Saturday, October 01, 2016

AN ARTICLE ON GANDHIAN PHILOSOPHY

गाँधी वाद - सिर्फ जीवन दर्शन नहीं - जीवन में दर्शन हो

गांधी-वाद आज भी पूरी दुनिया के लिए एक उम्मीद की किरण है और भारत सरकार
के लिए एक लष्मणरेखा है -  अब तो बस करो - अब तो सौंप दो सत्ता आम जनता
को. स्वराज का विचार एक उम्मीद की किरण है की किसी दिन तो हम सब लोग अपने
अपने गाव में अपना स्वर्ग देख पाएंगे. ये वो विचार है जो हर व्यक्ति को
इतना सक्षम बना सकता है की हर व्यक्ति स्वाभिमान की हुंकार भर सकता है और
अपने क्षेत्र और प्रदेश के हित का फैसला ले सकता है. अफ़सोस  है कि
"ग्राम स्वराज्य" और  "ट्रस्टीशिप" सिर्फ गांधी वाद तक सीमित हो गए हैं.
पुस्तकें लिखी जाती हैं, खादीधारी नेता व्यक्यानं दे देते हैं - गाँधी जी
को याद कर लेते हैं. जो गाँधी चाहते थे वो तो कोई कर नहीं रहा है.
स्वराज्य का आधार है लोगों के हाथ में सत्ता. लेकिन हर दूसरे दिन सरकारें
ज्यादा से ज्यादा सत्ता हथिया रही है. कही न कही सरकारों और आम आदमी में
बीच भी द्वन्द्व होता है और सरकारें जनता को दबाने के सारे  रास्ते जानती
हैं. गांधी जी चाहते थे - की सरकारें नहीं जनता ताकतवर बने - पर जाने वो
दिन कब आएगा? गाँधी जी ने सत्ता के हर रूप को नकार दिया था - जहाँ पर भी
सत्ता है वहां पर जनता का शोषण हो सकता है - अतः गाँधी जी ने जनता को ही
सबसे ऊपर माना - लेकिन आज उस बात को लागू कौन करे? जो सत्ता पर काबिज हैं
वो हर दूसरे दिन सत्ता को और व्यापक बना रहे हैं और जनता के लिए
मुश्किलें बढ़ रही हैं.

आदर्श ग्राम स्वराज्य में हर गाव अपनी जरूरत की सभी वस्तुएं स्वयं बनाएगा
और हर गाव अपने आप में आत्म निर्भर होगा. ये विचार ही हर गाव को लोगों के
लिए स्वर्ग बना देगा. गावों को सशक्त करते ही हर गाव स्वावलंबी और सक्षम
हो जाएगा. गावों में सभी आधारभूत सुविधाएं होगी. लोगों में गाव में रहने
के लिए इच्छा शक्ति और लगाव होगा. गाव के लोग इतने सक्षम हो जाएंगे की वो
अपने विकास के लिए नीतिनिर्माण में भागीदार बनेगे और गाव गाव में ग्राम
सभा एक सजग और मजबूत संस्था बन जायेगी.अफ़सोस  है कि ये बाते सिर्फ सपने
लग रहे हैं क्योंकि गांधी के जाने के बाद इस दिशा में कोई व्यापक प्रयास
नहीं हुआ. विनोबा, लोहिया, जयप्रकाश नारायण, जैसे नेताओं को छोड़ देवें तो
कोई भी नेता इस दिशा में (भाषण बाजी के सिवाय) कोई प्रयास नहीं कर पाया
है.

मुझे बीकानेर के श्री छलानी जी, श्री मोदी जी व् श्री भंवरलाल कोढारी जी
याद आ रहे हैं. श्री मोदी जी (गांधीवादी श्री सोहनलाल मोदी जी) ने मुझे
कहा था की जिस दिन भारत में चुनाव प्रक्रिया समाप्त हो जायेगी - उस दिन
से असली लोकतंत्र की शुरुआत हो जायेगी. वो कहा करते थे गाव गाव में लोग
अपना प्रतिनिधि (बिना चुनाव) तय कर सकते हैं और मिल जुल कर विकास का काम
शुरू कर सकते हैं इस प्रकार चुने गए प्रतिनिधि अपने में से एक व्यक्ति को
चुन कर (बिना चुनाव) लोक कल्याण कारी कार्य शुरू कर सकते हैं और इस
प्रकार सेवा और जन कल्याण का नया युग शुरू हो सकता है. सरकारी सहायता
नहीं बल्कि लोगों के द्वारा मिल जुल कर इकठे किये गए संसाधनों से विकास
का काम होना चाहिए और सरकार नहीं लोगों को मिल कर तय करना चाहिए की उनके
कायदे कानून क्या होंगे. आज लगता है की वो सब बातें सिर्फ दिवा-स्वप्न बन
कर रह गयी हैं. हमारे शहर में गांधी के विचारों को अपने जीवन में लागू
करने वाली एक पीढ़ी आँखों से ओझल होने जा रही है और उनके जाते ही एक
अद्भुत विचारधारा का अंत हो जाएगा. इस पीढ़ी के कुछ आखिरी स्थाम्भ आज भी
शहर के "जनकल्याणकारी पक्ष" को अपनी रौशनी से ज़िंदा रखे हुए हैं. सच में
जन कल्याण तभी संभव है जब जन-जन में ये विश्वास हो की वो ही अपने भाग्य
निर्माता हैं. आज तो अंतरास्ट्रीय बैंकों और मुठी भर बहुराष्ट्रीय
कंपनियों के नीति-निर्माता का कहा ही हमारी अटल सत्य बन पाता है.
अंतरष्ट्रीय  बैंक द्वारा समर्थित स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट  को तो सरकार
लागू करती है लेकिन गाव-गाव को जल, बिजली और सड़क से जोड़ने के काम को
हाशिये पर डाल देती है. देश से करोड़ों रूपये ले जाने वाली बहुराष्ट्रीय
कंपनियों के लिए तो प्रोत्साहन है लेकिन गाव-गाव में स्वराज्य का विस्तार
करने के लिए कोई योजना नहीं है. वर्तमान चुनाव प्रणाली ने राजनीतिक दलों
को इतना लाचार बना दिया है की वो भी अपने दानदाताओं (कंपनियों) के हितों
के इतर कुछ बोल ही नहीं पाते हैं.

गांधी उद्योगपतियों और व्यवसायियों के खिलाफ नहीं थे - बल्कि उनको
ट्रस्टी  बनके  जन-कल्याण के लिए आगे आने के लिए कहा करते थे - और उनके
समय में अनेक उद्योग पति आगे आये और उन्होंने जन-कल्याण के काम शुरू किये
- लेकिन भारतीय व्यवस्था में उसके लिए इतने वर्षों तक कोई प्रयास नहीं
किया गया - हाँ आज विदेश की देखा देखि  "कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलटी
CSR" का नया फंडा शुरू किया गया है. हम हर उस काम को करना चाहते हैं जो
अमेरिका ने आजमाया हो - लेकिन वो काम नहीं करना चाहते तो हमारी अपनी
सांस्कृतिक धरा का भाग है.

गांधी-वाद एक ऐसी तकनीक की वकालत करता है जो मानवीय श्रम, उपलब्ध संसाधन
और छोटे छोटे उपक्रम पर आधारित हो. आज उसी तकनीक को 'एप्रोप्रिएट
टेक्नोलॉजी' कहा जाता है और उसे 'सस्टेनेबल डेवलपमेंट' (SDG)  के लिए
जरुरी माना जा रहा है. विकास की परिभाषाएं बदल रही है और जल्द ही गांधीजी
के विचार ही अमेरिका और अन्य विक्सित देशों को अँधेरे में उजाला दिखाएँगे
- और तब भारत भी इसको स्वीकार करेंगा.

पूरी दुनिया में जहाँ जहाँ भी स्वराज्य का उद्घोष हुआ है वहां- वहां पर
जनता के कल्याण के काम शुरू हुए हैं या फिर जनता ने क्रांतिकारी कदम
उठाये हैं. आईये हम भी इस २ अक्टूबर को ग्राम स्वराज्य के सपने को आगे
बढ़ाने के लिए कुछ प्रयास करें और लोगों को अपनी माटी, अपने गाव लौटने और
अपनी जमीन के मालिक बनने के लिए बुलाएं. २ अक्टूबर २०१४ को सरकार ने
"स्वच्छ भारत मिशन" के शानदार कार्यक्रम की शुरुआत की. हम मिशन के साथ
जुड़ें और साथ में सरकार से "स्वच्छ प्रशाशन" शुरू करने के   लिए अनुरोध
करें - और 'स्वच्छ प्रशाशन' तभी संभव होगा जब सरकारें और प्रशाशन - आम
जनता को अधिकार  सौंपेगी और प्रजातांत्रिक विकेन्द्रीकरण के लिए प्रयाश
शुरू करेगी. स्वराज्य को बढ़ावा देने के लिए हम संकल्प लेवे की जहाँ तक हो
सके हम भारतीय उत्पाद काम में लेवें - और उसमे भी जहाँ तक हो सके अपने ही
गाव और अपने ही शहर के उत्पाद काम में लेवें. अपने पडोसी के उत्पाद खरीद
के हम उसको भी मदद करेंगे - और पर्यावरण की भी मदद करेंगे.गाँधी जी ने
भारतीय शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने को पहली प्राथमिकता दी थी - अपने
अस्तित्व और अपने वजूद के लिए हमीं को कोई शुरुआत करनी पड़ेगी और तब गाँधी
याद आएंगे.

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