Saturday, October 01, 2016

HOW TO ATTAIN TRUE INDEPENDENCE

कैसे लाएं असली आजादी? 

वर्षों पहले एक बर्बर विदेशी भारत पर आक्रमण करने आया क्योंकि उसको पता था भारत में अद्भुत विद्वान लोग रहते हैं, अद्भुत प्रतिभा है, अपार संपत्ति है और अद्भुत चेतना है. उसने भारत पर आक्रमण से पहले एक संत को अपने देश बुलवाया. दंदामिस नामक उस संत ने उस तथाकथित सम्राट को फटकार लगा के भगा दिया. जमाना बदल गया. आज हर भारतीय को विदेश में धन संपत्ति, प्रतिभा और सुख दिखाई देता है और वो लालायित रहता है विदेश जाने के लिए. विदेशी भाषा और संस्कृति को सीखना अच्छी बात है लेकिन अपनी भाषा और संस्कृति को रोंदना कहाँ तक उचित?  

देश गुलाम क्यों होते हैं? देश आजाद क्यों होते हैं? देशों को तबाह करने वाले क्या कारण है? देशों को आबाद करने वाले क्या कारण है? वो क्या हैं जो देश को स्वर्ग में बदल देते हैं? वो क्या कारण हैं जिनके कारण देश टूट जाते हैं?  आइये थोड़ी चर्चा करें इस स्वत्रन्त्र दिवस की पूर्व संध्या पर. 
इतिहास में जब जब शिक्षा का फैलाव हुआ है तब तब देशों ने तरक्की की है. जब हमारे देश में विश्वविद्यालय पूरी दुनिया में जाने जाते थे - तब हम भी पूरी दुनिया में सिरमौर थे. आज  जमाना हार्वर्ड और अन्य अमेरिकी विस्वविद्यालओं का आ गया है तो हमें भी तैयार होना पड़ेगा. शिक्षा के फैलाव से बौद्धिक चेतना फैलती है जिससे लोगों में तरक्की होती है. 

गुलामी का आधार हमारी अपनी मानसिक कमजोरी होता है. कोई भी देश तभी गुलाम बन सकता है जब उसके अपने लोग मानसिक रूप से गिरे हुए हों. हमारा पतन बाद में आया, पहले हमने अपनी बौद्धिक दक्षता की नींव को ख़तम कर दिया. जिस क्षण हमने अपनी शिक्षण संस्थाओं को समाप्त कर दिया था उसी दिन से हमारी गुलामी शुरू हो गयी थी जो अभी भी जारी है. जी हाँ अभी जो आजादी है ये तो उधार की आजादी है - असली आजादी तो तब आएगी जब हम अपनी शिक्षण संस्थाओं को तैयार करेंगे तो इस देश में बौद्धिक चेतना फैला सके और लोगों को सोचने और समझने की दक्षता प्रदान कर सके. 

कभी उन देशों को देखिये जहाँ पर तबाही हो रही है - तो तुलना कीजिये उन देशों के साथ जहाँ पर आज तरक्की अपने चरम पर है. क्या फर्क है? वही इंसान है हर जगह पर - वो ही हाड - मांस, वो ही जिजीविषा, ..फिर फर्क क्या है? फर्क तो सिर्फ शिक्षा, संस्कृति, समझ और सांस्कृतिक चेतना बोध का है. ये ही फर्क हमें हर समाज के उत्थान  ओर पतन में नजर आएगा. ये बहुत बारीक सा फर्क है. जो समाज अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा और संस्कार  देता है वो समाज तरक्की करता है और जो समाज अपने बच्चों को नशा, जुआ, ऐशो-आराम, और ऐयाशी देता है वो समाज बर्बाद हो जाता है. 

देश और राष्ट्र पूरी तरह से बौद्धिक कल्पनाएं हैं और उनको साकार करने के लिए बौद्धिक मंच चाहिए. देश और राष्ट्र पूरी तरह से हमारे संकल्प और विश्वास के पल्लवित स्वरुप है और विश्वास ही नहीं हो तो कहाँ का देश और कहाँ का राष्ट्र. देश और राष्ट्र का निर्माण करना है तो शिक्षण संस्थाओं को उस देश और राष्ट्र का निर्माता बनाइये. विद्यार्थी बीज हैं तो शिक्षण संस्थाओं को उनको वटवृक्ष बनाने के लिए तैयार कीजिये. राष्ट्र का विचार जन मानस के मस्तिष्क में स्थापित करने के लिए एक आधार चाहिए - एक भाषा, एक संस्कृति, एक उद्देश्य, साथ में आगे बढ़ने और सफल होने की अनुभूति, एक दूसरे को सम्मान और समझने  की क्षमता. एक भाषा की बात करते हैः. आजादी के समय ये कहा जा रहा था की धोड़े समय में सभी क्षेत्रों में हिंदी भाषा उपलब्ध हो जायेगी. आज हालात ये है की अधिकाँश क्षेत्रों में हिंदी भाषा में पढ़े विद्यार्थियों को सरकार और निजी क्षेत्र दोनों अंग्रेजी भाषा में प्रशिक्षित लोगों की तुलना में निचले दर्जे पर रखती है. सरकार तो हद करती है. एक तरफ कहती है की हिंदी राष्ट्र भाषा है इसे अपनाईये - पर क्यों? क्या परिणाम निकलता है? एक उदाहरण देता हूँ. भारत की शिक्षा के क्षेत्र में शीर्ष संस्था यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन विज्ञानं के व्याख्याताओं को शोध के लिए अनुदान देती है - जिसकी शर्त है की उस व्यक्ति के लेख स्कोपस  जैसी कुछ विदेशी इंडेक्स एजेंसीज द्वारा सूचीबद्ध हो. स्कोपस हिंदी भाषा में लिखे लेख तो कभी सूचीबद्ध करेगा नहीं. यानी यो व्यक्ति हिंदी भाषा में अपने लेख लिखता है उसको तो ये अनुदान कभी मिलेगा नहीं. और किसी व्याख्याता को हिंदी भाषा में लेख लिखने के लिए कोई प्रेरणा नहीं है क्योंकि सरकार के द्वारा सूचीबद्ध इंडेक्स विदेशी हैं जो सिर्फ अंग्रेजी साहित्य ही सूचीबद्ध करेंगे. जिन लोगों ने अनुदान लिया है उनके नाम वेबसाइट पर हैं. उनके प्रकाशित लेख पढ़ लीजिये  - आप भी पाएंगे उन्होंने भारत के आम जन मानस के लिए उसकी भाषा में कुछ नहीं लिखा - और जिन्होंने लिखा - उनके लिए तो सरकार के दरवाजे ही बंद हैं (जरा सोचिये आजादी के इतने साल बाद भी आज भी हमारी गुलामी की मानसिकता इस कदर हम को डस रही है की अपनी ही संस्कृति को तबाह करने वाले नियम हम खुद बना रहे हैं - आजादी के इतने साल बाद आज भी हम ये नहीं समझ पाए हैं की अपने देश को तैयार करने वाले वैज्ञानिक चाहिए हमें न की विदेशों को तकनीक निर्यात करने वाले). ये सिर्फ एक उदाहरण मात्र है - लगभग ये ही हाल सभी सांस्कृतिक पक्षों के बारे में नजर आता है. ये ही योजनाए जारी रही तो एक दिन आएगा जब देश में दो तबके होंगे - एक अंग्रेजी बोलने वाले - यानी कुलीन, और एक निम्न वर्ग - जो हिंदी और क्षेत्रीय भाषा से काम चलाएंगे. 

आज जिन देशों में ताबाही नजर आती है वहां पर बौद्धिक चेतना का अभाव है. आज जहाँ पर देश के लिए लोग कुछ भी कर सकते हैं वहां की शिक्षण संसथान वाकई शानदार हैं - वहां से सीख लेने की जरुरत है. व्यक्ति में देश प्रेम की भावना का बीजारोपण शिक्षण संस्थाओं से ही होता है और यहीं से उसे अपने देश की संस्कृति और सभ्यता का प्रशिक्षण मिलता है. 

आज अगर हम एक राष्ट्र के रूप में अपना वजूद रखते हैं तो ये सिर्फ इस लिए है की हमारे राष्ट्र को आजाद करवाने के लिए अनेकों लोगों ने अपना सबकुछ कुर्बान कर दिया था. आज हम उनको याद कर के उनके एक सपने को पूरा कर सकें तो ये हमारा कर्तव्य होगा. उनका वो एक सपना था भारत का निर्माण. पूर्व से पश्चिम तक, उत्तर से दक्षिण तक पुरे भारत में  एक अद्भुत सभ्यता और सांस्कृतिक एकता है लेकिन इस सभ्यता और संस्कृति को अगली पीढ़ी को सौंपने का काम तो शिक्षण संस्थाओं का है. 

आज कल शिक्षण संस्थान भी कोचिंग सेंटर की तरह हो गए हैं - येनकेन मेट्रिक करवा देंगे - ये ग्रेजुएशन करवा देंगे - बस ये ही है उनका उद्देश्य - फिर कैसे होगा देश का निर्माण? आज अगर एक राज्य के लोग दूसरे राज्य के लोगों को पराया मान रहे हैं, एक राज्य के लोग दूसरे राज्य के लोगों से सम्बन्ध नहीं रखना चाहते तो इसकी जिम्मेदार हमारी शिक्षण संस्थाए हैं - जो उनको वो संस्कृति और जीवन मूल्य नहीं दे पायी है जिसको हम भारत माता कहते हैं. 

स्कूलों में पढ़ाने के लिए बीएड डिग्री होना जरूरी है तो कॉलेजों में पढ़ाने के लिए नेट होना जरुरी है - लेकिन जो सबसे ज्यादा जरुरी है उसका क्या? सबसे ज्यादा जरुरी है शिक्षक को भारतीय सभ्यता और संस्कृति की समझ हो तथा वो शिक्षक विद्यार्थियों को भारतीय संस्कृति की शिक्षा दे पाए ताकि  उनको एक सुसंस्कृत देश का नागरिक होने का गर्व हो - ये  कौन देखता है? कुछ तथाकथित टॉप इंस्टिट्यूट में तो शिक्षक के रूप में उसे ही नियुक्त किया जाता है जिसने विदेश से अपनी पीएचडी की पढ़ाई की हो (और फिर वो विदेशी शिक्षा के गुणगान करता है - भले ही अपने स्वर्णिम २० साल भारत में बिताये हों)  - फिर नतीजा भी वो ही निकलता है - सारे विद्यार्थी विदेश जाते हैं और बहुराष्ट्रीय कंपनियों में सेवा करते हैं - फिर प्रश्न है कौन बनाएगा इस देश को? अंतरास्ट्रीय व्यवस्था हमारे राष्ट्र को क्षति पहुंचाए ये उचित नहीं. हम वैश्वीकरण के पक्षधर हैं लेकिन अपने अस्तित्व को मिटाने के लिए भी हम तैयार नहीं. 

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