BLACK MONEY PARALLEL ECONOMY
काली कमाई नहीं है पसीने की कमाई
जिस जिस देश में ज्ञान, कौशल, उद्यम, और मेहनत को सरकारी नोकरशाहों और नेताओं से ज्यादा तबज्जु मिली है उन देशों ने कम संसाधन के बावजूद भी अपनेनागरिकों को ज्यादा आनंद, उल्लास और सृजनशीलता का आनंद दिया है. जहाँ जहाँ नोकरशाह और नेता हावी हुए हैं वहां वहां पर लोगों ने नोकरियों, और चाटुकारिता कोतबज्जु देनी शुरू कर दी और निश्चित रूप से वहां की सृजनशीलता का ह्रास हुआ. जब आम जनता सरकारी नीतियों और निर्णयों से भय खाने लगे और आम जनता को हीदोषी मानने लगे तो समझों की व्यवस्थाओं में घुन लग गया है. सभी टैक्स, लेखा - जोखा, और सरकारी नियम आम आदमी की भलाई के लिए रखे जाते हैं न की इसप्रकार के – कि जिसको समझने और पालन करने के लिए भी व्यक्ति अपने आप को असहाय और बेचारा मासूस करे. सरकारी नीतियों से निम्न आयवर्ग, लघु-उद्यमियों, माध्यम वर्ग और कुटीर उद्योगों को फायदा मिलना चाहिए न की बड़े उद्योगों और संगठित क्षेत्र को. सरकारी नीतियों से लोगों के मन में ये विश्वास फैलनाचाहिए की ९९% जनता परिश्रमी, ईमानदार, देश-हित को सर्वोपरि रखने वाली है और जिस दिन ये भावना लोगों में वापस भर दी जायेगी - जनता हर समस्या के समाधानके लिए बिना सरकारी सहायता के भी आगे आएगी और हर समस्या को जड़ से मिटा देगी (सरकारों को जनता पर भरोसा होना चाहिए).
वह दिन बड़ा दुखद होगा जब लोगों का आपसी विश्वास ख़त्म हो जाएगा. देश के स्वाभिमान और आत्मविश्वास को तब चोट पहुंचेगी जब लोग एक-दूसरे की सत्यनिष्ठापर विश्वास करना छोड़ देंगे. फिर वो कौन सा देश जहाँ कोई इंसान किसी और व्यक्ति को ईमानदार मानने को तैयार नहीं हो? आज कल जो कुछ हो रहा है इससे कई लोगये सोचने लगें हैं की अधिकाँश भारतीय काली कमाई करते हैं और बेईमान हैं. छोटे बच्चों के कोमल मन पर इस चर्चा का तुरंत प्रभाव पड़ रहा है. कई बच्चे तो देश औरयहाँ तक की अपने घर - परिवार के लोगों को भी बेईमान मानने लगे हैं. बच्चे आदर्श-वादी होते हैं और वे ये देख कर दुखी हो रहे हैं की हर भारत-वाशी काली कमाई पर जीरहा है (जैसा की उनको प्रतीत हो रहा है). कई बच्चे तो भारत छोड़ कर किसी और देश में जाने का सपने भी देखने लग गए हैं. क्या ये सब सच है? आज तो ऐसी हवा चलरही है की शायद आप भी इस झूठ को सच मान लेंगे. आपसी विश्वास, आपसी सम्मान और सम्मिलित जिम्मेदारी ही हमें देश बनाती है. गरीब लोग सोचने लग गए हैं कीसारे अमीरों के पास काली कमाई है. अमीर छोटे और माध्यम उद्यमियों को कोस रहे हैं. कुल मिला कर हर व्यक्ति इस देश को काली कमाई का देश मानने लग गया है. ९९% लोग ईमानदार होते हुए भी एक दूसरे को बेमान मानते हुए उचित सजा की दुआ कर रहा है. ९९ प्रतिशत पसीने की कमाई कर रहे हैं लेकिन वो इस देश की कमाई कोकाली कमाई मान कर इस देश से काली कमाई के सफाये की दुवा कर रहे हैं.
काली कमाई का सम्बन्ध लाल-फीता शाही से है. अगर आप सारे राजनेताओं और सरकारी अधिकारियों को भी जोड़ लेंगे तो वो देश की १% आबादी से ज्यादा नहीं होंगे. देशकी ६० प्रतिशत जनसँख्या कृषि और कृषि से जुड़े व्यवसायों में हैं - जिनसे दूसरे लोगों में इस प्रकार नफरत भरी जा रही है की ये तो आयकर से मुक्त हैं. २५% आबादीकौशल आधारित उद्यमियों में संलग्न हैं - जिन पर हर दिन सरकार अपने कानूनों का शिकंजा बढ़ा रही है.
इन सभी प्रक्रियाओं से लोगों में आपसी जलन, उन्मेष और अविश्वास की भावना फ़ैल रही है और लोग भारतीय होने पर आत्मविश्वास खोते जा रहे हैं. अद्भुत भारतीयपरम्परागत उद्योग और व्यवस्थाएं ख़तम हो रहे हैं. धीरे धीरे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को समाप्त कर के शहरी अर्थव्यवस्था को स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है.
लघु और कुटीर उद्योगों और सीमित लेख रखने वाले ये ८५% लोग भारत की असली ताकत हैं और असली विरासत हैं. इनको संबल और सहारा दिया जाना चाहिए लेकिनसंगठित क्षेत्र को प्रोत्साहन देने वाली सरकारों ने आज तक इनको कभी प्रोत्साहित नहीं किया है. सोनार, लुहार, सुथार, नाइ, कुम्हार जैसे अद्भुत वैज्ञानिकों को अगरसरकारी प्रोत्साहन मिल जाए तो भारत फिर से सूक्ष्म उद्यमियों के सहारे पूरी दुनिया में सिरमौर बन जाए. ये वो लोग हैं जिनके हुनर को सरकारी प्रयोगशालाओं सेसहायता चाहिए, सरकारी महकमे से सहारा चाहिए और इनके ज्ञान को डिग्री की मान्यता चाहिए. सरकार कौशल विकास के नाम पर सालाना दो हजार करोड़ खर्च करसकती है - लेकिन इन अद्भुत कौशल वाले लोगों को संबल देने के लिए एक हजार करोड़ भी नहीं खर्च कर सकती है. कौशल में जुटी ये पीढ़ी शायद आखिरी पीढ़ी बन जाए - क्योंकि इनके बच्चे तो कंपीटिशन दे कर सरकारी बाबू बनना चाहते हैं. ये ही हाल छोटे और मंझले उद्यमियों का होने वाला है. सरकार के विकास के मॉडल में संगठित क्षेत्रही सर्वोपरि है.
आजादी के पहले २ दशकों तक सरकार रूस की तरह साम्यवादी व्यवस्था लाने के सपने देखती रही - जो न तो संभव था, न व्यवहारिक था न उचित था. निजी क्षेत्र कोदबाया गया और उद्यमिता को हतोत्साहित किया गया. नोकरशाही को तबज्जु दी गयी. बाद की सरकारों ने धीरे धीरे बड़े और संगठित क्षेत्र को प्राथमिकता देनी शुरू करदी. संगठित क्षेत्र के पास अनेक कर्मचारी होते हैं जिनसे व्यवस्थित लिखे संभव हैं - और इसी लिए ये क्षेत्र सरकार का पसंदीदा क्षेत्र है. लेकिन देश की अधिकाँश जनसँख्याअसंगठित क्षेत्र में हैं जो आज हासिये पर खड़ी है.
जो काम विवेकानंद जैसे संतों ने किया था - वो काम आज सरकारों को करना चाहिए - यानी देश और उसके युवाओं में आत्मविश्वास, आपसी सौहार्द और आपसी समझ कोबढ़ावा देना. अंग्रेजों की सफलता (उन्होंने भारत का शोषण किया ) का राज यही था की उन्होंने हर भारतीय में हीन भावना भर दी और हर भारतीय को आपस में लड़ादिया. उन्होंने इस प्रकार का इतिहास और शिक्षा शास्त्र रचाया की भारतीयों का सारा आत्मविश्वास ख़त्म हो जाए. लेकिन तीन शताब्दियों के शोषण के बाद भी न तो वेभारत की अद्भुत परंपरतों को समाप्त कर पाए न ही हुनर और ज्ञान को और न ही एक दूसरे की ईमानदारी पर विश्वास को. फिर से देश के परंपरागत ज्ञान और विश्वासकी फसल शुरू करने का समय आ गया है.
सरकार जितना खर्च टैक्स संकलन, व्यवस्था और प्रचार प्रसार पर करती है उससे काफी नुक्सान देश के लोगों में हीन भावना, असंगठित क्षेत्र के प्रति द्वेष और युवा वर्गमें उद्यमिता के प्रति नफरत के रूप में पैदा हो रही है (क्योंकि संगठित क्षेत्र के लिए निवेश बहुत ज्यादा चाहिए और असंगठित क्षेत्र तो सीमित साधनों के कारण सरकारीकार्यप्रणालियों को पूरा नहीं कर पाता है). सरकार को टैक्स की दरों को कम कर के और टैक्स का भार कम कर के टैक्स-फ्री देशों से प्रेरणा लेनी चाहिए और हर नागरिक कोउद्यमिता अपनाने और देश के लिए अपने संसाधन न्योछावर करने के लिए प्रेरित करना चाहिए. अगर ये सब हों तो शीघ्र ही सरकार का आधा कार्य जनता ही शुरू करदेवे.
फिलहाल तो हर नागरिक के मन में ये बात डालिये की पसीने की कमाई काली कमाई नहीं है - हाँ अघोषित आय हो सकती है. हर नागरिक के मन में भारतियों के प्रतिसम्मान और विश्वास का भाव पैदा करना है ताकि किसी भी कम पढ़े लिखे या अनपढ़ लेकिन दक्ष कारीगर के मन में अपने जीवन के प्रति धिक्कार नहीं बल्कि सम्मानकी भावना हो. शहरी-करन की अंध-दौड़ को ख़त्म करने और आनंद और उल्लास से भरी ग्रामीण व्यवस्थाओं को फिर से मजबूत बनाये. राजनेताओं और नोकरशाहों कीबढ़ती सत्ता को कम कैसे करें? - आज तो सबसे बड़ी चुनॉती ये ही है.

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