Sunday, January 29, 2017

POVERTY AND HUNGER

भुखमरी : सबसे  बड़ी मानवकृत त्रासदी

(१६ अक्टूबर को वर्ल्ड फ़ूड डे पर विशेष)



दुनिया की सबसे भीषण त्रासदी है भुखमरी. इसके जिम्मेदार हमलोग हैं  -
हमारे नीति निर्माता हैं, हमारी व्यवस्थाएं हैं - और इसके परिणाम भयावह
व्  अकल्पनीय हैं. हर वर्ष ३१ लाख बच्चे भुखमरी और कुपोषण से दुनिया से
असमय विदा हो जाते हैं. पूरी दुनिया में ८० करोड़ लोग भुखमरी के शिकार
हैं. हर नो में से एक व्यक्ति भुखमरी का शिकार है. अफ्रीका और एशिया
महाद्वीप भुखमरी और कुपोषण से सबसे ज्यादा  प्रभावित हैं.

पांच साल से छोटे बच्चों में कुपोषण के मामलों में अफ़ग़ानिस्तान, भारत,
पाकिस्तान, घाना, इथियोपिया, यमन, सोमालिया, नाइजर, कांगो आदि देश सबसे
ज्यादा प्रभावित हैं. हर दस सेकण्ड में कहीं न कहीं कोई न कोई बालक
कुपोषण के कारण काल के ग्रास में समा रहा है. इन मौतों के पीछे जिम्मेदार
हैं हमारी नीतियां जो लोगों को भुखमरी के लिए मजबूर कर रही है. गरीब लोग
अपने आप नहीं हुए हैं. ये वो लोग हैं जो हमारे नीतिगत निर्णयों के कारण
गरीब हुए हैं. विकासशील देशों में सरकारें बहुत ज्यादा महंगाई की नीति से
चलती हैं  - क्योंकि महंगाई की नीति ही बहुराष्ट्रीय कंपनियों और बड़े
उप्तादकों को लाभदायक होती है. सरकार अपने कर्मचारियों को महगाई भत्ता दे
कर चुप कर देती है.लेकिन अधिकाँश जनसख्या इस नीति से बुरी तरह पिस जाता
है. उसका कुटीर उद्योग तो चौपट हो जाता है. तीन चौथाई गरीब लोग परंपरागत
कृषि और कुटीर उद्योगों में जुड़े हुए हैं - जो बढ़ती महगाई के कारण अपना
घर नहीं चला पाते हैं और शहरों की तरफ पलायन के लिए मजबूर हो जाते हैं.
बड़ी कम्पनियाँ और उपक्रम  लुभावने पैकेज दे कर लोगों को अपने यहाँ पर
नोकरी रख लेते हैं लेकिन ये बात कोई नहीं जानता की इन कंपनियों की कमाई
से कभी बरकत नहीं होती है और उनके गावों का सुखी जीवन उनसे हमेशा के लिए
छूट जाता है. शहरी व्यवस्थाएं पूरी तरह से चरमरा चुकी हैं

भारत में दुनिया के सबसे ज्यादा लोग भूखे सोते हैं - रोज २० करोड़ लोग. एक
तिहाई बच्चे और आधी महिलायें कुपोषण और अनीमिया से प्रभावित हैं. हर दिन
३००० बच्चे भुखमरी के कारण काल के क्रूर ग्रास में समां जाते हैं. इन
सबका एक बड़ा कारण है जनसँख्या समस्या. कोई सरकार जनसँख्या नियंत्रण की
नीति को कठोरता से लागू नहीं करना चाहती - और इसी कारण हर साल भारत में
ऑस्ट्रेलिया से भी ज्यादा की जनसख्या पैदा हो जाती है. हम कृषि में ऐसी
तकनीक आयत कर रहे हैं जो बड़े खेतों के लिए उचित है - लेकिन जनसख्या
विस्फोट के कारण हर दिन खेतों का आकार छोटा हो रहा है.

आज हम सबको मिल कर सरकारों पर दबाव डालना पड़ेगा तभी निम्न नीतिगत काम हो
पाएंगे - (ये तो सिर्फ  कुछ उदहारण है - सरकारी नीतियों के कारण ही हमारी
आधी आबादी गरीबी के गर्त में फिसल रही है)

·         नदियों का पानी पुरे देश की अमानत है और इसलिए उनको एक दूसरे
से जोड़ा जाए और उनके पानी की राजनीति को बंद किया जाए

·         हर शहर के केंद्रीय स्थान पर परंपरागत उद्योगों, कुटीर
उद्योगों और असंगठित क्षेत्र के व्यापारियों के लिए व्यावसायिक भवन होना
चाहिए

·         हर सरकारी नीति का गरीब से गरीब लोगो पर क्या प्रभाव पड़ रहा है
उसका अध्ययन  हो

·         सूक्ष्म तकनीक के विकास पर बल हो न की मेगा - टेक्नॉलॉजि के विकास पर



छोटे किसान, छोटे उद्यमी और छोटे व्यापारी हर विकासशील देश का आधार हैं
और ये ही आज सबसे ज्यादा पिस रहे हैं. इनको कम ब्याज पर ऋण चाहिए लेकिन
सरकारें विदेशी पूंजी आकर्षित करने के लिए जान बुझ कर ब्याजदर ज्यादा
रखती हैं. इनको आसान ऋण चाहिए लेकिन बैंकिंग व्यवस्थाएं संगठित क्षेत्र
के पक्ष में हैं और ये उन व्यवस्थाओं में फिट नहीं हो पाते हैं. विक्सित
देशों में ब्याज दरें विकासशील देशों की तुलना में एक चौथाई से भी काम है
और इसी कारण वहां पर व्यापार और उद्यम फायदे मंद होता है. जबकि विकासशील
देश जान बुझ कर असंगठित क्षेत्र का गाला घोंट रहे हैं और अपने यहाँ पर
अपनी नीतियों से  गरीबी की खेती कर रहे हैं.


आज की सरकारी नीतियां बड़े उद्योगों और संगठित क्षेत्रे के लाभ के लिए हैं
और सरकार असंगठित क्षेत्र को हतोत्साहित कर रही है. आम जनता छोटे और
कुटीर उद्योग चलती है जिनका सम्बन्ध आस पास के रहने वाले लोगों तक होता
है. ये उद्योग कुशलता, सूक्ष्म तकनीक, स्वनिर्भरता के आदर्श उदाहरण होते
हैं. लेकिन इन से ये उम्मीद करना की ये टैक्स का हिसाब रखेंगे, रोज का
विवरण सरकार को जमा करवाएंगे और सरकारी महकमों में लाइन लगा कर खड़े होने
- कुछ उचित नहीं है. टैक्स के बढ़ते झमेलों और बढ़ती सरकारी लगामों के बीच
छोटा उद्यमी तो कुछ कर ही  नहीं पायेगा. अगर सरकार वाकई विकास चाहती है
तो उसको भारत को टैक्स फ्री देश बनाने के लिए सोचना चाहिए - जिससे हर
व्यक्ति लघु -उद्यमी बनने की सोचे न की टैक्स सलाहकार बनने की (आज की
स्थिति तो ये ही है की उद्यमी बनने से बेहतर है टैक्स सलाहकार बनना).
हमारे देखते ही देखते लाखों कुटीर उद्योग तबाह हो गए हैं और बचे- खुचे भी
हो जाएंगे - नतीजा होगा भयंकर गरीबी, भुखमरी और त्रासदी. बड़ी कंपनियां ,
बड़े उपक्रम और बड़ी तकनीकें (जिसको सरकार का वरदहस्त प्राप्त है) कभी भी न
तो बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन कर पाएंगे न लोगों को खुशहाली दे पाएंगे.
अगर सरकारी समर्थन न मिले तो ये बड़े उद्योग सूक्ष्म उद्योगों के आगे टिक
ही नहीं सकते हैं. लेकिन सरकार और पूरा का पूरा तंत्र आज संगठित क्षेत्र
के पक्ष में है.



दुनिया में हर व्यक्ति के लिए पर्याप्त भोजन है लेकिन जीवनशैली की शिक्षा
न होने के कारण ९० करोड़ लोगों का भोजन रोजाना झूठा डाल दिया जाता है.
अकुशल व्यवस्था के कारण काफी अनाज बेकार हो  जाता है - सड़ जाता है या
उसको फेंकना पड़ जाता है. अधिक आमदानी की चाह में किसान वाणिज्यिक फसलें
उगाने लगा है और बाजरी, ज्वार, और अन्य देशी धान की खेती काम होने लगी है
- जिससे कुपोषण फैलना स्वाभाविक है. किसी भी इंसान के लिए श्रेष्ठ भोजन
उसी क्षेत्र में पाया जाना वाला देशी अनाज या धान होता है और ताज़ी देशी
वनस्पतियां  होती  है  - जिसकी खेती को अब हतोस्ताहित किया जा रहा है.
पहले गरीब से गरीब घर में भी गाय या बकरी होती थी जिससे वो पोष्टिक भोजन
प्राप्त कर सकता था - अब तो सब शहरों में कटोरा लिए खड़े हैं. रेगिस्तान
के लोगों के लिए असली फल तो काचर, टींडसी, केर, काकड़िया - मतीरा, और सबसे
पौष्टिक धान तो ज्वार - बाजरी होते हैं  - लेकिन अब वो लोग भी दूर दराज
के प्रांतों के फल (जैसे सेव आदि) के पीछे पड़े हैं ( हमारी शिक्षा
व्यवस्था में यही   समझाया जाता है)  - नतीजा है भारत में सर्वव्याप्त
कुपोषण.

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