PARADOX OF INDIAN DEMOCRACY
सरकारी नीतियों का दोगलापन और भारतीय सांस्कृतिक विरासत
किसी भी सरकार की नीतियों का उद्देश्य उस देश के नागरिकों की अधिकतम भलाई और उस देश के सांस्कृतिक और आर्थिक विकास को संबल प्रदान करना होता है. सरकारी नीतियों को इस तरह बनाया जाना चाहिए ताकि वो उस देश की आम जनता की विचारधारा और सोच को सही रूप में व्यक्त कर सके. सही मायने में लोकतंत्र तो वही होता है जहाँ पर सरकार आम जनता के लिए है न की हमारे देश की तरह जहाँ पर जनता सरकारी रहम के टुकड़ों की मोहताज बन गयी है. दुआ करिये की हर देश की जनता इतनी सक्षम बन सके की उसकी आवाज को सरकार सुने और उसके भले के लिए नीति - निर्माण करे.
भारतीय संस्कृति कुछ आधारभूत मूल्यों पर टिकी हुई है. उन आधारभूत मूल्यों को समझने और अपनाने करने का उत्तरदायित्व सरकार का है. लेकिन इस नहीं हो रहा है. संस्कृतियां अपनी मजबूत आधारशिला और विरासत के कारण सरकारी अनदेखे के बावजूद वर्षों तक सलामत रह सकती है और कई बार तो सरकारी विरोध को भी झेल सकती है. सौभाग्य से भारतीय संस्कृति हजारो वर्षों की अतुल्य विरासत और जन जन में बसी अद्भुत चेतना की नींव पर खड़ी है जो इस छद्म लोकतांत्रिक सरकार और दोगने प्रशाशनिक ढाँचे की सभी कुरीतियों के बावजूद आज भी अपने को बचाये हुए है. भारतीय चिंतन और सोच हमेशा से जीवन को दो पक्षों से देखता आया है - आध्यात्मिक और भौतिक. आध्यात्मिकता को हमेशा ही सर्वोच्च स्थान मिला है. शिक्षा का उद्देश्य ही यहाँ - सा विद्या या विमुक्तये है - लेकिन सरकारी नीतियों ने हमेशा इस अद्भुत विरासत को दरकिनार करने का प्रयास किया है. वर्तमान माहौल में विद्यालयों और महाविद्यालयों में आध्यात्मिकता पल्लवित करने के कोई प्रयास नहीं हो सकते हैं. जो आध्यात्मिकता आप देख रहे हैं वो सिर्फ उन संतों के कारण है जो हर शहर, हर गाव में आज भी अपनी फक्कड़ता के साथ आत्मिक आनंद में जी रहे हैं. मेरे शहर बीकानेर में स्वामी रामसुखदास जी व् संवित सोमगिरि जी के द्वारा जो आध्यात्मिकता की रौशनी फैलाई गयी वो ही मेरे शहर को उसकी सांस्कृतिक विरासत दे रही है. कुछ विष्वविद्यालयों में मैंने इस हेतु सिलेबस में परिवर्तन भी किये - परंतु जल्द ही वो परिवर्तन खारिज कर दिए गए - मेरे बाद जैसे ही नयी बोर्ड ऑफ़ स्टडीज आयी - उसने उन परिवर्तनों पर अपनी केंची चला दी. प्रश्न है की कब हम अपनी भारतीयता को जी पाएंगे.
आज नहीं वर्षों से लोग चाह मांग कर रहे हैं की सरकारी टैक्स के लिए एकल खिड़की योजना होनी चाहिए - जिसमे सभी सरकारी टैक्स और अन्य प्रकार के कर एक साथ निपटाए जाएँ ताकि आम व्यक्ति चैन से अपने व्यापार और उद्योग को अंजाम दे सके और देश में उद्यमिता के लिए प्रोत्साहन हो. आज इतने वर्षों के बाद गुड्स एंड सर्विस टैक्स नामक टैक्स लाया जा रहा है - लेकिन उसमे प्रस्तावित १८% की दर तो आम व्यक्ति पर महगाई का जबरदस्त बोझ दाल देगी. बहुत ज्यादा परिश्रम करने वाले व्यापारी भी अपना मार्जिन ५ से १० प्रतिशत ही रख पाते हैं. फिर सरकार के १८% मार्जिन का क्या तर्क? आखिर सरकार ऐसी क्या सेवाएं दे रही है जो सरकार के १८% टैक्स को उचित ठहराए. ध्यान रहे सरकार लगभग ३०% इनकम टैक्स, इससे भी ज्यादा दर की इम्पोर्ट ड्यूटी व् अन्य टैक्सेज तो लेती ही रहेगी. हर मकसद के लिए अलग सरकारी टैक्स तो जारी रहेंगे - जैसे पर्यावरण के लिए सरकार ४०० रूपये प्रति टन टैक्स, शिक्षा के लिए एजुकेशन सेस, आदि लेती रहती है. जब सरकार आम व्यक्ति से सब्सिडी छोड़ने के लिए कह रही है तो वो स्वयं अपने खर्चों में कटौती करने और टैक्स रेट में कमी करने के लिए क्यों नहीं सोचती? दुबई जैसे मुल्कों से प्रेरणा ले कर उसको भी भारत को टैक्स हेवन बनाने केलिए सोचना चाहिए - ताकि यहाँ भी लोगों में व्यापार और उद्योग स्थापित करने के लिए प्रेरणा जगे न की सरकारी सिस्टम का एक हिस्सा बनाने की मज़बूरी.
भारतीय उप महाद्वीप के लोगों में आपसी तालमेल और वैचारिक चिंतन के बढ़ने से इस पुरे प्रदेश में फैली सांस्कृतिक विरासत अपने स्वाभाविक स्वरुप में पल्लवित हो सकेगी. इस हेतु सरकारी सहयोग और प्रोत्साहन की आवश्यकता है. लेकिन ये सरकारें भी अजीब हैं. ये वोट बैंक के लिए तो विदेशी लोगों को आने देंगी लेकिन सांस्कृतिक विमर्श और शिक्षा - विकास के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाएगी. आज हमारी सरकारों की नीतियों के कारण हथियार निर्माता देश और असामिजक तत्व ही रोटी सेक रहे हैं. ध्यान रहे हमारे पडोसी मुल्कों के आम व्यक्ति भी हमारी तरह ही अमन पसंद हैं लेकिन सिर्फ सरकारी बहकावे में आकर वो हमारे खिलाफ हैं और हम उनके खिलाफ. कुछ हथियार निर्माता देश ये ही चाहते हैं की भारतीय उपमहाद्वीप के देश हमेशा लड़ते रहे और वो अपने हथियार बेचते रहें. अगर इस क्षेत्र के देश एकमत हो कर हथियार नहीं खरीदने, परमाणु हथियार नहीं बनाने, और एनपीटी पर हस्ताक्षर करने के फैसले ले लेते हैं तो इस पुरे क्षेत्र में इतना अमन और विकास फ़ैल सकता हैं की सारे विकसित देश हमसे जलन करने लग जाएंगे.
सरकारी खर्च पर विज्ञापन व् प्रचार प्रसार करने के लिए सरकारें नित नयी नीतियां प्रस्तावित करती हैं जो पहली नजर में वाकई बहुत ही लोक-लुभावनी लगती है लेकिन असल विकास के लिए असल में लोकतंत्र लाना पड़ेगा. आज भी हम दोगले मानदंडों के बीच जी रहे हैं. एक तरफ समानता की बात होती है लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और होती है. आम व्यक्ति को आज भी छोटे से काम के लिए सरकारी महकमों में दर दर भटकना पड़ता है और बड़ों के लिए सिंगल विंडो स्कीम होती है. मेगा प्रोजेक्ट्स के लिए सरकारें खूब पैसा लगा सकती है लेकिन लघु परियाजनाओं के लिए पैसे नहीं होते हैं (जबकि हमारी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के लिहाज से लघु परियोजनाएं हमारे लिए ज्यादा उपयोगी हैं). हम सबकी इच्छा के बावजूद कानून का शासन नहीं बल्कि व्यक्तिगत जानपहचान और व्यक्तिगत प्रभाव की ही इस देश में असली सत्ता है.
दुआ में बड़ी ताकत है और हम सब मिल कर दुआ करेंगे तो जरूर असर होगा. आईये ये दुआ करें की इस देश की अद्भुत सांस्कृतिक विरासत को बचने के लिए इस पुरे उप-महाद्वीप के लोग फिर से वैचारिक और आध्यात्मिक उत्कर्ष के लिए प्रयास करें और आपसी मेल-जोल, शिक्षा और चेतना को बढ़ाने के लिए आवाज उठायें. आज इस पुरे प्रदेश से हर वर्ष हजारों प्रतिभाओं का पश्चिम में पलायन हो रहा है लेकिन जिस दिन इस प्रदेश की सांस्कृतिक चेतना उन्मुक्त हो जायेगी उस दिन इस पुरे प्रदेश की प्रतिभा को आकाश मिल जाएगा. पकिस्तान और श्रीलंका के प्रतिभावान विद्यार्थी जब भारतीय प्रतिभा के साथ अध्ययन करेंगे तो उनको अद्भुत अपना-पन मिलेगा और जो विष फैलाया जा रहा है उसका असर खत्म हो जाएगा. मुट्ठी भर आतंकवादियों के डर से हम हमारे देश को भय, आतंक और विनाश की चेतावनी देवें और अपना पूरा पैसा हथियारों में झोंक देवे ये तो उचित नहीं हैं. जितना प्रचार आतंकी लोगों की विचारधारा का किया जा रहा है उतना अगर हमारी अद्भुत आध्यात्मिकता का किया जाए तो फिर से पूरी दुनिया भारतीय दर्शन की दीवानी हो जायेगी. आज भी गावों और छोटे छोटे कस्बों में यहाँ पर कबीर और रहीम के दोहे लोगों में आध्यात्मिकता को बचाये हुए हैं. आज भी गोपाल सिंह जैसे उत्साही युवा कबीर यात्रा आयोजित करते हैं और लोगों का मेला बड़े उत्साह से उसमे भाग लेता है. ये भारत है क्योंकि इतने सरकारी प्रचार प्रसार और विज्ञापनों के बावजूद भी आज भी किसी भी सरकारी नेता से कबीर और कबीर जैसे फक्कड़ संत ज्यादा लोकप्रिय हैं.

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