CHILD EDUCATION IS CHILD RIGHT
कैलाश जी के साथ कुछ तो कीजिये: बच्चों के लिए
(विश्व बाल दिवस २० नवंबर के सन्दर्भ में )
२० नवम्बर को संयुक्त राष्ट्र विश्व बाल दिवस के रूप में मानते हुए हर देश से बाल अंधकारों की वकालत करता है. तीसरी दुनिया में (अल्पविकसित देशों में) बाल-अधिकारों की स्थिति में सुधार की काफी जरुरत है. इसी हेतु संयुक्त राष्ट्र ने १९५९ और १९८९ में बाल अधिकारों के घोषणा पात्र जारी किये. इसी २० नवम्बर २०१६ कोबाल-अधिकार कार्यकर्ता श्री कैलाश विद्यार्थी पूरी दुनिया के चिंतकों और विद्वानों के साथ बाल अधिकार हेतु अपनी आवाज दिल्ली से जारी करेंगे. आज श्री कैलाशविद्यार्थी और उनकी टीम की आवाज पूरी दुनिया सुनेगी.
ज्यादा दूर जाने की जरुरत नहीं है - अपने आस पास नजर दौड़ाएंगे तो हम पाएंगे की बाल अधिकार तो हम लोग भी सुनिश्चित नहीं कर पा रहे हैं अतः सबसे पहले तो श्रीकैलाश विद्यार्थी जी की बात हमको ही सुननी चाहिए. श्री कैलाश सत्यार्थी का संगठन बचपन बचाओं आंदोलन इन्हीं सब समस्याओं से संघर्ष कर रहा है. १९८० में उन्होंनेइस संगठन की सुरुआत की थी. उनके काम से प्रभावित हो कर अशोक फाउंडेशन फॉर सोशल एन्त्रेप्रेंयूर्शिप ने उनको १९९३ में अपना फेल्लो बनाया था. उनके कार्य के लिएउनको अनेक अंतरास्ट्रीय सम्मान मिले. २०१४ में उनको मलाला यूसुफजई के साथ नोबेल पीस प्राइज मिला. श्री कैलाश सत्यार्थी का संगठन १४४ देशों में बाल अधिकारों केलिए मुहीम चला रहा है.श्री कैलाश जी ने कार्पेट (गलीचे) पर गुड-वीव नामक निशान की शुरुआत की है - ताकि कार्पेट बनाने में बाल श्रम का इस्तेमाल बंद हो. उनके प्रयास सराहनीय हैं. मैं आपको छोटू से चाय लेने से मन नहीं करूँगा - पर जब भी आपको समय मिले छोटू का मार्गदर्शन करिये उसको प्रोत्साहन दीजिये - क्या पता आपकी मदद से ये ही छोटू कमाल कर जाए. इनका बचपन तो बाल श्रम में दब गया - क्या पता आपके सहयोग से इनका भविष्य संवर जाए.
बाल अधिकारों के लिये संयुक्त राष्ट्र ने जो घोषणा पत्र प्रकाशित किया है उसमे ५४ बाल अधिकार हैं. उन अधिकारों में बच्चों के मुलभुत अधिकार हैं. बाल अधिकार उनसभी बच्चों पर लागू होते हैं जो १८ साल से काम के हैं. आज हम देख रहे हैं की बाल - शोषण लगातार बढ़ रहा है. बाल श्रमिकों को कानूनी रूप से बंद करने के बाद भी बालश्रम जारी है. स्कूलों में बच्चों के साथ यौन अपराध बढ़ रहे हैं. बच्चों को अगवा करने की घटनाएं भी लगातार बढ़ रही हैं. बच्चों को अगवा कर के बंधक बना कर के उनसेअपराध करवाये जा रहे हैं.
निम्न वर्ग अपनी मज़बूरी में जीता है और मज़बूरी में बच्चों से गृह कार्य करवाता है. हम सब जानते हैं की देश की आधी आबादी बच्चों को अपने गृह कार्य या पैतृकव्यवसाय में साथ में लगाती है - जो उनको मज़बूरी भी है. लेकिन अफ़सोस तो इस बात पर है की आज दिन तक सरकार इन बच्चों के लिए वैकल्पिक शिक्षा व्यवस्था नहींशुरू कर पायी है. सरकार (शिक्षा नीति निर्माता) भी जानती है की अधिकाँश बच्चे ७ से १२ बजे वाली स्कुल में नहीं आ सकते क्योंकि उनको अपने घर का काम भीनिबटाना है. बीकानेर की विद्या कुञ्ज स्कुल ऐसे बच्चों को शाम को पढ़ाई करवा देती है और फिर ये बच्चे परीक्षा में प्रथम श्रेणी ले कर अपने सपनो को साकार कर लेतेहैं. क्या विद्या-कुञ्ज जैसी संस्थाओं से सरकार को प्रेरणा नहीं लेनी चाहिए?
हमारी अधिकाँश जनसँख्या गावों में रहती है और गावों में शिक्षक के रूप में शहरों के लोगों की नियुक्ति हो जाती है जो वहां पर जाना भी नहीं चाहते - फिर नतीजा आपकेसामने हैं. जबकि उसी गाव के पुरुषों - महिलाओं को ये जिम्मेदारी दी जाए तो हर बच्चा अपने सपने पुरे कर पायेगा (ये जरुरी नहीं है की वो महिलायें सरकारी मानक पुरेकर पाएं जैसे बी.एड ). आये दिन हम देखते हैं की सैकड़ों बच्चों की सरकारी स्कुल में ३-४ शिक्षक होते हैं जो भी अक्सर छुट्टी पर रहते हैं. गावों के बच्चों के भी सपने होतेहैं. मैं ये नहीं कह रहा की उनको इंजिनीयर या डॉक्टर बनाना है - मैं तो इतना ही कह रहा हूँ की उनके सपनो को भी उड़ान मिलनी चाहिए.
अगर आप ये सोच रहे हैं की उच्च और माध्यम वर्ग के लोगों ने बाल अधिकारों का शोषण नहीं किया है - तो आप गलत हैं. हर घर, हर शिक्षण संस्था, हर संगठन में बच्चोंके विचारों को सम्मान से नहीं सुना जाता है न ही उनको वो मौका दिया जाता है जो उनको मिलना चाहिए. बच्चों पर बड़े लोग अपने सपने थोप देते हैं और उनकोआवश्यक संबल और प्रोत्साहन नहीं दिया जाता है. उच्च वर्ग में तो हाल बहुत ही खराब है. छोटे छोटे बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में भेज कर माता - पितानिश्चित हो जाते हैं - जहाँ बच्चे असहज और परेशान महसूस करते हैं (क्योंकि घर पर मातृ भाषा तो हिंदी या स्थानीय भाषा होती है और बालक को जबरदस्ती अंग्रेजीमाध्यम रटाया जाता है). उसके बाद बच्चों को हर साल परीक्षा में "टॉप" करना होता है - उस प्रतिस्पर्धा में बच्चे खेल-कूद, यारी दोस्ती, और अपनापन सब भूल जाते हैं. बच्चे जब अंग्रेजी में गिटपिट करने लग जाते हैं तो अभिभावक खुश हो जाते हैं - लेकिन न तो बच्चे की जिज्ञासा बधाई जाती है न उसको स्वतंत्र अभिव्यक्ति का मौकादिया जाता है. उसको एक टाई वाला बाबू बनने के लिए मजबूर कर दिया जाता है - न उसकी अपनी अभिव्यक्ति कोई सुनता है न कोई उसके दिल की बात सुनता है. उसकी अभिरुचि कोई भी हो उसको मजबूर हो कर वो ही पाठ्यक्रम करना पड़ता है जिससे वो जल्द से जल्द सरकारी अधिकारी (बाबू) बन सके.
जितनी बड़ी स्कूलें उतना ही बुरा हाल. पहले एडमिशन बड़ी मुश्किल से मिलता है - और फिर बच्चों को धकेल दिया जाता है तोता=प्रतिस्पर्धा में - विज्ञान और गणित जैसेविषयों को भी प्रयोग से नहीं बल्कि रटा रटा के तैयार किया जाता है. पाठ्यक्रम में वो सब सामग्री होती है जो न तो विद्यार्थी के कभी जीवन में काम आएगी न विद्यार्थीकभी जीवन में देख पायेगा. अपने आस पास के माहौल से जोड़ कर के शिक्षा की कोई व्यवस्था ही नहीं है. अगर कोई प्रयास भी करता है तो शिक्षण संस्थाएं उसको आने हीनहीं देती हैं. उदाहरण के लिए बीकानेर में एक प्रभुद्ध शिक्षक प्रोफ़ेसर हनुमान प्रसाद व्यास प्रयोग पर आधारित विज्ञान को स्कूलों में फैलाने के लिए जतन कर रहे हैं - स्कूलों से उनको कैसा व्यवहार मिलता है - मत पूछिये. न अभिभावक, न शिक्षक, न प्राचार्य कोई नहीं सोचता की ऐसा इतिहास रटाने से क्या मिलेगा जिसमे हम सिर्फमानवीय निकृष्ट की चर्चा करते हैं और निकृष्ट - पतित इंसानों का इतिहास पढाते हैं (जैसे अजातशत्रु ने अपने पिता को मार दिया, तो सत्ता के लिए उसके बेटे ने उसकोमार दिया, इसी प्रकार सत्ता लोभी ओरंगजेब ने अपने भाइयों को मार दिया, तो जयचंद और मीर जाफर ने सत्ता के लोभ में गद्दारी की). बाल मन बहुत कोमल होता हैऔर उसको तो उत्कर्ष और श्रेष्ठता की कहानियां सुनाई जानी चाहिए न की इस प्रकार का इतिहास. सिर्फ कुछ लेखकों को अपनी पुस्तकें बेच कर पैसा कमाना है और उसीके लिए सारे देश के बच्चों के साथ खिलवाड़ की जा रही है.
ये सिर्फ कुछ उदहारण हैं - हर साल सिलेबस को बढ़ा दिया जाता है ताकि नयी और ज्यादा बड़ी पुस्तकें बिक सकें - पर कभी बाल-मन के द्रिस्तिकों से उनका मूल्यांकन तो कीजिये. मैं तो अनुरोध करूँगा की सिलेबस निर्माण समिति के सुझावों का बच्चों के द्वारा ही मूल्यांकन किया जाना चाहिए. बच्चों को भी उस सिलेबस निर्माण समिति में शामिल किया जाए तो क्या हर्ज हैं ताकि बच्चों की आवाज तो वहां पहुंचे.

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