्व बाल दिवस २० नवंबर के सन्दर्भ में )  

२० नवम्बर को संयुक्त राष्ट्र विश्व बाल दिवस के रूप में मानते हुए हर देश से बाल अंधकारों की वकालत करता हैतीसरी दुनिया में (अल्पविकसित देशों मेंबाल-अधिकारों की स्थिति में सुधार की काफी जरुरत हैइसी हेतु संयुक्त राष्ट्र ने १९५९ और १९८९ में बाल अधिकारों के घोषणा पात्र जारी कियेइसी २० नवम्बर २०१६ कोबाल-अधिकार कार्यकर्ता श्री कैलाश विद्यार्थी पूरी दुनिया के चिंतकों और विद्वानों के साथ बाल अधिकार हेतु अपनी आवाज दिल्ली से जारी करेंगेआज श्री कैलाशविद्यार्थी और उनकी टीम की आवाज पूरी दुनिया सुनेगी.
ज्यादा दूर जाने की जरुरत नहीं है - अपने आस पास नजर दौड़ाएंगे तो हम पाएंगे की बाल अधिकार तो हम लोग भी सुनिश्चित नहीं कर पा रहे हैं अतः सबसे पहले तो श्रीकैलाश विद्यार्थी जी की बात हमको ही सुननी चाहिएश्री कैलाश सत्यार्थी का संगठन बचपन बचाओं आंदोलन इन्हीं सब समस्याओं से संघर्ष कर रहा है१९८० में उन्होंनेइस संगठन की सुरुआत की थीउनके काम से प्रभावित हो कर अशोक फाउंडेशन फॉर सोशल एन्त्रेप्रेंयूर्शिप ने उनको १९९३ में अपना फेल्लो बनाया थाउनके कार्य के लिएउनको अनेक अंतरास्ट्रीय सम्मान मिले२०१४ में उनको मलाला यूसुफजई के साथ नोबेल पीस प्राइज मिलाश्री कैलाश सत्यार्थी का संगठन १४४ देशों में बाल अधिकारों केलिए मुहीम चला रहा है.श्री कैलाश जी ने कार्पेट (गलीचे)  पर गुड-वीव नामक निशान की शुरुआत की है - ताकि कार्पेट बनाने में बाल श्रम का इस्तेमाल बंद हो. उनके प्रयास सराहनीय हैं. मैं आपको छोटू से चाय लेने से मन नहीं करूँगा - पर जब भी आपको समय मिले छोटू का मार्गदर्शन करिये उसको प्रोत्साहन दीजिये - क्या पता आपकी मदद से ये ही छोटू कमाल कर जाए. इनका बचपन तो बाल श्रम में दब गया - क्या पता आपके सहयोग से इनका भविष्य संवर जाए. 

बाल अधिकारों के लिये संयुक्त राष्ट्र ने जो घोषणा पत्र प्रकाशित किया है उसमे ५४ बाल अधिकार हैंउन अधिकारों में बच्चों के मुलभुत अधिकार हैंबाल अधिकार उनसभी बच्चों पर लागू होते हैं जो १८ साल से काम के हैंआज हम देख रहे हैं की बाल - शोषण लगातार बढ़ रहा हैबाल श्रमिकों को कानूनी रूप से बंद करने के बाद भी बालश्रम जारी हैस्कूलों में बच्चों के साथ यौन अपराध बढ़ रहे हैंबच्चों को अगवा करने की घटनाएं भी लगातार बढ़ रही हैंबच्चों को अगवा कर के बंधक बना कर के उनसेअपराध करवाये जा रहे हैं.
निम्न वर्ग अपनी मज़बूरी में जीता  है और मज़बूरी में बच्चों से गृह कार्य करवाता हैहम सब जानते हैं की देश की आधी आबादी बच्चों को अपने गृह कार्य या पैतृकव्यवसाय में साथ में लगाती है - जो उनको मज़बूरी भी हैलेकिन अफ़सोस तो इस बात पर है की आज दिन तक सरकार इन बच्चों के लिए वैकल्पिक शिक्षा व्यवस्था नहींशुरू कर पायी हैसरकार (शिक्षा नीति निर्माताभी जानती है की अधिकाँश बच्चे  से १२ बजे वाली स्कुल में नहीं  सकते क्योंकि उनको अपने घर का काम भीनिबटाना हैबीकानेर की विद्या कुञ्ज स्कुल ऐसे बच्चों को शाम को पढ़ाई करवा देती है और फिर ये बच्चे परीक्षा में प्रथम श्रेणी ले कर अपने सपनो को साकार कर लेतेहैंक्या विद्या-कुञ्ज जैसी संस्थाओं से सरकार को प्रेरणा नहीं लेनी चाहिए?
हमारी अधिकाँश जनसँख्या गावों में रहती है और गावों में शिक्षक के रूप में शहरों के लोगों की नियुक्ति हो जाती है जो वहां पर जाना भी नहीं चाहते - फिर नतीजा आपकेसामने हैंजबकि उसी गाव के पुरुषों -  महिलाओं को ये जिम्मेदारी दी जाए तो हर बच्चा अपने सपने पुरे कर पायेगा (ये जरुरी नहीं है की वो महिलायें सरकारी मानक पुरेकर पाएं जैसे बी.एड ). आये दिन हम देखते हैं की सैकड़ों बच्चों की सरकारी स्कुल में - शिक्षक होते हैं जो भी अक्सर छुट्टी पर रहते हैंगावों के बच्चों के भी सपने होतेहैंमैं ये नहीं कह रहा की उनको इंजिनीयर  या डॉक्टर बनाना है - मैं तो इतना ही कह रहा हूँ की उनके सपनो को भी उड़ान मिलनी चाहिए.
अगर आप ये सोच रहे हैं की उच्च और माध्यम वर्ग के लोगों ने बाल अधिकारों का शोषण नहीं किया है - तो आप गलत हैंहर घरहर शिक्षण संस्थाहर संगठन में बच्चोंके विचारों को सम्मान से नहीं सुना जाता है  ही उनको वो मौका दिया जाता है जो उनको मिलना चाहिएबच्चों पर बड़े लोग अपने सपने थोप देते हैं और उनकोआवश्यक संबल और प्रोत्साहन नहीं दिया जाता हैउच्च वर्ग में तो हाल बहुत ही खराब हैछोटे छोटे बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में भेज कर माता - पितानिश्चित हो जाते हैं - जहाँ बच्चे असहज और परेशान महसूस करते हैं (क्योंकि घर पर मातृ भाषा तो हिंदी या स्थानीय भाषा होती है और बालक को जबरदस्ती अंग्रेजीमाध्यम रटाया जाता है). उसके बाद बच्चों को हर साल परीक्षा में "टॉपकरना होता है - उस प्रतिस्पर्धा में बच्चे खेल-कूदयारी दोस्तीऔर अपनापन सब भूल जाते हैंबच्चे जब अंग्रेजी में गिटपिट करने लग जाते हैं तो अभिभावक खुश हो जाते हैं - लेकिन  तो बच्चे की जिज्ञासा बधाई जाती है  उसको स्वतंत्र अभिव्यक्ति का मौकादिया जाता हैउसको एक टाई वाला बाबू बनने के लिए मजबूर कर दिया जाता है -  उसकी अपनी अभिव्यक्ति कोई सुनता है  कोई उसके दिल की बात सुनता हैउसकी अभिरुचि कोई भी हो उसको मजबूर हो कर वो ही पाठ्यक्रम करना पड़ता है जिससे वो जल्द से जल्द सरकारी अधिकारी (बाबूबन सके.
जितनी बड़ी स्कूलें  उतना ही बुरा हालपहले एडमिशन बड़ी मुश्किल से मिलता है - और फिर बच्चों को धकेल दिया जाता है तोता=प्रतिस्पर्धा में - विज्ञान और गणित जैसेविषयों को भी प्रयोग से नहीं बल्कि रटा रटा के तैयार किया जाता हैपाठ्यक्रम में वो सब सामग्री होती है जो  तो विद्यार्थी के कभी जीवन में काम आएगी  विद्यार्थीकभी जीवन में देख पायेगाअपने आस पास के माहौल से जोड़ कर के शिक्षा की कोई व्यवस्था ही नहीं हैअगर कोई प्रयास भी करता है तो शिक्षण संस्थाएं उसको आने हीनहीं देती हैंउदाहरण के लिए बीकानेर में एक प्रभुद्ध शिक्षक प्रोफ़ेसर हनुमान प्रसाद व्यास प्रयोग पर आधारित विज्ञान को स्कूलों में फैलाने के लिए जतन कर रहे हैं - स्कूलों से उनको कैसा व्यवहार मिलता है  - मत पूछिये अभिभावक शिक्षक प्राचार्य कोई नहीं सोचता की ऐसा इतिहास रटाने से क्या मिलेगा जिसमे हम सिर्फमानवीय निकृष्ट की चर्चा करते हैं और निकृष्ट - पतित इंसानों का इतिहास पढाते हैं (जैसे अजातशत्रु ने अपने पिता को मार दियातो सत्ता के लिए उसके बेटे ने उसकोमार दियाइसी प्रकार सत्ता लोभी ओरंगजेब ने अपने भाइयों को मार दियातो जयचंद और मीर जाफर ने सत्ता के लोभ में गद्दारी की). बाल मन बहुत कोमल होता हैऔर उसको तो उत्कर्ष और श्रेष्ठता की कहानियां सुनाई जानी चाहिए  की इस प्रकार का इतिहाससिर्फ कुछ लेखकों को अपनी पुस्तकें बेच कर पैसा कमाना  है और उसीके लिए सारे देश के बच्चों के साथ खिलवाड़ की जा रही है

ये सिर्फ कुछ उदहारण हैं - हर साल सिलेबस को बढ़ा दिया जाता है ताकि नयी और ज्यादा बड़ी पुस्तकें बिक सकें - पर कभी बाल-मन के द्रिस्तिकों से उनका मूल्यांकन तो कीजिये. मैं तो अनुरोध करूँगा की सिलेबस निर्माण समिति के सुझावों का  बच्चों के द्वारा ही मूल्यांकन किया जाना चाहिए. बच्चों को भी उस सिलेबस निर्माण समिति में शामिल किया जाए तो क्या हर्ज हैं  ताकि बच्चों की आवाज तो वहां पहुंचे.