Sunday, January 29, 2017

EDUCATION REFORM

शिक्षा सुधार से पहले क्या हो?

शिक्षा वो होती है जो हमारे जीवन में प्रकाश ले कर आये. शिक्षा वो होती
है जो हमको बेहतर नागिरक बनाये, शिक्षा वो होती है जो हमको जीवन जीने का
तरिका सिखाये, शिक्षा हमें अपने जीवन को एक बेहतरीन लक्ष्य देती हैं. आज
हमारे देश में युवाओं में जो निराश, हताशा, बेरोजगारी और अनुशाषणहीनता
नजर आती है वो सब शिक्षा व्यवस्था के कारण है.
भारत सरकार शिक्षा के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर सुधार लाने के लिए
इच्छुक है और यही समय है की हम सब शिक्षा व्यवस्था पर मंथन करें और सरकार
से शिक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार लाने के लिए आग्रह करें. सरकार ने
अपनी वेबसाइट पर शिक्षा नीति से सम्बंधित सुझाव अलग अलग भाषाओं में
प्रकाशित किये हैं. शिक्षा नीति से जुड़े हुए सरकारी अधिकारी अभी लगातार
शास्त्री भवन दिल्ली में कार्यशालाएं कर रहे हैं. लेकिन असल शिक्षा के
लिए भारत के नीति-निर्माताओं को भारत के गावों को समझना पड़ेगा. जब
महात्मा गाँधी अफ्रीका से भारत आये तब उनको उनके राजनीतिक गुरु गोपाल
कृष्ण गोखले ने भारत भ्रमण का सुझाव दिया था. काश ऐसा ही कोई सुझाव भारत
के नीतिनिर्माताओं को देवे जो भारत को समझ कर शिक्षा नीति बनाये न की
विदेश के देखा देखि.
भारत में वर्षों से बच्चों को गृह कार्य में शामिल करने की स्वस्थ परंपरा
रही है. जिसके परिणामस्वरूप बच्चों का पारिवारिक जुड़ाव भी होता है और
उसका परिपक्व विकास भी होता है. भारत की संयुक्त परिवार व्यवस्था के साथ
इस परंपरा का बड़ा अच्छा तादात्म्य रहा है लेकिन भारत के नीतिनिर्माताओं
को ये बात कोन समझाये. भारत में हर समाज के लोग अपने बच्चों को अपनी
परंपरागत कौशल को परिवार में ही सिखाते आये हैं जो की अद्भुत व्यवस्था
रही है - जिसको मान्यता और सरकारी सम्बल देने की आवश्यकता है - शायद उसी
व्यवस्था के कारण आज भी भारत के गावों और छोटे शहरों में अद्भुत
शिल्पकार, कलाकार, दक्ष लोगों की पीढ़ी तैयार हो रही है - लेकिन आगे
सरकारी बढ़ावा मिले तभी ये परंपरा बच पायेगी.
आधुनिकता हमारे सर पर बोल रही है और आज इस आधुनिकता की अंधी दौड़ में चलने
से कही बेहतर है पूरी दुनिया को आधुनिकता की एक नई दिशा दिखाई जाए  - जो
भारत- वर्ष आसानी से कर सकता है. इस दौर में सुधार की जबरदस्त गुंजाइश
है. आधुनिकता के इस दौर में व्यक्तिगत हितो को प्राथमिकता, भौतिकता को
तबज्जो और अध्यात्म की जगह पर विज्ञानं को  प्राथमिकता दी जा रही है. यह
एक अच्छी बात है की वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा दिया जाना चाहिए लेकिन उसके
लिए शिक्षा व्यवस्था में प्रयोग पर बल दिया जाना चाहिए. इस हेतु शिक्षा
में व्यापक सुधार चाहिए. विद्यार्थियों को अपने आस पास के माहौल में
वैज्ञानिकता को देखने के लिए प्रेरित करने की जरुरत है न की सिर्फ विदेशी
वैज्ञानिकों और आविष्कारकों के नाम रटाने की आज की व्यवस्था की.
सबसे पहले तो प्रतियोगी परीक्षा प्रणाली को संचालित करने वाली अलग अलग
संस्थाओं को बदलने की जरुरत है. ये सभी संस्थाएं हमारे देश के युवाओं का
भविष्य बना भी सकती हैं तो बिगाड़ भी सकती हैं. ये संस्थाएं आज किस प्रकार
के प्रश्न पूछती है - जरा गौर करिये :  १  विज्ञान - जिसमे ख़ास कर
आविष्कार, आविष्कारक, विदेशी ज्ञान पर आधारित वैज्ञानिक जानकारियां व्
वैज्ञानिक नाम. २. इतिहास - ख़ास कर युद्ध, ३. सरकारी नीतियां  व् कानून
४. अंतरास्ट्रीय खेल-कूद और प्रतिस्पर्धाएं और इनाम ५. प्रमुख
अंतरास्ट्रीय संगठन और उनके कार्य. आप किसी भी सामान्य समझ वाले व्यक्ति
से पूछिये - एक बैंक प्रबंधक या रेलवे अधिकारी /  क्लर्क बनने के लिए इन
प्रश्नों  का क्या तुक? जो प्रश्न पूछे जाने चाहिए वो निम्न होने चाहिए :
- १. मानवीय व्यवहार कौशल, व्यवहार में विनम्रता, मृदुता और
व्यवहारकुशलता कैसे आये २. मानवीय सम्बन्ध कौशल ३. भाषा कौशल - ख़ास तौर
पर स्थानीय भाषा कौशल - ४. सृजनशीलता और नवाचार करने की क्षमता  ५. भारत
की सांस्कृतिक विरासत और समरसता. ६. गणितीय दक्षता  (जोड़ बाकी गुना भाग
आदि जो उसके काम आये ).  जब तक हम इस प्रकार के परिवर्तन नहीं करेंगे -
तब तक बड़े सुधार संभव नहीं है. हर शिक्षण संस्था बच्चों को वही पढ़ाई
कराना चाहेगी जिससे बाचे प्रेतयोगी परीक्षाओं में अव्वल हो - और
प्रतियोगी परीक्षाओं में आमूल परिवर्तन सरकार को ही करना पड़ेगा. सरकार
सिर्फ शिक्षा व्यस्था में सुधार करना चाहती है लेकिन ये सुधार किसी काम
नहीं आएंगे जब तक प्रतियोगी परीक्षा प्रणाली को नहीं बदला जाता.
शिक्षा व्यवस्था में सुधार करने के नाम पर नए नए कानून आ जाते हैं. कहने
को निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन दिया जाएगा - लेकिन हर जगह पर निजी
क्षेत्र को सरकारी क्षेत्र के लोग इंस्पेक्टर के रूप में निरिक्षण करते
हैं - जो की इंस्पेक्सटर राज को बढ़ावा देता है - और उसके दुष्परिणाम आप
सब जानते हैं. शिक्षा के क्षेत्र में सेल्फ-रेगुलेटरी बॉडी की स्थापना
होनी चाहिए जिसमे निजी क्षेत्र के प्रतिनिधि और और ये एक स्वयं सेवी
संस्था हो न की सरकारी संस्था. सरकार को बड़े काम करने हैं न की एक एक
शिक्षण संस्था को चेक कर के उसको परेशान करने के काम. इंस्पेक्टर राज के
दुष्परिणाम से बचाने के लिए सरकार को इन सब कामों से अपने आप को दूर करना
ही पड़ेगा. जब निजी क्षेत्र में क्रिसिल जैसी बेहतरीन संस्थाएं रेटिंग का
काम कर सकती हैं तो निजी क्षेत्र में शिक्षण संस्थाओं की रेटिंग करने
वाली रेटिंग एजेंसीज भी बन सकती हैं.

मेरी इस चर्चा का मकसद एक वैचारिक चिंतन शुरू करना है - शिक्षा व्यवस्था
में सुधार से पहले प्रतियोगी परीक्षा प्रणाली (सभी परीक्षाओं) को बदलने
की जरुरत है. भारतीय अद्भुत ज्ञान व्यवस्था को मान्यता देने की जरुरत है,
भारतीय पारिवारिक ज्ञान को मान्यता देने की जरुरत है. शिक्षा व्यवस्था
में वो ही ज्ञान बांटा जाए जो विद्यार्थियों के काम आये या जो उनको जीवन
को बेहतर जीने में मदद करे - सिर्फ विदेशी ज्ञान को रटाने का मकसद नहीं
होना चाहिए. हमारा उद्देश्य विदेशी शिक्षण संस्थाओं को बढ़ावा देना नहीं
बल्कि हर नागरिक को सक्षम, कुशल, विवेकवान, व्यवहार कुशल और देशप्रेमी
बनाना होना चाहिए. अगर हम शिक्षा व्यवस्था में बदलाव कर पाए तो देश को एक
नयी दिशा दे पाएंगे.

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