SONE KI CHIDIYA INDIA
फिर से पहचानो अपने आपको - सोने की चिड़िया
एक समय पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा निर्यात भारत ही करता था. एक समय में पूरी दुनिया में विदेशी व्यापार का सबसे बड़ा केंद्र भारत ही था. एक समय में पूरी दुनिया की नजर भारत पर रहती थी. इतिहास फिर दुहरा सकता है. समय फिर बदल सकता है. सोच और विश्वास बदलिए - शायद - नया समय फिर हमें उसी गौरवान्वित स्थिति में ले जा सकता है. आम आदमी की आय इस बात पर निर्भर करती है की उसके ग्राहक उसकी कितना भुगतान कर सकते हैं. सरकारी मशीनरी ने आम आदमी की क्षमता को समाप्त कर दिया है और सरकारी निर्भरता पैदा कर दी है. सरकारें आम आदमी को संबल प्रदान करने के लिए हैं न की उनको बैसाखी प्रदान करने के लिए. आज नहीं - वर्षों से भारतवासी अपने उत्पादों से पूरी दुनिया के ग्राहकों का दिल जीतना जानते हैं लेकिन विगत कुछ वर्षों से सरकारी नीतियों के चलते हमारे व्यापारिक समीकरण बदल गए हैं - आज हम निर्यात करने के लिए तरस रहें हैं और हमारा आयात निर्यात की तुलना में बहुत अधिक है और लगातार बढ़ता ही जा रहा है. हम में से हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में विदेशी व्यापार को प्रभावित कर रहा है. बीकानेर के खाद्य उत्पाद, मीनाकारी, हस्त-शिल्प, चित्रकारी, कार्पेट (जो बनते भदोही में हैं लेकिन उन बीकानेर से ही जाती है) आदि पूरी दुनिया में बिक रहे हैं.
दुनिया की मंडी में हर देश एक व्यापारी है. जिस देश के पास जो होता है वो उसको बेचने की कोशिश करता है. जो ज्यादा बेचता है वो ही ज्यादा तरक्की करता है. हमारे देखते ही देखते चीन ने पूरी दुनिया की मंडियों पर कब्जा कर लिया है. इसका फायदा चीन के नागरिकों को मिल रहा है और अमेरिका का वर्चस्व खत्म हुआ है जिसका दुष्परिणाम वहां के नागरिक झेल रहे हैं. अमेरिका के पास बेचने के लिए आज भी बहुत कुछ है जैसे हथियार, तकनीक, ज्ञान, पुस्तकें आदि. पूरी दुनिया में व्यापार के वही नियम हैं जो आप और हम आस- पास देखते हैं. जो व्यापारी ज्यादा माल रखता है, ज्यादा मिलनसार होता है, ज्यादा गुणवत्ता का माल बेचता है और ज्यादा नवाचार करता है वो ही ज्यादा सफल होता है - ये ही बात विदेशी व्यापार के सन्दर्भ में अलग अलग देशों के साथ होती है. व्यापार बढ़ाने के लिए सरकारी डंडे से काम नहीं चलता बल्कि व्यापारिक दक्षता, ग्राहकों की समझ और चतुर वेदेश नीति चाहिए. आज भारत को बढ़- चढ़ कर इस दिशा में आगे कदम बढ़ाना पड़ेगा.
भारत के पास क्या है जो पूरी दुनिया में बिक सकता है? भारत के पास कोनसी दक्षता है जिसका पूरी दुनिया लोहा मानती है और जिस के क्षेत्र में कोई भी देश हमसे प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकता है? भारत के उन देशों के साथ कैसे सम्बन्ध हैं जो हमारा माल खरीद सकते हैं? ये वो प्रश्न हैं जिन पर गंभीर चिंतन चाहिए. भारत के हेंडीक्राफ्ट, फल, सोफ्टवेयर, कपड़े, साज-सज्जा के सामान की पूरी दुनिया में मांग है. व्यापार के क्षेत्र में गुटबंदी स्वाभाविक है. भले ही वर्ल्ड ट्रेड आर्गेनाईजेशन कितनी भी कोशिश करले - गुटबंदियाँ नहीं टूटेगी. आज भारत भी अकेला नहीं है. जापान, ईरान, और आसियान के देश भारत के साथ हैं और हर दूसरे दिन नए- नए देश भारत के साथ जुड़ते जा रहे हैं. दुनिया में दो तरह के देश हैं - एक वो जो सिर्फ निर्यात ही करते हैं और दूसरे वो जो आयात और निर्यात के मजबूत सम्बन्ध स्थापित करते हैं. चीन और इस प्रकार के विकसित देश सिर्फ निर्यात करना चाहते हैं लेकिन ज्यादातर विकासशील देश द्विपक्षीय व्यापार चाहते हैं - अतः भारत को इन विकासशील देशों को तबज्जु देनी चाहिए. भारत इस कर भी रहा है. भारत ईरान में बहुत बड़ी परियोजना लगा रहा है. इस प्रकार भारत का ईरान और उसके आस पास के देशों के साथ व्यापार बहुत बढ़ जाएगा. इससे ईरान भी खुश और भारत भी. भारत को बड़ी मात्रा में पेट्रोलियम प्रोडक्ट खरीदना पड़ता है - जो ईरान बेच देगा - और भारत ईरान को अपना माल बेच देगा. परियोजना के तहत भारत ईरान में सड़कें, बंदरगाह और इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास करेगा और भारत और ईरान के बीच सीधे जहाज़ों का आदान प्रदान होगा. ये वो कदम है जो भारत को ईरान के बहुत नजदीक ला देगा. इस प्रकार के समझौते हमें अन्य देशों के साथ भी करने चाहिए. इस प्रक्रिया में गहरी व्यापारिक सूझ- बुझ साफ़ झलकती है. भारत ईरान में जो परियोजनाएं लगा रहा हैं उनका कोई पैसा नहीं लेगा. लेकिन उसकी लागत को आयात किये जा रहे पेट्रोल से समावेशित कर लेगा. इसे कहते हैं सही व्यापारिक समझ.
आसियान देशों के साथ भी भारत मजबूत व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित कर रहा है. आज आसियान के लिए भारत से बेहतर कोई भी विकल्प हैं हैं क्योंकि वे भी चीन की दादागिरी से मुक्त होना चाहते हैं. हकीकत में आज आधी दुनिया चीन और अमेरिका की दादागिरी से मुक्त हो कर द्विपक्षीय व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित करना चाहती हैं. अफ्रीकन देश बड़ी संख्या में भारत के साथ व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित करना चाहते हैं. इन सब देशों को बड़े स्तर पर निर्यात किया जा सकता है और वहां से फल, कृषि उत्पाद, मिनरल व् अन्य सामान मंगाए जा सकते हैं. ये देश डॉलर में भुगतान करने की स्थिति में नहीं होते हैं - अतः जो व्यापारिक समझौता हमने ईरान के साथ किया है वैसे ही समझौते हमें इन देशों के साथ करने चाहिए. वस्तु विनिमय शुरू करना चाहिए.
आज के इस दौर में वो ही देश अधिक सफल होते हैं जिनके व्यापारिक प्रतिनिधियों का पूरी दुनिया में भ्रमण होता है और जो हर देश की जरूरतों को समझते हैं. आज जरुरत है की हमारे देश के व्यापारिक प्रतिनिधिमंडल भी नए नए विकासशील देशों की तरफ अभिमुखी हों और अधिक से अधिक वस्तु विनिमय और आपसी साझा मुद्रा विनिमय से अपने व्यापार को बढ़ावा देवें. उम्मीद हैं की भारत के हर छोटे छोटे शहर के अद्भुत कारीगरों और हस्तशिल्पियों को उनके माल के खरीददार दिलवाने के लिए हमारे व्यापारिक प्रतिनिधि विदेशी व्यापार को प्राथमिकता देंगे और सरकार पर प्रभाव डालेंगे की वो भी कुछ कदम उठाये. सरकारी नीतियों में आ रहा बदलाव स्वागत योग्य है और हम सब को इस दिशा में आगे सहयोग करना ही पड़ेगा.
आज का ज़माना ज्ञान आधारित सेवाओं और तकनीकों का है. इस दिशा में सही रणनीति और दिशा की जरुरत है. ये वो क्षेत्र हैं जिसमे भारत चीन, अमेरिका और अन्य विक्सित देशों से कई गुना आगे हैं लेकिन गलत नीतियों के कारण हमारे ज्ञान का गला घोंट दिया गया है. पूरी दुनिया की इस मंडी में आज सबसे महंगे उत्पाद ज्ञान आधारित हैं. इन क्षेत्रों में आगे बढ़ने के लिए हमें पूरी दुनिया में हिंदी भाषा को बढ़ावा देना पड़ेगा और हमारे अद्भुत ज्ञान को विदेशों में प्रचारित करना पड़ेगा. जिस दिन भारत के ज्ञान की सही कीमत मिलने लगेगी - उस दिन से भारत में फिर से धनवर्षा होने लगेगी. वो दिन दूर नहीं जब भारत के आयुर्वेद चिकित्सक, लोक गायक, लोक-कथा मर्मज्ञ, चिंतक, लेखक और कलाकार पूरी दुनिया पर छा जाएंगे - और जब उनको आमदानी होगी तो भारत फिर से सोने की चिड़िया बनेगा ही बनेगा.

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