उपभोग प्रधान नहीं कर्म प्रधान बनाएं अपने बच्चों को
पश्चिमी देशों में सरकार और निजी क्षेत्र मिल कर के उपभोग को बढ़ाने के लिए प्रयास कर रहे हैं. उनको लगता है की उपभोग नहीं बढ़ाएंगे तो देश की अर्थव्यवस्था तबाह हो जायेगी. उनका मीडिया, विज्ञापन तंत्र, व्यावसायिक तंत्र सब मिल कर के उपभोग को बढ़ावा देने में लगे है. वो लोग भारत जैसे देशों की हंसी उड़ाते हैं जहाँ आज भी लोग उपभोग-प्रधान नहीं बल्कि संयम-प्रधान हैं. अफ़सोस तो इस बात का है की इन देशों की देखा-देखि कर के आज भारत सरकार भी उपभोग बढ़ाने के लिए प्रयास करने लग गयी है. उपभोग के आंकड़े इकठे किये जाते हैं और बड़ी चिंता जताई जाती है की उपभोग कम है. येन केन प्रकरेण उपभोग को बढ़ावा दिया जाना ही सरकार की प्राथमिकता बन गया है. हजारों वर्षों तक जिस अद्भुत संस्कृति ने पूरी दुनिया को उपभोग-संयम का सन्देश दिया आज उसी देश की चुनी हुई सरकार उपभोग-संयम का उपहास कर रही है.
आज फिर से इस देश के नोजवानों के सामने दुविधा की स्थिति आ गयी है. एक तरफ पश्चिमी मीडिया से प्रभावित तंत्र है जो उपभोग को बढ़ावा देने के लिए उकसा रहा है दूसरी तरफ विरासत है जिसमे उपभोग में संयम को प्रधानता दी गयी है. उपभोग में संयम के परिणाम देखने के लिए किसी भी आश्रम, किसी भी संत के जीवन या किसी भी परम्परा-प्रधान गाव की जीवन व्यवस्था को देखिये. आपको क्या दिखाई देता है? उपभोग-प्रधान व्यवस्था के परिणाम को देखने के लिए किसी भी तथाकथित विक्सित शहर को देखिये जहां लोग साँस भी ढंग से नहीं ले सकते हैं.
भारत के कुछ तथाकथित अर्थशाष्त्री चिंतित हैं की भारत का प्रति व्यक्ति ऊर्जा का उपभोग विक्सित देशों की तुलना में बहुत ज्यादा कम है. वे तथाकथित विद्वान विद्यार्थियों को ऊर्जा का उपभोग बढ़ाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं. काश वो उपभोग बढ़ाने की जगह पर कर्म प्रधान भारतीय दर्शन को समझते और युवाओं को तिलोनिया जा कर के वहां की महिलाओं से बिना बिजली का चूल्हा बनाना सीखने को प्रेरित करें तो बेहतर होगा. पश्चिमी तकनीक के गुलाम हमारे अर्थशास्त्रियों को नहीं पता की भारत तो वर्षों से ऊर्जा के संरक्षण की वकालत करता आया है न की ऊर्जा के उपभोग और व्यय की. तिलोनिया सोशल वर्क रिसर्च सेंटर में ग्रामीण महिलायें ऐसा सोलर कुकर बनाती हैं जो बिना बिजली के चल सकता है. ये महिलायें ऐसी मशीने बनाती हैं जो कम से कम बिजली का उपभोग करें. ये महिलायें सोलर पंप, सोलर कुकर, सोलर लाइटिंग सिस्टम आदि बना कर के ऊर्जा के संकलन और संरक्षण के तरीके आज पूरी दुनिया को सीखा रही है. अहमदाबाद में एक व्यक्ति ने एक ऐसा कूलर बनाया है जो बिना बिजली के चलता है. बिहार में एक व्यक्ति ने एक ऐसी साईकिल बनाई है जो पानी और जमीन दोनों पर चलती है - वो भी बिना किसी ईंधन के - सिर्फ मानवीय श्रम के. जिन भारतियों की पश्तिमी लोग "अनपढ़ और गंवार" कह कर हंसी उड़ाया करते हैं - उन्हीं भारतियों ने वो आविष्कार किये हैं जो पूरी दुनिया के लिए आज की विपतियों का समाधान हैं. आज सब जानते हैं की पर्यावरण संकट से पूरी दुनिया को खतरा है और शायद आने वाले समय में हमारी अगली पीढियां भयंकर पर्यावरणीय दुष्परिणामों को झेलेगी. ये सब उपभोग को बढ़ावा देने का नतीजा है. प्रश्न हैं की हमारे तथाकथित बुद्धिजीवियों को इस अद्भुत भारतीय जीवन दर्शन की समझ कब आएगी?
आज भी हमारे परम्परागत वैज्ञानिक (जिनको कोई वैज्ञानिक नहीं मानता) गावों में वो तकनीक काम में ले रहे हैं जो पर्यावरण के लिए अनुकूल है. ये लोग आज भी इसी प्रयास में है की उपभोग का संयम हो और कर्म-प्रधान व्यवस्था हो जिसमे हर व्यक्ति अधिक से अधिक श्रम और कर्म का योगदान दे सके. राजस्थान में तिलोनिया गाव स्थित तिलोनिया क्राफ्ट बाजार में आपको लोगों द्वारा अपने श्रम से तैयार किये हुए कपडे, फर्नीचर व् अन्य सामान मिलेंगे जो वर्षों पुरानी भारतीय दर्शन और व्यवस्था को प्रदर्शित करती है.
नए जमाने की तथाकथित उच्च शिक्षण संस्थाओं में आज उपभोग प्रधान व्यवस्था के लक्षण साफ़ दर्शित हो रहे हैं. ये शिक्षण संस्थाएं पूरी तरह से उपभोग प्रधान जीवनशैली को परोस रहे हैं. माता - पिता बहुत खुश होते हैं जब वो ये बताते हैं की उनके बच्चे "पांच सितारा हॉस्टल" में रहते हैं जहाँ बटन दबाते ही सब कुछ मिल जाता है और "एयरकंडीशन" कक्ष में पढ़ाई करते हैं और सिर्फ "ब्रांडेड" उत्पाद ही उपभोग करते हैं. उनको ये नहीं समझ आ रहा है की आज भी हमारी सभ्यता का आधार उपभोग प्रधान दर्शन नहीं बल्कि कर्म प्रधान भारतीय जीवन दर्शन है. देखा- देखि और होड़ की इस दुनिया में जल्द ही हमारे बच्चे हमारी जीवनशैली और हमारी विरासत से नफरत करने लग जाएंगे. उन माता - पिता का बुढापा कैसा बीतेगा जो अपनी खुद की जिंदगी में "उपभोग पर संयम और कर्म को प्रधानता" के रास्ते पर चल रहे हैं लेकिन अपने बच्चों को "उपभोग प्रधान" व्यवस्था का हिस्सा बना रहे हैं? फिर भविष्य में जब उनको अपने घर, समाज, और देश के हालात उजड़ते नजर आएंगे तो इसके जिम्मेदार कहीं न कहीं वो स्वयं भी होंगे.
कहीं आप भी एक गुलाम मानसिकता में तो नहीं जी रहे? जिस भारतीय संस्कृति की आज पूरी दुनिया को जरुरत है - कहीं उस संस्कृति से आप अपने बच्चों को अलग तो नहीं कर रहे हैं? आप ने हमेशा गर्व किया की आप संतों और मर्यादा पुरुषों की इस भूमि में पले बड़े हुए और अपने पूर्वजों की जीवन शैली को आप आदर्श मानते हैं और बड़े गर्व से सबको बताते हैं की आपके दादा परदादा "सादा जीवन - उच्च विचार" को अपने जीवन में अपनाते थे - लेकिन क्या आपके बच्चे उसी गर्व के साथ जीवन जी पाएंगे या उस अद्भुत विरासत को तिरस्कार की नजर से देखेंगे?

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