Saturday, October 01, 2016

VOICE FOR TRADITIONAL KNOWLEDGE SYSTEMS

क्यों     लाचार  हैं  आप  ?

पूरी दुनिया आज लाचार महसूस कर रही है क्योंकि विकास ये रास्ते विनाश की
तरफ ले जा रहे हैं = लेकिन इस समय में आप को लाचार महसूस करने की जरुरत
नहीं है क्योंकि आप के पास वो अद्भुत धरोहर है जिसकी मदद से पूरी दुनिया
की मदद की जा सकती है. यूनाइटेड नेशन्स वर्ष २०१०-२०२० के दशक को जैव
विविधता का दशक के रूप में मनाएगा. प्रश्न है जैव विविधता को कैसे बचाएं?
जैव विविधता और वर्तमान विकास प्रणाली का आपस में छतीस का आंकड़ा है -
यानी जहाँ जहाँ विकास, वहां वहां जैव विविधता का विनाश. जैव विविधता को
बढ़ावा देना है तो परम्परागत ज्ञान को बचाना पड़ेगा. जिस क्षेत्र में भी आप
देखेंगे  - आप पाएंगे की हमारी तकनीक विकास के उस दौर से गुजर रही है
जिसमे आर्थिक विकास  के लिए किसी भी संसाधन को इस्तेमाल किया जा सकता है
और किसी भी स्तर पर विनाश किया जा सकता है.

विकास बनाम विनाश: विकास की आज जो दिशा हम अपना रहे हैं उसमे हिंसा और
असहिष्णुता, प्रतिस्पर्धा और येन केन प्रकारेण अर्थोपार्जन ही हमारे जीवन
का मकसद रह गया है और इस आंधी में ऊपर से नीचे तक कोई भी अपवाद नहीं है.
हर तरफ हम अपने उद्देश्यों को पाने के लिए लाचार दिखाई देते हैं जैसे
जीवन का मकसद ही प्रतिस्पर्धा है. इस प्रतिस्पर्धात्मक जीवनशैली के कारण
विकास नहीं बल्कि विनाश के द्वार पर आ गए हैं हम. कृषि में हमने कीटनाशक
व् केमिकल खेती के द्वारा अपने स्वयं के लिए खतरे तैयार कर लिए हैं. ये
ही हाल हर क्षेत्र में हैं - तो फिर क्यों नहीं हम अपनी परम्पराओं को
संभालना और सहेजना शुरू करें  और उनको फिर से विकसित करने का प्रयास
करते?


परम्परागत चिकित्सा

जब हम विकास के आखिरी दौर पर आ कर हे महसूस कर रहे हैं की हम विकास नहीं
बल्कि विनाश के द्वार पर आ गए हैं तो हमारी नजर भारत की परंपरागत
चिकित्सा पद्धतियों पर पड़ती हैं और हम पाते हैं की उनका कोई भी मुकाबला
नहीं है - उन पद्धतियों को नजरअंदाज कर के हमने बहुत बड़ी गलती की है. आज
उन अद्भुत व्यवस्थाओं के बचे खुचे ज्ञान शाश्त्र को संभालने और संवारने
की जरुरत है.

परम्परागत विज्ञान
विज्ञान की आज नहीं वर्षों पुरानी हमारी धरोहर को फिर से खोजने की जरुरत
है और हमें पूरी दुनिया के लिए अद्भुत रहस्य मिल जाएंगे. आज फिर से हमें
विज्ञान की वो परिभाषा चाहिए जो मानव और यहाँ तक की प्राणी मात्र के हित
को ही अपना मकसद मानती है.

परम्परागत तकनीक
तकनीक की वो दिशा चाहिए जो प्राणी मात्र के कल्याण के लिए हैं न की विनाश के लिए.

परम्परागत कृषि
ओर्गानिक कृषि और कुछ नहीं परंपरागत कृषि का ही दूसरा नाम हैं आज इसी की
बोलबाला है और हमें अपनी परंपरागत कृषि को फिर से अपनाना है.

अद्भुत स्वयं सेवी लोग
भारत में लोग स्वयं सेवी है और समाज को अर्पण करना अपना मकसद मानते हैं.
एक ऐसी संस्कृति जिसमे विश्व कल्याण ही सर्वोपरि है - उसे बचाना है और
बालकों में जन कल्याण की भावना को पल्लवित करना है. करुणा इंटरनेशनल जैसी
संस्थाओं के साथ मिल कर हर बालक में प्रेम और करुणा के संस्कार फैलाने
हैं.

0 Comments:

Post a Comment

<< Home