स्वागत २०१७ का : स्वागत सैलानियों का : स्वस्थ-आतिध्य का
स्वागत २०१७ का : स्वागत सैलानियों का : स्वस्थ-आतिध्य का
(संयुक्त राष्ट्र द्वारा २०१७ को सस्टेनेबल टूरिज्म हेतु समर्पित वर्ष के विशेष सन्दर्भ में)
पूरी दुनिया आज पर्यावरण के संकट से जूझ रही है और ये संकट सिर्फ हमारी उपभोग-प्रधान जीवनशैली के कारण आ रहा है. इस संकट से उबरने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने १७ ‘सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स’ (SDG) (सतत विकास के लक्ष्य) रखे हैं जिनसे पूरी दुनिया को २०३० तक एक बेहतर जीवनशैली की तरफ ले जाया जाएगा. इन्हीं उद्देश्यों के आधार पर इस वर्ष (2017) को संयुक्त राष्ट्र ने "सस्टेनेबल टूरिज्म" के लिए समर्पित किया है. सस्टेनेबल टूरिज्म यानी ऐसापर्यटन जो पर्यावरण के अनुकूल हो, संस्कृति के अनुकूल हो, हमें बेहतर जीवन शैली के लिए प्रेरित करे और ऐसा पर्यटन लोगों के बीच मधुर सम्बन्ध स्थापित करे न कीलोगों को नुमाइश की चीज के रूप में प्रस्तुत करें. पर्यटन के इस स्वरुप के लिए भारत पूरी दुनिया के सामने एक आदर्श प्रस्तुत कर सकता है और पूरी दुनिया को एक नयीदिशा दिखा सकता है - जो आज पूरी दुनिया के लिए निहायत जरुरी है.
आज दुनिया में पर्यटन के नाम पर पर्यावरण का नुक्सान हो रहा है, अपसंस्कृति को बढ़ावा मिल रहा है और उपभोग की संस्कृति को प्रोत्साहन मिल रहा है. पांच-सितारासंस्कृति में ‘जल, जंगल और जमीन’ तीनों का नाश किया जाता है. सब कुछ उपभोग की वस्तुए बन कर सिमट जाते हैं. लोग भोंडा प्रदर्शन करते हैं और उपभोग-वाद कोबढ़ावा देते हैं. पर्यटन के निकृष्ट स्वरुप सामने आ रहे हैं. कृषि योग्य उपजाऊ भूमि भोंडे पर्यटन की भेंट चढ़ रही है. बेल्जियम, ऑस्ट्रिया, न्यूजीलैंड, कनाडा, फ़्रांस, जर्मनीजैसे देशों में तो वैश्यवृति को कानूनी मान्यता है और पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए इस निकृष्टता को भी बढ़ावा दिया जा रहा है. अधकांश पर्यटन स्थलों पर जुआ,व्यभिचार, और मर्यादाहीन उपभोग को बढ़ावा दिया जा रहा है.
पर्यटन का सही और स्वस्थ स्वरुप तो वो होता है जिसमे लोग एक दूसरे से प्रेम से मिलते हैं और एक दूसरे की संस्कृति से सीखने का प्रयास करते हैं और स्वस्थ मनोरंजनमें भाग लेते हैं. पश्चिम में पर्यटन का काफी बढ़ावा हुआ है और ये व्यवस्था आज एक उद्योग का स्वरुप ले रही है -जिसका एकमात्र उद्देश्य अर्थोपार्जन है. भारत में पर्यटनशताब्दियों पहले बहुत ही स्वस्थ स्वरुप में प्रचलित था. फाहियान चंद्रगुप्त के शाशन काल में भारत भ्रमण के लिए आया था. उस समय भी अनेक विदेशी लोग भारतशिक्षा, पर्यटन और व्यापार के लिए आया करते थे और उनको बहुत ही आदर और सम्मान मिलता था. आज के वीजा की तरह उस समय "मुद्रा" दी जाती थी जिसको हरपर्यटक को साथ में रखना पड़ता था. भारत के अद्भुत ‘ज्ञान केंद्रों’ में शिक्षा ग्रहण करने के लिए आने वाले लोग लोट कर जाते थे तब संयम, मर्यादा और आदर्श जीवनशैलीअपने साथ ले जाते थे और इस तरह पूरी दुनिया में एक स्वस्थ विचारधारा और जीवनशैली फैलाने में भारत का योगदान था. हर शहर में धर्मशाला, सराय, और यात्रीआवास होते थे जो संस्कृति के केंद्र होते थे न की अय्याशी के स्थल. हर वर्ष लोग तीर्थयात्रा करते थे जो एक आदर्श पर्यटन का स्वरुप होता था. लोग न भोजन का अपव्ययकरते, न पर्यावरण को नुक्सान पहुंचाते न ही संस्कृतियों को नुक्सान पहुंचाते. पर्यटन स्थलों पर संतों के आश्रम भी होते थे जहाँ जा कर के लोग जीवन के लिए नयी ऊर्जाऔर सकारात्मक सोच पाते थे.
भारत की अद्भुत पर्यटन संस्कृति के अवशेष आज भी मिल जाते हैं. गुजरात मैं कई ऐसी धर्मशालाए हैं जहाँ आप अन्न का एक दाना भी नहीं फेंक सकते. आपको भोजनउपरांत थाली को स्वच्छ पानी से साफ़ कर के उसके पानी को पीना पड़ेगा. अनेक भारतीय लोगों ने स्वस्थ पर्यटन की परम्पराओं को शुरू किया. अहमदाबाद, जयपुर, औरबीकानेर में हवेली यात्रा की शुरुआत ऐसे ही कुछ उदहारण हैं. आईआईएम के प्रोफ़ेसर अनिल गुप्ता अपने विद्यार्थियों को शिक्षाटन पर ऐसे स्थानों पर ले जाते हैं जोसांस्कृतिक और प्राकृतिक सम्पदाओं की खान होते हैं जहाँ जा कर विद्यार्थी कुछ सीखने का प्रयास करता है और लोट के आता है तो अपनी विरासत की कीमत समझनेलगता है.
पर्यटन के क्षेत्र में आज भी भारत के लोग अद्भुत नवाचार कर रहे हैं और दुनिया के सामने बेहतर पर्यटन के आदर्श प्रस्तुत कर रहे हैं. नवलगढ़ में पोदार घराने ने व् अन्यघरानों ने अपनी हवेलियों को सांस्कृतिक म्यूजियम में तब्दील कर अद्भुत प्रयास किये हैं. मुरारका समूह के साथ मिल कर मेरे एक विद्यार्थी ने ग्रामीण पर्यटन का उद्यमशुरू किया जिसमे विदेशी सैलानी भारत के गाँव की अद्भुत परम्पराओं को सीखते हैं और गावों की अद्भुत जीवनशैली को अपने देश में यादगार के रूप में ले जाते हैं. वोभोजन भी राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों के व्यंजनों का ही करते हैं. चोखी ढाणी, विशाला जैसे स्थल पर्यटन स्थल भी हैं तो संस्कृति को भी बढ़ावा देते हैं.
आइये आज फिर से कुछ संकल्प लेवें: -
1. पांचसितारा संस्कृति को नहीं बल्कि अद्भुत भारतीय विरासत, और परंपरागत पर्यटन को बढ़ावा देवें
2. ऐसी शिक्षण संस्थाएं विकसित करें जो उपभोग की संस्कृति नहीं बल्कि संयम, विवेक और विनम्रता की संस्कृति को बढ़ावा देवे और जहाँ से निकल कर विद्यार्थीपर्यावरण के अनुकूल सोच विक्सित करे. आज दुनिया में ऐसी शिक्षण संस्थाओं का अकाल नजर आ रहा है और भारत से उम्मीद की जा सकती है. काश कोई शिक्षण-उद्यमी इस दिशा में आये और फिर से तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालयों की शुरुआत हो जो पूरी दुनिया को अध्यात्म और विवेक की शिक्षा दे सके.
3. देश विदेश की यात्रा कर के उनसे सीखने का प्रयास जरूर करें लेकिन भारतीय जीवनमूल्यों को सम्मान के साथ अपने आचरण में लाएं और उनको विदेशी लोगों को भीसम्मान के साथ बताएं और उन्हें भी उपभोग र्पधान संस्कृति के स्थान पर संयम प्रधान संस्कृति अपनाने के लिए प्रेरित करें.

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