Sunday, January 29, 2017

MAHARANA PRATAP

वाहवो स्वाभिमानी देशप्रेमी !!!!!!
(२९ जनवरी को महाराणा प्रताप की पूण्य तिथि पर विशेष)

पूरी दुनिया में जब भी स्वाभिमान और देशभक्ति के आदर्श प्रस्तुत किये जाते हैं तो हमेशा महाराणा प्रताप को याद किया जाता हैमहाराणा प्रताप का पूरा जीवन ही संघर्षमें बीत गयावो चाहते तो अकबर के आगे घुटने टेक कर ऐशो आराम की जिंदगी जी सकते थे लेकिन आदर्श था स्वाभिमान और आजादी की जिंदगी - और जीते जी उनकोकोई गुलाम नहीं बना सका.

महाराणा की कहानी ही देश भक्ति की हुंकार करने का सबब देती हैये रोंगटे खड़े करने वाली कहानी आज भी हर युवा मन को झकझोर देती है और देश के लिए मर-मिटनेकी तमन्ना भर देती हैदेश के लिए त्यागबलिदान और कस्ट सह के भी समझौता  करने की महाराणां का अदम्य आदर्श आज भी हमारे युवाओं का आदर्श है

कन्हैया लाल सेठिया की कविता पीथळ और पाथळ आज भी लोगों को महाराणा प्रताप की जिंदगी और मकसद याद दिलाती है -

अरै  घास  री  रोटी  ही  जद  बन  बिलावड़ो  ले  भाग्यो
नान्हो  सो  अमरयो  चीख  पड्यो  राणा  रो  सोयो  दुःख  जाग्यो .
हूँ  लड्यो  घणो  हूँ  सह्यो  घणो
मेवाड़ी  मान  बचावण  नै
इस कविता में कवी कन्हैया लाल सेठिया लिखते हैं की अपने लड़के को भूख से तड़पता देख के राणा प्रताप एक बार समर्पण करने का इरादा बना लेते हैं और अकबर कोचिठ्ठी लिख देते हैंजब ये बात अकबर पीथळ नामक कवी को बताता है तो वो सिहर उठता हैपीथळ राणा प्रताप को एक पत्र लिखता है और पूछता है की क्या अब सिंहसियालों के साथ रहेगाये पढ़ कर राणा प्रताप फिर से अपना फैसला बदल लेते हैं और ये लखते हैं की -....
हूँ भूख मरूं‚ हूँ प्यास मरूं‚ मेवाड़ धरा आजाद रहै।
हूँ घोर उजाड़ां मैं भटकूँ‚ पण मन में माँ री याद रह्वै

किसी मकसद के लिए पूरा जीवन कुर्बान कर देना आसान नहीं होता हैदेश और देशप्रेम के लिए अपने सारे सुख न्योछावर कर देना आसान नहीं होता हैमहाराणा केवलनाम को राजा थे - उन्होंने अपना पूरा जीवन ही जंगलों और दरियाओं के बीच बितायावो भटकते रहे - बचते रहे - लेकिन कभी हार नहीं मानी.
उस समय राजस्थान के ज्यादातर राजा अकबर के आगे घुटने टेक चुके थेअधिकाँश लोग अकबर के आगे झुकने के पक्ष में थेराणा प्रताप के भाई और रिश्तेदार भी एकएक कर के अकबर के साथ हो गए थेअकबर एक के बाद एक कुल छह बार प्रस्ताव भेज चूका था लेकिन राणा प्रताप अडिग रहे.
जहाँ एक शानदार मकसद होता है - मजबूत इरादे होते हैं वहां फौलादी मुसीबतें भी आती है और चकना चूर हो जाती हैंराणा प्रताप के ही भाई शक्ति सिंह ने अकबर कीसेना की मदद की और मानसिंह को वो रास्ता बताया जिससे वो प्रताप की सेना पर धावा बोल सकेशुरुआत में राणा प्रताप ये युद्ध जीत रहे थे और अपने से चार गुनाज्यादा बड़ी सेना को हरा चुके थेलेकिन अकबर ने युद्ध भूमि पर एक और सेना भेज दीअकबर के आदेश पर ज्यादातर राजपूत राजाओं ने अपनी सेना राणा प्रताप केखिलाफ लड़ने के लिए भेज दीइस प्रकार युद्ध का पलड़ा पलट गयाराणा प्रताप को धक्का तब लगा जब उनका प्रिय घोडा चेतक मर गयाअगले  साल उन्होंने जंगलोंमें बिताये और फिर से नयी सेना को संगठित कियाउस समय जब उनके पास कुछ नहीं था तब भी उनके पास अपनी मातृ भूमि को फिर से आजाद करने का एक सपनाथाऐसे समय में भामाशाह ने उनकी मदद की और उनको फिर से एक सेना बनाने के लिए आर्थिक सहायता दी जिसकी वजह से उन्होंने फिर से मेवाड़ को अकबर सेआजाद करवा लिया.
राणा प्रताप के जीवन में कई ऐसे  मोके आये जब हो थक हार कर टूट चुके थेएक समय वो अकबर के आगे सर झुकाने के लिए विवश हो गए थेलेकिन हर बार उनकोकोई  कोई सहारा मिल ही जाता जो फिर से उनको अपने सपनो के लिए जीने का सहारा दे देताअपने से कई गुना बड़े दुश्मन से लड़ने के लिए राणा प्रताप ने अद्भुत युद्धशैली और अद्भुत नेतृत्व कला का परिचय दियाउन्होंने ऐसे लोगों की एक टीम बनायीं जो देश के लिए हमेशा मर मिटने को तैयार रहती थीउनके पचीस साल के शाशनमें देश और मेवाड़ को सम्मान से जीने का एक मकसद मिल गया

ऐसे समय में जब हर कोई पैसे के लिए बिक रहा था - राणा प्रताप ने लोगों को प्यार और सम्मान से जीता था. उसके अपने भाई अकबर के साथ मिल गए थे लेकिन उस समय भी भीलों ने मदद की और उसके लिए अपनी जान की भी बाजी लगा दी थी. राणा प्रताप ने स्वाभिमान से जीवन जीने का एक तरीका हमारे सामने प्रस्तुत किया है और एक ऐसी मिसाल स्थापित की है जो हमेशा हमको प्रोत्साहित करेगी. महाराणा प्रताप की कहानी एक आक्रांता की कहानी नहीं बल्कि एक देशभक्त रक्षक की कहानी हैं. ये हम सब का फर्ज है की इस अद्भुत नायक की कहानी को हमारी अगली पीढ़ी तक पहुंचाए

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