Sunday, January 29, 2017

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सलाम पर्वतों : सलाम पर्वतारोहियों 

(संयुक्त राष्ट्र के द्वारा घोषित अंतरास्ट्रीय पर्वत दिवस ११  दिसम्बर पर  विशेष )

पर्वत विश्व के लिए जरुरी हैं. पर्वत दुनिया की सांस्कृतिक विरासत हैं. पर्वत शुद्ध हवा, शुद्ध पानी और शुद्ध जीवनशैली के प्रतीक हैं. पूरी दुनिया में पर्वतों पर धर्म, आस्था और अध्यात्म का जमावड़ा होता है. पर्वत शुद्ध जीवनशैली के प्रतीक हैं. इसी लिए भगवान् शिव ने कैलाश को चुना था. आज भी ज्ञान और अध्यात्म की पराकाष्ठा पर्वत पर ले जाती है. पर्वत धरती माँ के जीवन के लिए एक आस हैं. नदियों, संस्कृतियों और विशुद्ध आबोहवा के लिए पर्वत ही तो वरदान हैं. इसी लिए ११ दिसंबर को पूरी दुनिया में पर्वत दिवस मनाया जा रहा है और पर्वतों और उनकी संस्कृतियों को सलाम किया जा रहा है. 

चरों तरफ दूर दूर तक बर्फ ही बर्फ - जीवन तो जैसे ठहर सा जाता है. याद कड़ा हिम स्खलन होता रहता है. फिर भी कुछ है जो इन पर्वतों को भी आकर्षक बना देता है. ये वो स्थान हैं जहाँ दूर दूर तक जीवन तो नहीं दीखता लेकिन जीवन के लिए जरुरी सामान तैयार होता है (जैसे शुद्ध हवा, शुद्ध पानी). बहुत काम आबादी रहती है पर्वतों पर - और बहुत काम लोग ही पर्वतों पर चढ़ने के लिए सोच पाते हैं. हिम्मत, जूनून और एक प्यार चाहिए पर्वतों से. पर्वतों पर रहने वाले लोगों की जीवनशैली अद्भुत होती है क्योंकि उनको बड़ी ही मुश्किलों के बीच जीना पड़ता है. मेरे भाईसाहब श्री सुरेश पारख मसूरी की सबसे ऊँची चोटी लाल-टिब्बे पर रहते हैं और उनके जीवन को देख कर मैं तो नतमस्तक हूँ. पर्वतों पर रहने वाले लोग एक सांस्कृतिक विरासत की तरह हैं. ये लोग पर्यावर्तन के अनुकूल जीवन जीते हैं और पर्यावरण के साथ बड़े एकात्म का भाव रखते हैं. इन लोगों से हमें बहुत कुछ सीखना हैं. चूँकि आज पर्वतों का अंतरास्ट्रीय दिवस है अतः, इस मोके पर बीकानेर के पर्वतारोही श्री मगन बिस्सा और श्रीमती सुषमा बिस्सा का जिक्र जरुरी है. कैसे रेगिस्तान  के लाडले दुनिका के सबसे मुश्किल पर्वतों की चढ़ाई कर सकते हैं और कैसे वहां पर बीकानेर का नाम अमर कर सकते हैं ये जानकार बड़ा रोमांच होता है. श्री मगन बिस्सा ने १९७८ में हिमालयन ट्रैकिंग का बेसिक और एडवांस्ड कोर्स किया वो भी श्री तेनजिंग नोर्गे और नवांग गोम्बु के मार्गदर्शन में. उन्होंने प्रथम प्रयास में ही ऐ श्रेणी से ये प्रशिक्षण हासिल किये और १९८४ में एवरेस्ट की चढ़ाई के लिए चयनित हुए. २८००० फ़ीट की ऊंचाई को चढ़ने के बाद अपने साथियों को बचाने के लिए उनको नीचे आना पड़ा. उन्होंने एवेरेस्ट को चढ़ने के लिए नए रास्ते से दुबारा चढ़ाई की और इस प्रकार कुल चार बार एवेरेस्ट अभियान में भाग लिया. अगले अभियान में उनको एवरेस्ट पर २८००० फ़ीट की ऊंचाई से दुर्घटना का भी सामना करना पड़ा  और ५०० फ़ीट की गहराई पर जा गिरे और उस से उनका पैर भी जख्मी हो गया. 
पर्वतारोही एक संस्कृति को सलाम करते हैं और पर्वतों को उनके योगदान को बनाये रखने में योगदान देते हैं. श्री बिस्सा जी और श्रीमती बिस्सा जी ने अनेक अभियान किये और अनेक लोगों को पर्वतारोही बनाया. उनके प्रयास अदम्य हैं और प्रशंशनीय हैं. उन्होंने पुरे भारत के युवाओं में रोमांच, साहस, और पर्वतारोहण को बढ़ावा दिया है. मैंने उनको बाफना स्कुल बीकानेर  और  ज्ञान विहार  विस्वविद्यालय जयपुर  में विद्यार्थियों से बातचीत करने के लिए आमंत्रित किया था और विद्यार्थी उनसे उनके रोमांचक किस्से सुन के बड़े उत्साहित हुए. ६ साल पहले बीकानेर के चेंज-मेकर्स पर निकली मेरी इ-बुक में मैंने उनकी कहानी का जिक्र किया था जिसको सभी ने सराहा. इस प्रकार के व्यक्तियों से रूबरू हो कर व्यक्ति का जीवन के प्रति नजरिया ही परिवर्तित हो जाता है. श्री बिस्सा ने पर्वतों पर संकट में फंसे लोगों को बचाने में प्रशंशनीय योगदान दिया है. उत्तराखंड में जब आपदा आयी, तो श्री बिस्सा तुरंत आपदा राहत के लिए वहां गए और अनपे अनुभव और कुशलता से अनेक लोगों की मदद की. उन्होंने अनेक अवसरों पर अपनी जान को जोखिम में दाल कर अन्य लोगों की जान बचाने का प्रयास किया. श्री मगन बिस्सा के योगदान की बछेंद्री पाल भी अपनी पुस्तक में भूरी भूरी प्रशंशा करती हैं. आज श्री बिस्सा जी को उनके योगदान के लिए अनेक सम्मान और अनगिनत दुवाएं मिल रही हैं. कभी रात रात भर जाग कर वो हिमालय को निहारा करते थे - तो आज वो युवाओं के लिए अपने संस्मरणों की तिजोरी खोले बैठे रहते हैं.  युवाओं के लिए वे एक आदर्श व्यक्तित्व हैं. 

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