चलिए स्टार्टअप की दुनिया बनाएं
बेरोजगारी बढ़ती जा रही है. सरकारी नोकरिया सीमित है. ऑटोमेशन के कारण नोकरियों में कमी होगी. हर साल बेरोजगारों की भीड़ बाजार में आ रही है. आज नोकरी लेनेवाले नहीं नोकरी देने वाले चाहिए. समाधान क्या है? सरकार ने देर से ही सही आज स्टार्टअप के महत्त्व को समझा है और आज स्टार्टअप को बढ़ावा देने का फैसला कियाहै. आज फिर से भारत उद्यम प्रधान देश बनने की तयारी कर रहा है.
क्या है स्टार्टअप ?
युवा व्यक्ति या विद्यार्थी जब नयी कंपनी शुरू करता है तो उस उद्यम को स्टार्टअप कहा जाता है
क्या है तर्क स्टार्टअप के खिलाफ?
आज हताश लोगों को की कमी नहीं है. कोई अपनी अच्छी खासी नोकरी से हताश है, तो कोई तरक्की नहीं मिल पाने से हताश है तो किसी को नोकरी न मिलने से हताशाहै. इन लोगों को कोई भी योजना बुरी लगती है अतः ये लोग आज स्टार्टअप योजना को भी बुरी बता रहे हैं और इसके अमल में रोड़े अटका रहे हैं. इन लोगों का कहना हैकी "स्टार्टअप हर एक के बस की बात नहीं होती. उद्यमी तैयार नहीं किये जा सकते हैं. उद्यमी तो जन्म से पैदा होते हैं. सरकार किसी को उद्यमी कैसे बना सकती है.स्टार्टअप करना कोई आसान नहीं. घाटे की सम्भावना है." आदि आदि... ये सब बेबुनियादी बाते हैं. एक समय में भारत पूरी तरह से उद्यमी देश था - हर व्यक्ति उद्यमीही बनता था और नोकरी के लिए जाना तिरस्कार से देखा जाता था. हर व्यक्ति हुनर सीखता था और अपना स्वयं का उद्यम स्थापित करता था. लेकिन सरकार ने स्वयंहमारे उद्यम प्रधान देश को नोकरी प्रधान देश में बदल दिया. ये सब आजादी के बाद से आयी सरकारी नीतियों का परिणाम है. जिस देश को उद्यम प्रधान देश से नोकरीप्रधान देश बनाया जा सकता है तो उसको वापिस उद्यम प्रधान देश भी तो बनाया जा सकता है. अफ़सोस ये है की देश को उद्यम प्रधान बनाने की जिम्मेदारी उन लोगों केपास हैं जो स्वयं नोकरी प्रधान सोच में जीते हैं और उससे बाहर सोच नहीं सकते हैं. उनको उद्यम प्रधान देश में अपने अस्तित्व और अपने वर्चस्व {नोकरशाही वर्चस्व}की चिंता है. और इसी कारण आज भी देश में उद्यमिता की बात आते हैं कई लोग प्रश्न चिन्ह लगा देते हैं.
उद्यमिता की सभी योजनाएं बादलों की तरह आती हैं और गरजती है लेकिन बरसती नहीं हैं क्योंकि नोकरशाही और नोकरी केंद्रित सोच आड़े आजाती है. हर जगह परनोकरशाही ने अपने इतने पाँव पसार लिए हैं की किसी भी सरकारी योजना का अमल उनकी इच्छा शक्ति पर निर्भर है और देश की तरक्की की सारी क्रेडिट वो अपने नामकरना चाहते हैं अतः आज इस मकड़जाल के कारण स्टार्टअप की शानदार योजना भी सरकारी बजट के बावजूद अपने सुनहरे दिनों के लिए तरस रही है. लेकिन येनिश्चित है की किसी भी देश के विकास की योजना को ज्यादा समय तक रोक नहीं जा सकता और आम लोगों को विकास के फायदों से रोकने के परिणामों का अंजाम बुराही होता है.
स्टार्टअप की दुनिया का पहला कदम है "टिंकरिंग लैब". ये लेब हर स्कुल और कॉलेज में खोले जाने हैं. सरकारी सहायता के बावजूद आज भी गिने चुने स्कुल और कॉलेजये लेब शुरू करने के लिए प्रयास कर रहे हैं. यहाँ तक की उन सरकारी स्कूलों में भी ये लेब नहीं हैं जिनको सरकार पूरी तरह से सहायता दे रही है. उद्यमिता की शुरुआतस्कुल के दिनों से होती है. टिंकरिंग लैब एक ऐसी लैब है जिंसमे विद्यार्थी नवाचार करने का प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं और नए नए विचारों के ऊपर काम करते हैं. टिंकरिंगलैब के द्वारा देश में नवाचार की संस्कृति को बढ़ावा मिलना निश्चित है. अफ़सोस है की हर स्कुल और कॉलेज प्रतिस्पर्धा (प्रतिस्पर्धा का माहौल न तो विद्यार्थियों के लिएन ही देश और समाज के लिए हितकर है - इसको रोकना जरुरी ही नहीं अनिवार्य है) को बढ़ावा देना चाहता है लेकिन नवाचार को नहीं. होना तो ये चाहिए था की बिनासरकारी सहायता के भी स्कूलों और कॉलेजों को टिंकरिंग लैब खोलने चाहिए थे - लेकिन हो ये रहा है की सरकार की इतनी सहायता के बावजूद भी एक भी स्कुल औरकॉलेज टिंकरिंग लैब खोलने के लिए आगे नहीं आ रहा है. अफ़सोस है की भेड़चाल और हीन भावना हमारी शिक्षण संस्थाओं को लील रही है. आज जिस विद्यालय को देखोवो अपने आप को कुछ तथाकथित अंग्रेजी माध्यम स्कूलों की नक़ल करती नजर आती है. नवाचार करना तो उनके बस की बात नहीं है और अपने सांस्कृतिक संदर्भोऔर अपनी जमीनी विरासत को बढ़ावा देने की बजाय सिर्फ कुछ घिसे पिटे मॉडल की नक़ल करने मात्र से वो अपने आप को श्रेष्ठ स्कूल साबित करना चाहते हैं. ऐसेशिक्षण संस्थाओं का टिंकरिंग लैब और इस प्रकार के अद्भुत प्रयासों से क्या वास्ता?
स्टार्टअप की दुनिया का दूसरा कदम है इन्क्यूबेशन केंद्र. इन्क्यूबेशन केंद्र में विद्यार्थी को उसके आईडिया को उत्पाद में बदलने के लिए प्रशिक्षण और मार्गदर्शन दियाजाता है. इन्क्यूबेशन केंद्र कोई भी कॉलेज, यूनिवर्सिटी, उद्योग समूह, एसोसिएशन, या स्वयं सहायता समूह शुरू कर सकता है. होना तो ये चाहिए था की हर संस्था जोअपने देश और समाज में उद्यमिता को प्रोत्साहन देने के लिए तत्पर हो उसको आगे आ कर ये शुरुआत करनी चाहिए थी. लेकिन आज सरकारी सहायता के बावजूद भीएक भी शिक्षण संस्था इस कार्य के लिए आगे नहीं आ रही है (कुछ अपवाद को छोड़ कर). महाविद्यालय और विश्वविद्यालय निकृष्ट राजनीति के अड्डे बन गए हैं. छात्रसंघ कार्यालय के उदघाटन के लिए सब लोग जुटे रहते हैं और अर्थहीन प्रयोजन पर दुनिया भर के नेता आ जाते हैं और धन, संसाधन, समय और छात्र शक्ति की बर्बादीहोती है और विद्यार्थियों को भ्रमित कर के निकृष्ट राजनीति के कुचक्र में धकेल दिया जाता है. वो विद्यार्थी जो गाव से होनहार व्यक्ति बनने के लिए शहर में आता है वोकब राजनीति का मोहरा बन जाता है खुद उसको भी पता नहीं चलता और इस प्रक्रिया में सहयोगी बनते हैं शिक्षण संस्थाओं के वो अधिकारी जो कुछ छुटभैया राजनेताओं का अपने विद्यार्थियों के सामने महिमामंडन कर के अपने आपको धन्य समझते हैं और अपने छोटे मोटे काम निकलवाते हैं. एक वो समय था जबराजस्थान के एक विस्वविद्याय के कुलपति ने प्रदेश के सर्वोच्च राजनेता को भी समय देने से मना कर दिया था और एक आज का समय. आप भी सोचिये ऐसे माहौलमें इन्क्यूबेशन केंद्र के लिए कोन सोच रहा है?
स्टार्टअप की दुनिया का तीसरा कदम है "एंजेल इन्वेस्टर" और "वेंचर इन्वेस्टर". हर शहर में एंजेल इन्वेस्टर और वेंचर इन्वेस्टर के प्रतिनिधियों को बुलाया जाना चाहिएऔर हर शहर के उद्यमियों को इस प्रकार के समूह बनाने चाहिए जो एंजेल इन्वेस्टर का काम कर सकें. उदाहरण के लिए जयपुर के उद्यमियों ने मिल कर "राजस्थानएंजेल इन्वेस्टर नेटवर्क" स्थापित किया है. ये समूह नए उद्यमियों को न केवल आर्थिक मदद बल्कि मार्गदर्शन भी प्रदान करते हैं. इस प्रकार उद्यमिता की राह आसान होजाती है. उद्यमिता का रास्ता बड़ा आसान हो जाता है अगर आपको कोई सहारा और मार्गदर्शन देने वाला हो.
एक उदाहरण देना चाहूंगा. एक विस्वविद्यालय में मैंने इन्क्यूबेशन केंद्र की शुरुआत की (बिना सरकारी सहायता के - क्योंकि उस समय ये योजना नहीं आयी थी). प्रथमवर्ष का एक विद्यार्थी आगे आया. उसकी तमन्ना थी की विकलांग लोगों के लिए कृत्रिम अंग बनाने के लिए कम्प्यूटर और थ्री डी प्रिंटर की मदद ली जाए. हमने उसकोप्रोत्साहन दिया और उसने अपने उद्यम की शुरुआत की और सफल हुआ . उसके बाद तो एक के बाद एक विद्यार्थियों की लाइन लग गयी जो उद्यम शुरू करना चाहते थे. जैसा माहौल बनाते हैं वैसे ही विद्यार्थी बन जाते हैं और आगे का माहौल वो स्वयं बनाते हैं. जरुरत है कि हमारी उच्च शिक्षण संस्थाएं इस दिशा में सोचना शुरू करें.
अब अफ़सोस, हताश और निराश का समय नहीं बल्कि कुछ सकारात्मक पहल करने का समय है. जितना स्वर्णिम समय आज है उतना इतिहास में शायद ही कभी रहा हो. आइये हम सब मिल कर कुछ ऐसी पहल करें की नयी पीढ़ी को कुचक्रों से आजादी दिल सकें और उनको उनकी क्षमता के परवान पर पहुँचा सकें.

0 Comments:
Post a Comment
<< Home