SALUTING ARTISTS AND CRAFTSMEN
सलाम कारीगरों - सलाम परंपरा के रखवालों
नेशनल हैंडलूम डे स्पेशल
एक दिन भारत की अद्भुत विरासत के नाम. एक दिन भारत की लुप्त होती कला के
नाम. एक दिन भारत के उन अद्भुत कलाकारों के नाम जिन्होंने हजारों वर्षों
से भारत को पूरी दुनिया का सिरमौर बनाये रखा - लेकिन आज हम ने उनको भुला
दिया. एक दिन उन कलाकारों के नाम जिन की कला से परेशान हो कर विदेशी
आक्रांताओं ने उनके हाथ कटवा दिए - लेकिन उनका हुनर नहीं चुरा सके. एक
दिन उन अद्भुत कला-साधकों के नाम जिन्होंने ऐसी ऐसी तकनीक ईजाद की -
जिसकी आज भी पूरी दुनिया दीवानी है.एक दिन उन तकनीकी वैज्ञानिकों के नाम
जिनको को सरकार तो वैज्ञानिक नहीं मानती परन्तु उनकी बनायीं हुई तकनीक को
आज भी पूरी दुनिया सलाम करती है. दिनांक ७ अगस्त को २०१५ से भारत में
नेशनल हैंडलूम डे मनाया जा रहा है. इस दिन हम सब को भारत की विश्व में एक
नयी पहचान बनाने के लिए चिंतन करना पड़ेगा. नेशनल हैंडलूम डे के द्वारा हम
सब देशवासी एक विचार करने के लिए मजबूर हुए हैं. हजारों वर्षों से ले कर
के आजादी तक हम पूरी दुनिया के वस्त्र उद्योग के बादशाह रहे हैं. इतिहास
गवाह है की पूरी दुनिया में हमारे देश में बने कपडे ही सबसे ज्यादा बिके
हैं. शोधकर्ता ओमप्रकाश बताते हैं की वर्ष १६३० में भारत से पर्सिया को
सालाना १.५ लाख पौंड के कपडे निर्यात किये जाते थे. लगभग यही हाल हर
प्रमुख देश के साथ व्यापार में था. कलकत्ता से उस समय जो कपड़ा जापान को
निर्यात होता था उस पर उस समय १५०% से २००% का मार्जिन होता था (यानी
लागत का दुगुना मुनाफा). भारत का पूरी दुनिया में एक वर्चस्व था.
पश्चिमी लेखकों ने भी भारत के वस्त्र उद्योग की तारीफ़ लिखी है. जे पी
वाइल्ड ने इतिहास की अपनी पुस्तकों में तीसरी से छठी शताब्दी में भारत के
प्रमुख व्यापार केंद्रों का जिक्र किया है और भारत के वस्त्र व्यापार
केंद्रों का वर्णन किया है. उससे पहले भी इतिहास में भारत के वस्त्र
व्यापार का वर्णन मिलता है. खैर एक बात निश्चित है की वस्त्र व्यापार के
क्षेत्र में भारत हमेशा सिरमौर रहा.
पूरी दुनिया अर्थ के चारों तरफ घूमती है. साड़ी विदेश नीतियां अर्थ के आस
पास ही है. आज अपने राजनीतिक वर्चस्व के कारण अमेरिका पूरी दुनिया में
आर्थिक वर्चस्व बनाने में सफल है. अमेरिका पूरी दुनिया को हथियार, तकनीक,
सॉफ्टवेर, किताबें, और आधुनिक उत्पाद बेचता है और इससे उसकी अर्थव्यवस्था
चलती है. चीन के आने के बाद आज हर चीज में चीन उत्पादन में आगे हैं लेकिन
आज भी अमेरिका अपना व्यापारिक वर्चस्व बनाये हुए है. इसी कारण वो पूरी
दुनिया पर दादागिरी कर रहा है. भारत को भी अपनी विदेशी व्यापार नीति पर
नजर डालनी पड़ेगी और अपने उद्योग-धन्दों को फिर से एक नया मुकाम दिलाना
पड़ेगा. वर्चस्व की इस लड़ाई को सरकार अनदेखा नहीं कर सकती है. प्राचीन
भारत के राजाओं ने अपने समय में भारत के उद्योग धंधों को बहुत मदद की और
इसी कारण व्यापर के क्षेत्र में भारत का वर्चस्व हुआ. पूरी दुनिया में
हजारों वर्षों तक वस्त्र व्यापार में वर्चस्व ऐसे तो बन नहीं सकता.
गुजरात के सौदागिरी वस्त्र व्यापारियों, उड़ीसा के इकट के कारीगरों और
मैसूर के सिल्क के कारीगरों को उनके राजाओं और तालुकेदारों का समर्थन
मिला और इसी कारण उन्होंने पूरी दुनिया में अपनी पहचान बनायी.
कलात्मक वस्त्र के क्षेत्र में भारत आज भी पूरी दुनिया में अपना वर्चस्व
बनाने का वजूद रखता है. आज भी कश्मीर के कशीदे, भदोही के गलीचे और
सांगानेर - बगरू के डिज़ाइनर सूट पूरी दुनिया में भारत को बेताज बादशाह
बना सकते हैं.
व्यापार को बढ़ने के लिए क्या चाहिए? श्रेष्ठतम तकनीक, कुशल कारीगर,
अंतरास्ट्रीय सम्बन्ध, कम से कम सरकारी हस्तक्षेप, व्यापार का माहौल,
कर्मचारियों के लिए सुविधाएं, स्वास्थ्य, आवास और अन्य सुविधाएं और सुगम
पूंजी . क्या सरकार इन क्षेत्रों में कुछ कर पायेगी? सॉफ्टवेर को बढ़ावा
देने के लिए तो सॉफ्टवेर पार्क खोले जा रहे हैं लेकिन वर्षों की अद्भुत
सम्पदा - टेक्सटाइल डिजाईन प्रिंट की कला को बढ़ावा देने के लिए क्या
टेक्सटाइल पार्क खोलने की सरकार ने कभी नहीं सोची? अद्भुत भारतीय परंपरा
ऐसी तकनीक पर आधारित थी जो पर्यावरण के अनुकूल थी - ऐसे रंग काम में लिए
जाते थे तो शरीर को नुक्सान नहीं पहुंचाते थे - ऐसी तकनीक काम में लायी
जाती थी जिसका इतने साल बाद भी विदेशी लोग तोड़ नहीं निकाल सके थे. वर्षों
से भारत के अद्भुत कर्मचारी बहुत ही कम पगार और बहुत ही मुश्किल
परिस्थितियों में काम करते आये हैं. अहमदाबाद में सेवा और आवाज जैसी कई
संस्थाएं हैं जो इनकी मदद करने के लिए आगे आयी है. इनको मदद क्या चाहिए
- सस्ता और सुगम आवास, सुविधाजनक सम्बंध, इनके बच्चों को पढ़ाई, सामजिक
सुरक्षा, विपत्ति में सुरक्षा आदि. इन बुनियादी सुविधाओं के लिए ये आज भी
तरस रहे हैं. चीन, मेक्सिको, बांग्लादेश, थाईलैंड आदि देशों के बढ़ते
वर्चस्व के बीच भारत के वस्त्र व्यापार को ग्रहण लग रहा है. आज भी इस
उद्योग में बड़ी संख्या में लोग रोजगार में हैं. आज भी इस उद्योग को एक
सहारे की जरुरत है.
आज भारत सरकार को फिर से भारत की मौलिक और अद्भुत तकनीक पर शोध करने के
लिए अनुरोध करने का समय आ गया है. आज फिर से भारत सरकार को गुजारिश करने
की जरुरत है की हमारी लुप्त हो रही परम्परागत तकनीक को बचाने के लिए शोध
शुरू करे और उस तकनीक को आगे बढ़ाने और उसमे परिमार्जन करने के लिए
परम्परागत तकनीक और हुनर वाले लोगों के मार्गदर्शन में नई तकनीक विकसित
की जाए जो भारत को फिर से विश्व मंच पर स्थापित कर सके. अमेरिकन तकनीक की
नक़ल करने और उसको बढ़ावा देने वाली संस्थाएं तो बहुत स्थापित कर ली
आज भारत से भारत की स्वयं की अद्भुत तकनीक को बचाने और फैलाने वाली
संस्थाएं स्थापित करने के लिए अनुरोध कर के देखते हैं.
शायद आप इस बात से सहमत न हों - तो मेरे इस संस्मरण को जरूर पढ़े :
सांगानेर की एक वस्त्र कंपनी में मैं गया था. वहां पर भारतीय तकनीक से एक
स्कार्फ बनाया जा रहा था. मैंने उस स्कार्फ की कीमत पूछी - कीमत
थी - 10000 पौंड. वो व्यापारी एक विदेशी कंपनी के लिए कॉन्ट्रेक्ट पर काम
कर रहे हैं. कपडा भी विदेशी कंपनी भेजती है, डिजाईन भी विदेशी कंपनी
भेजती है लेकिन प्रिंट भारतीय कलाकार करते हैं - क्योंकि ये पर्यावरण
अनुकूल प्रिंट होता है जो की पूरी दुनिया में सिर्फ भारतीय कलाकार ही
सबसे अच्छा कर सकते हैं. मैंने उससे पूछा की आपको क्या मार्जिन मिलता
है - वो व्यापारी बोला - कॉन्ट्रेक्ट के तहत एक स्कार्फ पर पांच सौ से
लेकर एक हजार रूपये तक . मैंने पूछा क्या समस्या है - उसने कहा इस
लुप्त होती कला के न तो कोई कारीगर हैं न ही तकनीकी उपकरण (जैसे
ब्लॉक ) . उसने मुझे लकड़ी के ब्लॉक दिख्याई जो २०० साल पुराने थे.
नेशनल हैंडलूम डे स्पेशल
एक दिन भारत की अद्भुत विरासत के नाम. एक दिन भारत की लुप्त होती कला के
नाम. एक दिन भारत के उन अद्भुत कलाकारों के नाम जिन्होंने हजारों वर्षों
से भारत को पूरी दुनिया का सिरमौर बनाये रखा - लेकिन आज हम ने उनको भुला
दिया. एक दिन उन कलाकारों के नाम जिन की कला से परेशान हो कर विदेशी
आक्रांताओं ने उनके हाथ कटवा दिए - लेकिन उनका हुनर नहीं चुरा सके. एक
दिन उन अद्भुत कला-साधकों के नाम जिन्होंने ऐसी ऐसी तकनीक ईजाद की -
जिसकी आज भी पूरी दुनिया दीवानी है.एक दिन उन तकनीकी वैज्ञानिकों के नाम
जिनको को सरकार तो वैज्ञानिक नहीं मानती परन्तु उनकी बनायीं हुई तकनीक को
आज भी पूरी दुनिया सलाम करती है. दिनांक ७ अगस्त को २०१५ से भारत में
नेशनल हैंडलूम डे मनाया जा रहा है. इस दिन हम सब को भारत की विश्व में एक
नयी पहचान बनाने के लिए चिंतन करना पड़ेगा. नेशनल हैंडलूम डे के द्वारा हम
सब देशवासी एक विचार करने के लिए मजबूर हुए हैं. हजारों वर्षों से ले कर
के आजादी तक हम पूरी दुनिया के वस्त्र उद्योग के बादशाह रहे हैं. इतिहास
गवाह है की पूरी दुनिया में हमारे देश में बने कपडे ही सबसे ज्यादा बिके
हैं. शोधकर्ता ओमप्रकाश बताते हैं की वर्ष १६३० में भारत से पर्सिया को
सालाना १.५ लाख पौंड के कपडे निर्यात किये जाते थे. लगभग यही हाल हर
प्रमुख देश के साथ व्यापार में था. कलकत्ता से उस समय जो कपड़ा जापान को
निर्यात होता था उस पर उस समय १५०% से २००% का मार्जिन होता था (यानी
लागत का दुगुना मुनाफा). भारत का पूरी दुनिया में एक वर्चस्व था.
पश्चिमी लेखकों ने भी भारत के वस्त्र उद्योग की तारीफ़ लिखी है. जे पी
वाइल्ड ने इतिहास की अपनी पुस्तकों में तीसरी से छठी शताब्दी में भारत के
प्रमुख व्यापार केंद्रों का जिक्र किया है और भारत के वस्त्र व्यापार
केंद्रों का वर्णन किया है. उससे पहले भी इतिहास में भारत के वस्त्र
व्यापार का वर्णन मिलता है. खैर एक बात निश्चित है की वस्त्र व्यापार के
क्षेत्र में भारत हमेशा सिरमौर रहा.
पूरी दुनिया अर्थ के चारों तरफ घूमती है. साड़ी विदेश नीतियां अर्थ के आस
पास ही है. आज अपने राजनीतिक वर्चस्व के कारण अमेरिका पूरी दुनिया में
आर्थिक वर्चस्व बनाने में सफल है. अमेरिका पूरी दुनिया को हथियार, तकनीक,
सॉफ्टवेर, किताबें, और आधुनिक उत्पाद बेचता है और इससे उसकी अर्थव्यवस्था
चलती है. चीन के आने के बाद आज हर चीज में चीन उत्पादन में आगे हैं लेकिन
आज भी अमेरिका अपना व्यापारिक वर्चस्व बनाये हुए है. इसी कारण वो पूरी
दुनिया पर दादागिरी कर रहा है. भारत को भी अपनी विदेशी व्यापार नीति पर
नजर डालनी पड़ेगी और अपने उद्योग-धन्दों को फिर से एक नया मुकाम दिलाना
पड़ेगा. वर्चस्व की इस लड़ाई को सरकार अनदेखा नहीं कर सकती है. प्राचीन
भारत के राजाओं ने अपने समय में भारत के उद्योग धंधों को बहुत मदद की और
इसी कारण व्यापर के क्षेत्र में भारत का वर्चस्व हुआ. पूरी दुनिया में
हजारों वर्षों तक वस्त्र व्यापार में वर्चस्व ऐसे तो बन नहीं सकता.
गुजरात के सौदागिरी वस्त्र व्यापारियों, उड़ीसा के इकट के कारीगरों और
मैसूर के सिल्क के कारीगरों को उनके राजाओं और तालुकेदारों का समर्थन
मिला और इसी कारण उन्होंने पूरी दुनिया में अपनी पहचान बनायी.
कलात्मक वस्त्र के क्षेत्र में भारत आज भी पूरी दुनिया में अपना वर्चस्व
बनाने का वजूद रखता है. आज भी कश्मीर के कशीदे, भदोही के गलीचे और
सांगानेर - बगरू के डिज़ाइनर सूट पूरी दुनिया में भारत को बेताज बादशाह
बना सकते हैं.
व्यापार को बढ़ने के लिए क्या चाहिए? श्रेष्ठतम तकनीक, कुशल कारीगर,
अंतरास्ट्रीय सम्बन्ध, कम से कम सरकारी हस्तक्षेप, व्यापार का माहौल,
कर्मचारियों के लिए सुविधाएं, स्वास्थ्य, आवास और अन्य सुविधाएं और सुगम
पूंजी . क्या सरकार इन क्षेत्रों में कुछ कर पायेगी? सॉफ्टवेर को बढ़ावा
देने के लिए तो सॉफ्टवेर पार्क खोले जा रहे हैं लेकिन वर्षों की अद्भुत
सम्पदा - टेक्सटाइल डिजाईन प्रिंट की कला को बढ़ावा देने के लिए क्या
टेक्सटाइल पार्क खोलने की सरकार ने कभी नहीं सोची? अद्भुत भारतीय परंपरा
ऐसी तकनीक पर आधारित थी जो पर्यावरण के अनुकूल थी - ऐसे रंग काम में लिए
जाते थे तो शरीर को नुक्सान नहीं पहुंचाते थे - ऐसी तकनीक काम में लायी
जाती थी जिसका इतने साल बाद भी विदेशी लोग तोड़ नहीं निकाल सके थे. वर्षों
से भारत के अद्भुत कर्मचारी बहुत ही कम पगार और बहुत ही मुश्किल
परिस्थितियों में काम करते आये हैं. अहमदाबाद में सेवा और आवाज जैसी कई
संस्थाएं हैं जो इनकी मदद करने के लिए आगे आयी है. इनको मदद क्या चाहिए
- सस्ता और सुगम आवास, सुविधाजनक सम्बंध, इनके बच्चों को पढ़ाई, सामजिक
सुरक्षा, विपत्ति में सुरक्षा आदि. इन बुनियादी सुविधाओं के लिए ये आज भी
तरस रहे हैं. चीन, मेक्सिको, बांग्लादेश, थाईलैंड आदि देशों के बढ़ते
वर्चस्व के बीच भारत के वस्त्र व्यापार को ग्रहण लग रहा है. आज भी इस
उद्योग में बड़ी संख्या में लोग रोजगार में हैं. आज भी इस उद्योग को एक
सहारे की जरुरत है.
आज भारत सरकार को फिर से भारत की मौलिक और अद्भुत तकनीक पर शोध करने के
लिए अनुरोध करने का समय आ गया है. आज फिर से भारत सरकार को गुजारिश करने
की जरुरत है की हमारी लुप्त हो रही परम्परागत तकनीक को बचाने के लिए शोध
शुरू करे और उस तकनीक को आगे बढ़ाने और उसमे परिमार्जन करने के लिए
परम्परागत तकनीक और हुनर वाले लोगों के मार्गदर्शन में नई तकनीक विकसित
की जाए जो भारत को फिर से विश्व मंच पर स्थापित कर सके. अमेरिकन तकनीक की
नक़ल करने और उसको बढ़ावा देने वाली संस्थाएं तो बहुत स्थापित कर ली
आज भारत से भारत की स्वयं की अद्भुत तकनीक को बचाने और फैलाने वाली
संस्थाएं स्थापित करने के लिए अनुरोध कर के देखते हैं.
शायद आप इस बात से सहमत न हों - तो मेरे इस संस्मरण को जरूर पढ़े :
सांगानेर की एक वस्त्र कंपनी में मैं गया था. वहां पर भारतीय तकनीक से एक
स्कार्फ बनाया जा रहा था. मैंने उस स्कार्फ की कीमत पूछी - कीमत
थी - 10000 पौंड. वो व्यापारी एक विदेशी कंपनी के लिए कॉन्ट्रेक्ट पर काम
कर रहे हैं. कपडा भी विदेशी कंपनी भेजती है, डिजाईन भी विदेशी कंपनी
भेजती है लेकिन प्रिंट भारतीय कलाकार करते हैं - क्योंकि ये पर्यावरण
अनुकूल प्रिंट होता है जो की पूरी दुनिया में सिर्फ भारतीय कलाकार ही
सबसे अच्छा कर सकते हैं. मैंने उससे पूछा की आपको क्या मार्जिन मिलता
है - वो व्यापारी बोला - कॉन्ट्रेक्ट के तहत एक स्कार्फ पर पांच सौ से
लेकर एक हजार रूपये तक . मैंने पूछा क्या समस्या है - उसने कहा इस
लुप्त होती कला के न तो कोई कारीगर हैं न ही तकनीकी उपकरण (जैसे
ब्लॉक ) . उसने मुझे लकड़ी के ब्लॉक दिख्याई जो २०० साल पुराने थे.

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