RICH INDIA POOR INDIA
विश्व मंच पर समृद्ध संस्कृति का पिछड़ा हुआ देश
विश्व एक समुदाय है और इस समुदाय में नेतृत्व तय करता है की आप की आवाज का क्या वजूद है. आज पूरी दुनिया में हर क्षेत्र में अमेरिका का नेतृत्व नजर आ रहा है. जब की हर दृस्टि से और हर क्षेत्र में भारत नेतृव प्रदान कर सकता है और उसे इस करना भी चाहिए. लेकिन ऐसा नहीं है. आज भारत की जो स्थिति है उससे कहीं ज्यादा बेहतर स्थिति होनी चाहिए. भारत सही मायने में एक शांतिप्रिय, लोकतांत्रिक, मूल्यों पर आधारित राज्य है जहाँ पर लोग अमन, तरक्की, और आपसी भाई-चारे के साथ रहते हैं लेकिन आज पूरी दुनिया को नेतृत्व देने में हम पीछे हैं.
पूरी दुनिया में वो ही देश नेतृत्व के क्षेत्र में आते हैं जहाँ पर श्रेष्ठतम विचार, श्रेष्ठतम व्यवस्थाएं और श्रेष्ठतम जीवन मूल्य होते हैं. आज हर दृस्टि से भारत नेतृत्व के क्षेत्र में आगे होना चाहिए - पर इस नहीं है. इसके क्या कारण है? आईये इन कारणों पर गौर करें.
श्रेष्ठता को प्रचारित करने की जरुरत
भारत की जो खूबियां हैं उनको सही तरह से अंतरास्ट्रीय विश्व के सामने हम पेश नहीं कर पाए हैं. इस कारण हमारे देश की अच्छाइयां दबी रह गयी हैं. हमारे देश की ही कुछ अलगाववादी ताकतें देश की निंदा कर के देश की छवि ख़राब कर रही है. ये हकीकत है की इस देश में जितनी आजादी लोगों को मिल रही है उतनी शायद ही किसी अन्य देश में मिले - लेकिन उस आजादी का दुरूपयोग करते हुए कई लोग इस देश की ख़राब छवि पूरी दुनिया के सामने प्रस्तुत करने के प्रयास में लीन हैं. नतीजा आपके सामने हैं. अंतरास्ट्रीय स्तर पर सर्वेक्षण कर के इंडेक्स बनाने वाले संगठनों के द्वारा दिए गए परिणामों में हमारा देश बहुत पीछे नजर आता है (जो की हकीकत नहीं है). जैसे -२०१६ के प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में हमारे देश को मुश्किल स्थिति में बताया गया है जबकि बहुत ही ख़राब हालात वाले देशों को हमारे से बेहतर बताया गया है (क्योंकि उन देशों से कोई नकारात्मक समाचार नहीं आते हैं जबकि हमारे देश से हमारे ही भाई लोग नकारात्मक समाचार फैला रहे हैं - जो सही नहीं है). यही हाल २०१६ के इंडेक्स ऑफ़ इकनोमिक फ्रीडम में हमारी रैंकिंग का है.
अगर हम ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स की तरफ देखते हैं तो उस इंडेक्स में भारत का १३०वा स्थान है - जबकि की कई पिछड़े हुए देश हमारे से आगे दिखाए गए हैं. मैं नहीं कहता की हम नम्बर एक स्थान पर आने वाले देश नॉर्वे से आगे हैं लेकिन मैं ये भी मानने के लिए तैयार नहीं हु की हमारे देश की स्थिति इतनी खराब है की इसका स्थान १३० हो. लगभग यही हाल हमारे देश का अधिकाँश विकास सर्वेक्षणों में दृष्टिगत होता है.
क्या कारण है हमारे इस पिछड़े पन का?
हम पिछड़े नहीं होते हुए भी पूरी दुनिया की नजर में पिछड़े हैं. हम गंवार नहीं होते हुए भी पूरी दुनिया की नजर में गंवार हैं. इसके क्या कारण है? आप स्वयं इस बात को देख सकते हैं की हमारे देश के कई लोग हमारे देश की गलत तस्वीर पूरी दुनिया के सामने पेश करते हैं. कई स्वयं सेवी संगठन विदेशों से दान बटोरने के लिए देश की गरीबी की वीभत्स तस्वीर पूरी दुनिया के सामने चित्रित करते हैं और हर साल दान बटोरते रहते हैं. इसी प्रकार कई संगठन देश की खस्ता हालात का रोना रो रो कर पूरी दुनिया के सामने हमारे बारे में गलत चित्रण करते रहते हैं. आज आम विदेशी व्यक्ति के मन में भारत के गावों की बड़ी ही डरावनी और वीभत्स (बहुत ही गरीब और फटेहाल लोग) तस्वीर प्रस्तुत की जा रही है और कई विदेशी तो भारत की गरीबी और भुखमरी देखने के लिए ही यहाँ चले आते हैं. वे गरीबी का चित्रण कर के अपनी दाल-रोटी सेकते हैं. इस तरह से तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर पेश करने से क्या फायदा? शायद कुछ स्वयं सेवी संस्थाओं को दान मिल जाता है - पर पुरे देश को इससे कितना नुक्सान हो रहा है - आज कोई भी विदेशी भारत की अद्भुत समृद्ध परम्पराओं, अमन और चैन और भाईचारे की जीवनशैली और अद्भुत जीवन मूल्यों को जान ही नहीं सकता है. बिना भारत को जाने पूरी दुनिया इसे एक गरीब और पिछड़ा हुआ देश मान रही है. जबकि हमारे देश की समृद्ध परम्पराओं और जीवन शैली के आगे पश्चिम के तथाकथित विकसित देश कुछ भी नहीं हैं.
क्या हम जानते हैं इस गरीबी की मार्केटिंग के दुष्परिणाम?
दुनिया में हर चीज की मार्केटिंग होती है और भारत के लोग गरीबी की मार्केटिंग में जुटे हैं. इस गरीबी की मार्केटिंग से उनके निहित स्वार्थ पुरे होते हैं लेकिन दुष्परिणामों के बारे में समझना जरुरी है. १९६० के दशक से हम हमारे देशवासियों को रटाते आ रहे हैं की भारत एक पिछड़ा हुआ देश है (जो की गलत हैं) और आम भारतीय अनपढ़, जाहिल और गवांर है (जो की सरासर गलत है). इस गलत शिक्षा और इस गलत मार्केटिंग का दुष्परिणाम ये हो रहा है की हमारे देश से प्रतिभा का पलायन हो रहा है - हर विद्यार्थी पढ़ लिख कर इस देश को छोड़ना चाह रहा है और देश की अद्भुत जीवन मूल्यों को ठुकराता जा रहा है. भारत के गाव गाव और शहर शहर में रची बसी अद्भुत जीवन शैली में दरारें आने लगी है. आपसी भाईचारे और आपसी विस्वास की अद्भुत संस्कृति के इस देश को ग्रहण लगाने वाले हम ही हैं कोई विदेशी नहीं है. आज हमारी परम्पराओं और हमारी संस्कृति को पिछड़ों की संस्कृति के रूप में विदेश में प्रस्तुत किया जा रहा है. समय रहते हम नहीं चेते तो हमारे अगली पीढ़ी को हम हमारी अद्भुत संस्कृति नहीं सौंप पाएंगे.
क्या हमें पता है हमारा क्या नुक्सान हो रहा है?
सिर्र्फ इस लिए क्योंकि हमने अपनी छवि गरीब और पिछड़े हुए देश की बनायी है इसी कारण आज हमारा स्थान किसी भी अंतरास्ट्रीय संगठन (जैसे संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन, इंटरकांटिनेंटल पैनल आन क्लाइमेट चेंज आदि) में वर्चस्व नहीं है. सिर्फ इसी कारण किसी भी भारतीय विस्वविद्यालय का स्थान शीर्ष १०० विष्वविद्यालयों में नहीं है. सिर्फ इसी कारण हिंदी में लिखे हुए लेख शोध पत्र के रूप में अपनी पहचान नहीं बना पाते हैं. सिर्फ इसी कारण भारतीय लेखकों की हिंदी में लिखी हुई पुस्तकों की विदेशों में कोई मांग नहीं है न ही हिंदी भाषा को वो सम्मान मिल पा रहा है जो की मिलना चाहिए. सिर्फ इसी कारण आम भारतीय हीन भावना से ग्रसित होता जा रहा है. आज जिन जिन शहरों में विदेशी ज्ञान के प्रसार से तथाकथित विकास हुआ है वहां वहां पर हिंसा, और आपसी भाईचारा काम ही हुआ है और हकीकत में हर तरफ असभ्यता ही नजर आती है. लेकिन जिन राज्यों, शहरों और गावों को पिछड़ा और पुराना माना जा रहा है (जैसे राजस्थान) - थोड़ी बहुत सभ्यता के अवशेष भी वहीँ पर नजर आते हैं. वैचारिक स्तर पर देखें तो आज अंतरास्ट्रीय स्तर पर जितनी भी चर्चा होती है - उसके लिए तथाकथित पिछड़े हुए भारत को जो ज्ञान और समझ है वैसी समझ किसी भी तथाकथित विकसित प्रान्तों में नहीं मिलती है. फिर भी आज हम ललाट पर लिख कर घूम रहे हैं की हम पिछड़े हैं.
आज फिर से विश्व स्तर पर नेतृत्व की चाह जगानी पड़ेगी और फिर से हमारे अंदर सोये हुए विवेकानंद, महावीर, बौद्ध, और पतंजलि को जगाना पड़ेगा. आज फिर से हमें अपनी छवि को बदलना होगा और पिछड्रे नहीं अगड़े बनना पड़ेगा. सोच बदलो - पूरी दुनिया का नजरिया बदल जाएगा.

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