लुप्त होती संस्कृति की पाठशालाएं
हजारों वर्षों की सांस्कृतिक धरोहर ने हमारे देश को अपने आप में अद्भुत और अलग पहचान दी है. यहाँ पर लोगों में आपसी मेलजोल, आपसी प्रेम, आपसी सहयोग औरसुसंस्कृत व्यवस्थाएं आज भी पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल है जो समाजशास्त्रियों के अध्ययन का विषय बना हुआ है. ये सांस्कृतिक आधार ही हमारे देश के लोगों कोउस ऊंचाई पर ले जाता है जिसके लिए विकसित देश तरस रहे हैं.
क्या हैं संस्कृति की पाढ्शालाएं? क्या हैं वो संस्थाएं जो हमारी अद्भुत सांस्कृतिक विरासत को बचा सकती हैं? शायद आप कहेंगे की विद्यालय - महाविद्यालय? क्या येसंस्थाएं अपना इस दिशा में सोच रहीं हैं? क्या आप अपनी अद्भुत संस्कृति पर फक्र करते हैं और उसको बचाने के लिए कृत-संकल्प हैं? जब एक गाव का विद्यार्थी उच्चअध्ययन करने के लिए शहर में आता है तो अपने साथ एक सांस्कृतिक खजाना ले कर आता है. वो प्रोफेशनल शिक्षा ग्रहण कर के तकनीकी रूप से तो सक्षम हो जाता हैलेकिन अक्सर अपनी सांस्कृतिक धरोहर को गँवा देता है. विद्यालय और महाविद्यालय उसको तकनीकी ज्ञान तो देते हैं लेकिन साथ में अपनी परम्पराओं, रीति रिवाजों, और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति तिरस्कार की भावना भी भर देते हैं. बूढ़े माँ बाप ईश्वर को कोसते हैं की उनकी पढ़ी लिखी संस्तानें उनको वो सम्मान नहीं देती जो उनकाहक़ है. जो माँ बाप अपने बच्चों को ऊंची पढ़ाई नहीं करवा पाते हैं - उनका बुढापा बड़ा सुखद गुजरता है क्योंकि बुढापे में उनकी आज्ञाकारी संताने उनको कोई कष्ट नहींउठाने देती हैं और उनके साथ हर कदम पर सहयोग करती हैं. लेकिन जो माँ बाप अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाते हैं उनको बड़ा ही सदमा पहुँचता है जब उनकी संतानउनके रीति रिवाज और परम्पराओं का तिरस्कार करते हैं. आखिर क्या है उनकी गलती ?
यह एक कड़वा सच है की उच्च शिक्षण संस्थाएं कॅरियर बनाने में तो मदद करती है लेकिन संस्कृति को संबल प्रदान करने में विफल रहती है. विद्यार्थी की व्यक्तिगतस्वतंत्रता को बढ़ावा देने के लिए विद्यार्थी को अपने तरीके से जीवन जीने का मौका दिया जाता है लेकिन इस प्रक्रिया में कई विद्यार्थी बुरी आदतें अपना लेते हैं - लेकिनजिन विद्यार्थियों का पारिवारिक जुड़ाव ज्यादा होता है उनको उनके संस्कार बचा लेते हैं. यानी हमारे सांस्कृतिक मूल्य हमारे नोजवानों को बचाने में आज भी अहमभूमिका निभा रहे हैं.
हमारे पारिवारिक रीतिरिवाज और परम्पराएं आज भी संस्कृति की पाठशालाएं हैं और इनको बचाने के लिए आपको प्रयास करने पड़ेंगे. इन पाठशालाओं को बचाना बड़ामुश्किल को रहा है. हर दूसरे दिन कोई न कोई व्यवस्था लुप्त हो रही है.
जो व्यवस्थाएं परंपराएं मानते हुए हम नजरअंदाज कर रहे हैं वो समाज को संसक्रारित करने के लिए बनायी गयी व्यवस्थाएं हैं. आज एक एक कर के अधिकाँश परम्पराएंलुप्त हो गयी हैं. आज जो बची हैं वो सलामत रखना हमारी जिम्मेदारी हैं. विवाह आयोजन में टीका, मेरा, पजपडनि आदि रस्म रिवाज होते हैं जो लोगों को आपस में जोड़नेमें बहुत सहायक होते हैं. ये रीतिरिवाज आज लुप्त होने के कगार पर हैं और इन को बचाना हमारी जिम्मेदारी है. नयी पीढ़ी इन व्यवस्थाओं को संस्कृति की पाठशाला मानकर अगर आगे बढ़ाएगी तो समाज की सांस्कृतिक विरासत और आपसी मेल-जोल की अद्भुत धरोहर सलामत रह सकेगी. हो सकता है की हमारी अनेक परम्पराओं में सेकुछ एक अव्यवहारिक और अप्रासंगिक हों, लेकिन उनके पीछे सभी परम्पराओं को नजरअंदाज करना और उनके योगदान से समाज को वंचित करना कहाँ तक उचित है.

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