WAIT FOR TRULY INDIAN EDUCATION
इन्तजार भारतीय शिक्षा व्यवस्था का
आज जिसको देखो वो नयी पीढ़ी को संस्कार विहीन बता रहा है. ऐसा क्यों हो रहा है. इसके कारण और तह में जाने की जरुरत है. युवा वर्ग को तैयार करने वाले शिक्षणसंस्थान और शिक्षक भी आज परेशान दिखाई दे रहे हैं. छात्र राजनीति का उद्देश्य छात्रों में नेतृत्व और जिम्मेदारी का बोध पैदा करना है लेकिन ज्यादातर कॉलेजों में छात्रराजनीति के दुष्परिणाम ही दिख रहे हैं (लेकिन कई जगह पर इसकी अच्छाईया भी दिख रही है - जैसे कनोडिया कॉलेज में अद्भुत अनुशाशन और जिम्मेदारी बोध सेचुनाव होते हैं - वहां पर आपको कोई भी प्रिंटेड विज्ञापन या चुनाव के नाम पर पैसे की बर्बादी नहीं दिखाई देगी - ऐसे कई अपवाद हैं जो ये भी साबित करते हैं की जहाँविद्यार्थी ठान लेते हैं वहां पर वो बेहतरीन व्यवस्था स्थापित कर के रहते हैं चाहे इसके लिए उनको तूफानों से लड़ना पड़े). आम तौर पर आधुनिक शिक्षा व्यवस्था हीविद्यार्थियों को तैयार करने के लिए जिम्मेदार है. आम तौर पर शिक्षा व्यवस्था की दिशा और दशा तय करने वाली सरकार ही है.
भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री लालबहादुर शास्त्री जी ने अपनी डिग्रीयां जला दी और और पूरी तरह से भारतीय शिक्षा संस्थान काशी विद्यापीठ से पढ़ाई की और उसकी डिग्रीशास्त्री को अपने नाम के साथ लगाया. ये इस लिए किया क्योंकि उस समय के नेताओं ने लोगों से भारतीय शिक्षा व्यवस्था पर आधारित शिक्षा हासिल करने काआह्वान किया था. शास्त्री जी जैसे हजारों लोगों ने अपनी डिग्रियों की होली लगायी. उम्मीद रही होगी की आजादी के बाद पूरी तरह से भारतीय शिक्षा व्यवस्था कीशुरुआत होगी. उस समय अनेक उद्योगपति आगे आये और इस हेतु प्रयास शुरू किये - परन्तु आजादी के बाद वो सारे प्रयास रुक से गए.
आप को पता होगा की उनीस वी शताब्दी के शुरू में अंग्रेजों ने १ लाख रूपये की राशि का बजट इसी हेतु रखा की भारतियों को अंग्रेजी पढ़ाएंगे और अंग्रेजी संस्कृतिसिखाएंगे - उनको आज शायद कुछ ख़ुशी तो कुछ अफ़सोस होगा की भारतियों को अपने हाल पर छोड़ देने के बाद तो बिना रूपये के ही भारतीय लोग अंग्रेजी शिक्षा कोफैला रहे हैं और अंग्रेजी संस्कृति को फैला रहे हैं.
आजादी के बाद उसी शिक्षा व्यवस्था को सरकार ने भरपूर आर्थिक सहायता दी जिसका विरोध आजादी से पहले हम करते आये हैं. कुछ पश्चिमी देशों के पाठ्यक्रमों कीनक़ल कर और उनकी पुस्तकों की नक़ल कर हम अपनी नई पीढ़ी को तैयार करने के सपने देख रहे हैं. हमारे देश की जरुरत के अनुसार मौलिक शिक्षा देने के अभिनवप्रयास आजादी के बाद रुक से गए और आज तो शिक्षण संस्थाओं की बागडोर नोकरशाही के हाथ आ गयी है. शिक्षा व्यवस्था कैसी हो और क्या पढ़ाया जाए - ये तय करनेका अधिकार शिक्षकों के हाथ में होना चाहिए - और स्थानीय जरूरतों के आधार पर शिक्षकों को अपनी शिक्षण संस्थाओं को तैयार करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए.शिक्षण संस्थाओं में 'पुस्तक रटाओ" अभियान की जगह पर चर्चा, संयुक्त प्रयास और बहस का माहौल होना चाहिए ताकि विद्यार्थियों की चेतना का विकास हो सके.गाँधी जी ने इन्ही प्रयासों के साथ कई शिक्षण संस्थाओं की स्थापना करवाई जो आज भी बेहतरीन प्रयास कर रही हैं - लेकिन सरकारी नीतियों के चलते आज हम ऐसीशिक्षा व्यवस्था के गुलाम बन गए हैं जिसके कारण हम स्वयं अपना वजूद भूल रहे हैं. ये सही है की बहुराष्ट्रीय कंपनियों और विदेशी संस्थाओं के लिए कर्मचारी तैयारकरने के लिए हमारी शिक्षण व्यवस्था श्रेष्ठ है.
हर देश में अनेक क्षेत्रीय भाषाएँ होती हैं लेकिन क्या किसी देश में ऐसा हो सकता है की वहां की राष्ट्रीय भाषा जाने बिना व्यक्ति शीर्ष पदों पर पहुँच जाए? भारत में हिंदीजाने बिना कोई भी व्यक्ति आई ऐ ऐस (IAS) जैसी सबसे महत्वपूर्ण प्रतिस्पर्धा में अव्वल आ सकता है - लेकिन हिंदी भाषा में दक्ष पर अंग्रेजी न जानने वाला तोइंतिहान में असफल हो जाएगा. ये ही हाल राजनीति के मंच पर है. हिंदी जाने बिना ही व्यक्ति देश के सर्वोच्च पदों पर आसीन हो सकते हैं. हिंदी को बढ़ाने और देश कीसांस्कृतिक चेतना को फैलाने के लिए समुचित प्रयास नहीं हो रहे हैं. हिंदी सिनेमा का धन्यवाद जो उसके कारण आज लोग हिंदी सीख जाते हैं. आज तक हम अपनेनोनिहालों को अपनी जरुरत के अनुसार कौशल आधारित शिक्षा व्यवस्था नहीं तय कर पाए हैं.
उत्तरपूर्वी और जम्मू कश्मीर के विद्यार्थियों को पुरे भारत में तकनीकी शिक्षा हासिल करने के लिए स्कॉलरशिप मिलती है लेकिन तकनीकी शिक्षा अंग्रेजी में मिलती है -अतः वो विद्यार्थी भी हिंदी सीखने के लिए प्रेरित नहीं होते हैं. अब तो हिंदी भाषी क्षेत्रों के लोग भी अपने बच्चों को अंग्रेजी भाषी बनाना चाहते हैं - भाषा तो सिर्फ एकमाध्यम होता है - संस्कृति की गहराई तक जाना भाषा के माध्यम से आसान हो जाता है. शीघ्र ही हिंदी माध्यम पर आधारित शिक्षण संस्थाओं का अस्तित्व ही खतरे मेंआ जाएगा. यहीं से फिर प्रतिभा पलायन शुरू हो जाता है. एक अच्छी बात ये है की आज भारत में विदेश में प्रवासी नागरिकों के द्वारा दुनिया में सबसे ज्यादा विदेशीमुद्रा आती है. कई विदेशी कंपनियों में तो लगभग आधे कर्मचारी भारतीय हैं. अब तो भारतीय लोग उच्च पदों पर भी पहुँचने लगे हैं जैसे गूगल माइक्रौसौफ़्ट जैसीकंपनियों के सर्वोच्च अधिकारी भारतीय ही हैं. परिवर्तन की इस आंधी में भारतीय शिक्षण संस्थाएं उजड़ गयी लेकिन भारतीय प्रतिभा आज भी अपना लोहा मानव रही है.भारतीय शिक्षा व्यवस्था पश्चिमी शिक्षा व्यवस्था से कई मामलों में बिलकुल अगल थी. इसमें हर विषय को अध्यात्म की गहराई से जोड़ा जाता है - यानी किसी भी विषयका विद्यार्थी उस विषय को इतने गहराई में अध्ययन करता है की उस विषय को दिव्य परालौकिक सत्ता से जोड़ पाता है. संगीत का विद्यार्थी संगीत की पराकाष्ठा मेंअहम ब्रम्हास्मि तक पहुँच जाता है तो ये ही हाल चित्रकला के विद्यार्थी का होता है. इस अद्भुत शिक्षण व्यवस्था का लॉप होना पूरी दुनिया के लिए क्षति होगा. पश्चिमीशिक्षा व्यवथा इस अद्भुत भारतीय शिक्षा व्यस्था का विकल्प कभी नहीं बन पायेगी. इतिहास में जो भूलें हमने कर दी वो तो अमिट बनगयी - पर जो अभी भी हमारे हाथमें हैं उसको बचाएं कैसे?किससे उम्मीद करें की वो भारतीय शिक्षा व्यस्था के लिए संजीवनी लाएगा?

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