संस्कृति के सौदागर
ये क्या है - "संस्कृति के सौदागर"? कलाकृतियों के सौदागर, हथियारों के सौदागर, ईमान के सौदागर - इस दुनिया में सब के सौदागर हैं और हमारा खून खोल कर रह जाता है जब इन सौदागरों की करतूतों के बारे में पढ़ते हैं. पर ये संस्कृति के सौदागर कौन हैं? भारत पूरी दुनिया में वंदनीय हैं क्योंकि इसकी अद्भुत संस्कृति वंदनीय है. तो आज इस संस्कृति को तहस नहस करने वालों को सम्मान मिल रहा है और इस अद्भुत संस्कृति के सौदागरों को जो इनाम मिलता है वो और किसी सौदागर को नहीं मिलता है.
सिर्फ दिखावे के लिए हर सरकारी भवन में एक पोस्टर नजर आता है "हिंदी हमारी मातृ भाषा है - यहाँ पर हिंदी को प्रोत्साहन दिया जाता है.". ये सिर्फ और सिर्फ दिखावा है. उच्च प्रशाशनिक अधिकारी, नीति निर्माता, उच्च व्यवसायी सभी हिंदी और हमारी संस्कृति को तहस नहस करने में लगे हैं. आप सिर्फ और सिर्फ हिंदी जानते हों तो आप न तो अपनी कंपनी खोल सकते हैं, न अपनी कोर्ट में पैरवी कर सकते हैं न ही अपना व्यापार कर सकते हैं न ही उच्च सरकारी नोकरी प्राप्त कर सकते हैं. आप सिर्फ अंग्रेजी जानते हों तो ये सब काम कर सकते हैं. हाल ही मैं विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने एक आदेश जारी किया है की हिंदी में लिखे शोध पत्र को कोई मान्यता नहीं दी जायेगी. हिंदी में शोध पत्र, शोध पत्रिका, अनुसंधान को कोई मान्यता नहीं है. आप खुद समझ सकते हैं - उच्च नीति निर्माता क्या चाहते हैं. उच्च शिक्षा की दिशा और स्वरुप तय करने वाले हम नहीं कोई और हैं. आजादी के इतने वर्षों के बाद भी अगर हमारी सांस्कृतिक विरासत के बचाव में आने में हमें शर्म महसूस हो रही है तो इसके लिए जिम्मेदार नीतिनिर्माताओं और अधिकारियों के बारे में क्या कहें. ७०% जनसँख्या गावों में रहती है लेकिन पढ़ाई वो करवाई जाती है जो बड़ी कंपनियों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के काम आये. ७०% जनसँख्या कृषि, सूक्ष्म उद्योग और परंपरागत उद्योगों से जुडी है लेकिन उच्च शिक्षा पूरी तरह से बड़े उद्योगों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हितों को ध्यान में रख कर फैलाई जा रही है. हर उच्च शिक्षा संस्थान बहुराष्ट्रीय कंपनियों से अनुबंध करने और उनके लिए शोध करने के लिए लालायित है - कोई एक उच्च शिक्षा संस्थान बता दीजिये जहां पर भारत के परम्परागत उधोगों और ग्रामीण उदयोगों के लिए जरुरी तकनीक (सूक्ष्म तकनीक) पर शोध की जा रही हो.
चाहे बात हिंदी भाषा की हो या भारतीय संस्कृति की या गो रक्षा की - हर जगह पर हम खून के आंसू पीने को मजबूर हैं - क्योंकि आज तो " माटी अपनी पर पढ़ाई पराई" यानी कहने को जमीन हमारी है, लोग हमारे हैं लेकिन नीति निर्माता उसी विदेशी संस्कृति के गुलाम हैं जो हमारी संस्कृति की जड़ों को समझ नहीं पाई है.
किसी भी देश की संस्कृति ही उसको महान बनाती है और उस संस्कृति का आधार होती है वैचारिक धरोहर, सोच, जीवन मूल्य और शिक्षा व्यवस्था. आज देश में क्या हो रहा है? विदेशी शोधकर्ताओं के प्रभाव में आ कर के भारतीय शोधकर्ता इस शोध में लगे हैं की कैसे ये साबित करें की भारत में पशुधन यहाँ के लोगों पर भार है और इसी लिए यहाँ पर कत्लखाने होने चाहिए. दुनिया के जाने माने सामजिक वैज्ञानिकों ने अनेक लेख लिखे हैं जिससे उन्होंने गाय के प्रति भारतवासियों के प्यार को एक प्रकार का पागलपन साबित किया है और उनके देखा देखि अनेक भारतीय लेखकों ने भी इसी विषय पर अपने शोध पत्र प्रकाशित किये हैं और आगे भी इस प्रकार की शोध करते रहेंगे और इस तरह की शोध के लिए उनको आर्थिक सहायता भी मिलती रहेगी. विख्यात अमेरिकन मानवशास्त्री प्रोफ़ेसर मर्विन हैरिस ने अनेक शोध-पत्र प्रकाशित किये और उनके अनेक भारतीय अनुयायियों ने भी उनकी देखा देखि इन विषयों पर शोध पत्र प्रकाशित किये. उच्च शिक्षा और शोध में भारतीय चिंतन, संस्कृति और मूल्यों को पश्चिमी नजरिये से देखा जाता है और उसका विशेषणात्कम अध्ययन कर के शोध पत्र प्रकाशित किये जा रहे हैं. उच्च शिक्षा से शिक्षित हमारी अगली पीढ़ी हमारी परम्पराओं पर उपहास करेगी - क्योंकि हम स्वयं इस की तैयारी कर रहे हैं. जिस डाल पर बैठे हैं उसी को काट रहे हैं.
भारतीय सांस्कृतिक परम्पराओं को रूढ़ियाँ मान कर उच्च शिक्षाविद उपहास कर रहे हैं लेकिन आज ये समझने की जरुरत है की जिस आधुनिक तकनीक की हमारी उच्च शिक्षा वाह वाह कर रही है उसके कारण महानगरों में न शुद्ध हवा बची है न शुद्ध पानी न आपसी प्रेम. नयी तकनीक और नयी परम्पराओं के कारण हमारे पर्यावरण को जो नुक्सान पहुँच रहा है उससे आने वाले वर्षों में धरती पर तापमान बढ़ जाएगा और अंटार्कटिका के ग्लेशियर पिघल जाएंगे और समुद्री जल स्तर बढ़ जाएगा. बढ़ते तापमान के कारण जीवन मुश्किल हो जाएगा. हमारे सांस्कृतिक सन्दर्भों और परंपरागत उद्योगों का उपहास करने की जगह - उनको समझने, सक्षम बनाने और सहायता देने की जरुरत है.
एक शिक्षण संस्थान में मैंने विद्यार्थियों से शोध करने के लिए कहा की अगर कत्लखानों की जगह पर चौपालों को गोशाला में रखा जाए और उनके गोबर का इस्तेमाल कृषि और बायो-गेस में किया जाए तो क्या परिणाम होगा - उन विद्यार्थियों ने शोध कर के साबित किया की इससे आर्थिक लाभ भी होगा और लोगों को भी ख़ुशी और संतोष होगा. लेकिन इस प्रकार के शोध को प्रचारित और प्रकाशित करने वाले मंच नहीं है - उच्च शिक्षण संस्थान तो वो ही शोध करेंगे जो बहुराष्ट्रीय कंपनियों को मददगार हों. आज जरुरत है की हार्वर्ड या स्टेनफोर्ड की नक़ल कर के अपने पाठ्यक्रम और पाठ्य पुस्तकें बनाने की जगह पर हम बेयरफुट कॉलेज की तरह अभिनव प्रयास करें और शुद्ध भारतीय संस्कृति को हमारी उच्च शिक्षा का आधार बनाएं. कौन आगे आएंगे? आप कहेंगे - मैंने इस हेतु क्या किया है? मैंने इस हेतु महाविद्यालय खोलने का प्रयास किया लेकिन मुझे तो सरकार से अनापत्ति प्रमाण पत्र ही नहीं मिला - क्या करता. अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता.

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